TMC को बड़ा झटका!: नाम और चुनाव चिह्न फ्रीज, दोनों गुटों को नए सिंबल चुनने होंगे; बंगाल उपचुनाव से पहले EC का फैसला
पश्चिम बंगाल में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर ममता बनर्जी और रिताब्रता बनर्जी गुट के बीच विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच गया है। दोनों गुट पार्टी के नाम और ‘जोड़ा घास फूल’ चुनाव चिह्न पर अपना दावा कर रहे हैं। मामला 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा उपचुनावों से जुड़ा है।
TMC नाम और चुनाव चिह्न पर क्यों मचा विवाद?
तृणमूल कांग्रेस में संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर ममता बनर्जी और रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट आमने-सामने हैं। दोनों पक्षों ने चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश किया है।
रिताब्रता गुट का दावा है कि उसके साथ बड़ी संख्या में विधायक हैं, जबकि ममता बनर्जी गुट ने पार्टी के संगठनात्मक चुनावों और पार्टी संविधान के आधार पर अपना पक्ष रखा है। आयोग ने दोनों पक्षों से दस्तावेज और जवाब मांगे हैं।
नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव से पहले बढ़ी चुनौती
विवाद का सीधा असर दोनों उपचुनावों पर पड़ सकता है। नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्टूबर को मतदान होना है। दोनों TMC गुटों ने अपने-अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं। नामांकन की अंतिम तारीख 16 सितंबर थी।
नंदीग्राम में ममता गुट ने संचिता प्रधान डे को उम्मीदवार बनाया है, जबकि रिताब्रता गुट की ओर से एहतशामुल हक मैदान में हैं। रेजीनगर में दोनों गुटों ने अलग-अलग उम्मीदवार उतारे हैं।
चुनाव आयोग के सामने क्या है पूरा मामला?
चुनाव आयोग यह देख रहा है कि पार्टी के संगठन और नेतृत्व पर किस गुट का दावा वैध है। दोनों पक्षों से संगठनात्मक दस्तावेज, पदाधिकारियों और पार्टी संविधान से संबंधित जानकारी मांगी गई है।
रिताब्रता गुट ने संगठनात्मक नियंत्रण और विधायकों के समर्थन को अपने पक्ष में बताया है। वहीं ममता गुट का कहना है कि पार्टी के संगठनात्मक चुनाव पांच साल के अंतराल पर होते रहे हैं और मौजूदा नेतृत्व का कार्यकाल अभी समाप्त नहीं हुआ है।
क्या दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न मिल सकता है?
यदि आयोग विवादित पार्टी नाम और आरक्षित चुनाव चिह्न को उपचुनाव के लिए अस्थायी रूप से फ्रीज करता है, तो दोनों गुटों को अलग नाम और अलग चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में दोनों पक्ष चुनाव आयोग की ‘फ्री सिंबल’ सूची में उपलब्ध चिह्नों में से विकल्प चुन सकते हैं। यह व्यवस्था अंतिम रूप से यह तय करने से अलग होगी कि भविष्य में पार्टी के नाम और मूल चुनाव चिह्न पर अधिकार किस गुट का होगा।
शिवसेना मामले का दिया जा रहा उदाहरण
ऐसी परिस्थितियों में चुनाव आयोग पहले भी अंतरिम व्यवस्था कर चुका है। 2022 में शिवसेना के भीतर विभाजन के बाद अंधेरी ईस्ट उपचुनाव से पहले आयोग ने पार्टी के नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न को दोनों गुटों के लिए अस्थायी रूप से फ्रीज किया था। दोनों पक्षों को अलग नाम और चुनाव चिह्न दिए गए थे।
TMC विवाद में भी इसी तरह की अंतरिम व्यवस्था की संभावना पर चर्चा होती रही है।
17 सितंबर को दोनों गुटों की सुनवाई
चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को दोनों पक्षों को दोबारा सुनवाई के लिए बुलाया था। रिताब्रता बनर्जी के नेतृत्व वाले पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को दोपहर 3 बजे और ममता बनर्जी गुट को शाम 4 बजे आयोग के समक्ष उपस्थित होना था।
आयोग के सामने अब मुख्य सवाल पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के तत्काल इस्तेमाल तथा दोनों गुटों के दावों से जुड़ा है।
क्या होगा चुनाव पर असर?
अगर विवादित नाम और चिह्न दोनों गुटों के लिए रोक दिए जाते हैं, तो नंदीग्राम और रेजीनगर में TMC समर्थित उम्मीदवारों को अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है। इससे मतपत्र और चुनाव प्रचार में दोनों गुटों की अलग पहचान बनेगी।
हालांकि, अंतरिम चुनावी व्यवस्था को पार्टी के अंतिम स्वामित्व पर फैसला नहीं माना जाएगा। अंतिम निर्णय में आयोग दोनों पक्षों के दस्तावेज, संगठनात्मक स्थिति और संबंधित दावों पर विचार करेगा।
Facts
विवाद किस पार्टी को लेकर है?
ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस
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ममता बनर्जी और रिताब्रता बनर्जी गुट
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पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न
चुनाव चिह्न
जोड़ा घास फूल
उपचुनाव
नंदीग्राम और रेजीनगर
मतदान
6 अक्टूबर 202
नामांकन की अंतिम तारीख
16 सितंबर 2026
आयोग की सुनवाई
17 सितंबर 2026
Disclaimer: यह खबर उपलब्ध चुनाव आयोग संबंधी रिपोर्टों और दोनों पक्षों के सार्वजनिक दावों पर आधारित है। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतिम अधिकार संबंधी स्थिति चुनाव आयोग के अंतिम आदेश से स्पष्ट होगी।
Birth and Death Registration: जन्म, मृत्यु पंजीयन के नए प्रावधान 1 अक्टूबर से होंगे लागू.. सख्त होगी प्रक्रिया, आवेदन में देरी तो मजिस्ट्रेट का लिखित आदेश जरूरी
जन्म और मृत्यु पंजीकरण में देरी से जुड़े नए प्रावधान 1 अक्टूबर 2026 से लागू होंगे। संशोधित कानून के तहत एक से दो साल के भीतर पंजीकरण कराने के लिए जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट या अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट का लिखित आदेश जरूरी होगा। दो साल या उससे अधिक देरी होने पर प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट आदेश की आवश्यकता होगी।
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