दूनिया के बदलते व्यापार परिदृश्य के बीच भारत और यूरोपीय संघ के रिश्तों को लेकर एक अहम संकेत सामने आया है। बता दें कि जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने सोमवार को यह संभावना जताई है कि यूरोपीय संघ और भारत के बीच लंबे समय से चर्चा में रहा मुक्त व्यापार समझौता जनवरी के अंत तक अंतिम रूप ले सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार समीकरणों पर दूरगामी असर पड़ सकता है।
मौजूद जानकारी के अनुसार मर्ज़ ने अहमदाबाद में प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के बाद पत्रकारों से बातचीत में कहा कि यदि वार्ता समय पर पूरी होती है तो यूरोपीय संघ के शीर्ष नेता भारत आकर इस समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह समझौता सुनिश्चित करने की दिशा में एक बड़ा और निर्णायक कदम होगा।
गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के अधिकारियों की ओर से इस बयान पर फिलहाल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत को लेकर सक्रियता साफ दिखाई दे रही है। वर्षों से लंबित यह व्यापार समझौता भारत और यूरोपीय संघ के लिए चीन और रूस पर निर्भरता कम करने का एक अवसर माना जा रहा है। वर्ष 2024 में भारत-यूरोपीय संघ के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगभग 120 अरब यूरो तक पहुंच गया था, जिससे यह समूह भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है।
बताया जा रहा है कि हाल के महीनों में वार्ताओं में तेजी आई है, खासकर तब जब अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर शुल्क बढ़ाए और नई दिल्ली पर रूसी तेल की खरीद कम करने का दबाव बनाया है हैं। गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिका व्यापार समझौता भी संवाद टूटने के कारण पिछले वर्ष विफल हो गया था हैं।
इस पृष्ठभूमि में यूरोपीय संघ-भारत समझौता, यूरोप के लिए नए व्यापारिक नेटवर्क बनाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो हाल ही में दक्षिण अमेरिका के मर्कोसुर समूह के साथ हुए करार के बाद और मजबूत हुई है। वहीं गुजरात में एक अलग कार्यक्रम में भारतीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि यह समझौता लगभग अंतिम चरण में है और जल्द ही ठोस नतीजे सामने आ सकते हैं।
सूत्रों के अनुसार यूरोपीय संघ कारों, मेडिकल उपकरणों, वाइन और स्पिरिट्स पर शुल्क में बड़ी कटौती चाहता है, जबकि भारत श्रम-प्रधान उत्पादों के लिए शुल्क-मुक्त पहुंच और अपने ऑटो व इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की तेज मान्यता की मांग कर रहा है। हालांकि स्टील, कार्बन लेवी और बाजार पहुंच जैसे मुद्दों पर अभी भी कुछ मतभेद बने हुए हैं, जिन पर आगे समझौते की जरूरत बताई जा रही है।
मर्ज़ की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने खनिज, स्वास्थ्य और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े समझौतों पर भी सहमति जताई है हैं। जर्मनी, जो भारत को एक उभरते बाजार के रूप में देखता है, नई दिल्ली से रूसी ऊर्जा और रक्षा उपकरणों पर निर्भरता कम करने का आग्रह भी कर रहा है हैं। मर्ज़ ने यूक्रेन युद्ध को लेकर रूस की भूमिका पर सहमति जताते हुए यह भी कहा कि भारत की स्थिति जटिल है और उस पर उंगली उठाना उचित नहीं है।
गौरतलब है कि मर्ज़ ने चांसलर बनने के बाद अपनी पहली एशियाई यात्रा के लिए भारत को चुना, जो यह संकेत देता है कि यूरोपीय नेतृत्व अब चीन के बजाय भारत पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहा है। उन्होंने दुनिया में बढ़ते संरक्षणवाद को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि इससे जर्मनी और भारत दोनों को नुकसान होता है, हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया है।
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को एक बार फिर विवादित बयान देते हुए कहा है कि अमेरिका ग्रीनलैंड को “किसी न किसी तरीके से” अपने नियंत्रण में लेगा हैं। उनका दावा है कि यदि वॉशिंगटन ने कदम नहीं उठाया तो रूस और चीन इस क्षेत्र पर प्रभाव बढ़ा सकते हैं, जो अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होगा।
मौजूद जानकारी के अनुसार ट्रंप ने यह टिप्पणी एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान की, जहां उन्होंने कहा कि खनिज-संपन्न ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से बेहद अहम है और आर्कटिक क्षेत्र में रूसी और चीनी सैन्य गतिविधियों में बढ़ोतरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता हैं। गौरतलब है कि रूस या चीन ने अब तक ग्रीनलैंड पर किसी प्रकार का औपचारिक दावा नहीं किया है, इसके बावजूद ट्रंप लगातार इस मुद्दे को उठा रहे हैं।
ट्रंप ने यह भी कहा कि वह डेनमार्क के स्वशासित क्षेत्र ग्रीनलैंड के साथ किसी समझौते के लिए तैयार हैं, लेकिन अंततः अमेरिका वहां अपनी मौजूदगी सुनिश्चित करेगा हैं। उनके इस बयान से डेनमार्क और अन्य यूरोपीय सहयोगी देशों में चिंता और नाराजगी देखने को मिल रही है। बता दें कि ग्रीनलैंड उत्तर अमेरिका और आर्कटिक के बीच स्थित है और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वहां अमेरिका का एक सैन्य अड्डा मौजूद है, जो इसकी रणनीतिक अहमियत को दर्शाता है।
गौरतलब है कि ग्रीनलैंड 1953 तक डेनमार्क का उपनिवेश रहा और इसके बाद उसे स्वशासन मिला। पिछले कुछ वर्षों से वहां राजनीतिक स्तर पर डेनमार्क से संबंधों को धीरे-धीरे ढीला करने पर भी चर्चा होती रही है। हालांकि ग्रीनलैंड की अधिकांश आबादी और राजनीतिक दलों का साफ कहना है कि वे अमेरिकी नियंत्रण में नहीं जाना चाहते और अपने भविष्य का फैसला खुद करना चाहते हैं, लेकिन ट्रंप इस दृष्टिकोण को लगातार चुनौती देते रहे हैं।
ट्रंप ने अपने बयान में ग्रीनलैंड की सुरक्षा व्यवस्था का मजाक उड़ाते हुए कहा कि वहां की रक्षा केवल “दो डॉग स्लेज” जैसी है, जबकि रूस और चीन के पास युद्धपोत और पनडुब्बियां हैं। इस बयान को लेकर कूटनीतिक हलकों में नाराजगी देखी जा रही है। वहीं डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका बलपूर्वक ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश करता है तो इससे पिछले 80 वर्षों से चली आ रही ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
हालांकि ट्रंप ने इस चेतावनी को खारिज करते हुए कहा कि यदि इसका असर नाटो पर पड़ता है तो पड़े, लेकिन ग्रीनलैंड को अमेरिका की जरूरत कहीं ज्यादा है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले समय में वैश्विक संतुलन को किस दिशा में ले जाएगी।
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