ईपीएफओ की वेतन सीमा बढ़ाने से सामाजिक सुरक्षा को मिलेगा विस्तार, रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा होगी मजबूत: उद्योग संगठन
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्र सरकार द्वारा कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) के तहत अनिवार्य कवरेज की वेतन सीमा को 15,000 रुपए से बढ़ाकर 25,000 रुपए प्रति माह किए जाने के फैसले का उद्योग जगत और श्रमिक संगठनों ने स्वागत किया है। उन्होंने गुरुवार को कहा कि यह कदम सामाजिक सुरक्षा के दायरे का विस्तार करने, औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देने और कर्मचारियों की दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
फिक्की (एफआईसीसीआई) की महानिदेशक ज्योति विज ने न्यूज एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में कहा कि ईपीएफओ वेतन सीमा में संशोधन लंबे समय से लंबित था। उन्होंने बताया कि पिछला संशोधन वर्ष 2014 में किया गया था और उसके बाद देश में वेतन स्तर, आय और रोजगार संरचना में काफी बदलाव आया है।
उन्होंने कहा, सरकार द्वारा वेतन सीमा को 25,000 रुपए तक बढ़ाने का फैसला समय की मांग थी। इससे करीब 51 लाख अतिरिक्त कर्मचारी औपचारिक सामाजिक सुरक्षा ढांचे के दायरे में आएंगे। उन्होंने कहा कि यह निर्णय रोजगार के औपचारिकीकरण, कर्मचारियों को लंबे समय तक संगठन से जोड़े रखने और रिटायरमेंट सुरक्षा को मजबूत करने में मदद करेगा।
ज्योति विज ने आगे कहा कि जब कर्मचारियों को भविष्य निधि, पेंशन और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलते हैं तो उनका मनोबल बढ़ता है और नौकरी में स्थिरता आती है। इससे कर्मचारियों और संस्थानों दोनों को फायदा होता है।
उन्होंने आईएएनएस से बताया कि अब बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी, जो पहले इस सुरक्षा कवच से बाहर थे, अपने भविष्य के लिए एक रिटायरमेंट फंड तैयार कर पाएंगे।
उन्होंने कहा, जब किसी व्यक्ति को यह भरोसा होता है कि सेवानिवृत्ति के बाद उसके पास आर्थिक सुरक्षा होगी, तो वह अधिक समर्पण के साथ काम करता है और लंबे समय तक संगठन के साथ जुड़ा रहता है।
वहीं, भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) के अखिल भारतीय सचिव एवं बैंकिंग क्षेत्र प्रभारी गिरीश चंद्र आर्य ने भी इस फैसले का स्वागत किया। उन्होंने आईएएनएस से बात करते हुए कहा कि श्रमिक संगठन लंबे समय से ईपीएफओ वेतन सीमा बढ़ाने की मांग कर रहे थे।
उन्होंने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, सितंबर 2014 में तय की गई 15,000 रुपए की सीमा मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और बदलते वेतन ढांचे के हिसाब से काफी कम हो चुकी थी। लगभग 12 वर्षों बाद किया गया यह संशोधन कर्मचारियों के हित में एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम है।
गिरीश चंद्र आर्य ने आगे कहा कि इस फैसले का लाभ केवल करीब 55 लाख कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगा। सरकार की औपचारिक रोजगार को बढ़ावा देने और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को संगठित क्षेत्र में लाने की नीति के तहत आने वाले समय में और अधिक कर्मचारी ईपीएफ, ईएसआई और बोनस जैसी योजनाओं के दायरे में आएंगे।
उन्होंने कहा कि यह केवल भविष्य निधि (पीएफ) में बढ़ोतरी का मामला नहीं है, बल्कि कर्मचारियों को दीर्घकालिक रूप से पेंशन और बीमा सुरक्षा भी प्रदान करेगा। इससे श्रमिकों और उनके परिवारों की आर्थिक सुरक्षा मजबूत होगी।
--आईएएनएस
डीबीपी
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सुप्रीम कोर्ट का मणिपुर के मुख्य सचिव को निर्देश, राहत शिविरों में हुई 25 अप्राकृतिक मौतों पर दें रिपोर्ट
नई दिल्ली, 17 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हिंसा प्रभावित राज्य मणिपुर के मुख्य सचिव से राहत शिविरों में हुई 25 अप्राकृतिक मौतों के मामलों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। रिपोर्ट में पोस्टमार्टम जांच का विवरण, मौत के कारण और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी शामिल होनी चाहिए।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोगों की मौत और उन्हें हो रही अन्य दिक्कतों से जुड़ी जानकारी पर गौर करने के बाद निर्देश जारी किए।
सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे अखबारों में बताई गई सभी 25 अप्राकृतिक मौतों का विवरण दें। मौत के कारणों को बताने वाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज भी रिकॉर्ड पर रखें।
कोर्ट ने कहा, हम मणिपुर के मुख्य सचिव को निर्देश देते हैं कि वे अखबारों में बताई गई सभी 25 अप्राकृतिक मौतों के बारे में रिपोर्ट सौंपें। साथ ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी दें, जिसमें मौत का कारण और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी हो।
मणिपुर सरकार से यह भी पूछा गया है कि राहत शिविरों में विस्थापित लोगों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए क्या एहतियाती कदम उठाए गए हैं।
शीर्ष अदालत ने आठ जिलों के राहत शिविरों में हुई मौतों से जुड़ी एक रिपोर्ट पर गौर किया और उन हालात पर सवाल उठाए, जिनमें केवल 20 मामलों में ही पोस्टमार्टम किया गया।
कोर्ट ने अप्राकृतिक मौतों के मामलों में परिवारों को केवल 20,000 से 30,000 रुपए का मुआवजा दिए जाने की खबरों पर भी स्पष्टीकरण मांगा।
सीजेआई की अध्यक्षता वाली बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह स्पष्ट करे कि ऐसे सभी मामलों में पोस्टमार्टम क्यों नहीं किया गया और मुआवजा राशि किस आधार पर तय की गई।
कोर्ट ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि राहत शिविरों में रह रहे लोगों को पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं और रोजमर्रा की जरूरी चीजें मिलें।
मणिपुर लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को निर्देश दिया गया कि वह तुरंत इस मामले की जांच करे और अप्राकृतिक मौतों के सभी मामलों में एफआईआर दर्ज कराना सुनिश्चित करे। साथ ही, यह सुनिश्चित करने को भी कहा गया कि मौत के कारणों का सही पता लगाया जाए और जिन मामलों में एफआईआर दर्ज हो चुकी है, उनकी जांच जल्द पूरी की जाए।
--आईएएनएस
एससीएच/एबीएम
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