मुंबई छोड़ने वाला था, तभी आया ‘हनुमान अंश’ का ऑफर:कंपोजर धीरेंद्र ने बताया- बाबा जी का स्मरण किया और 5 मिनट में बन गई धुन
फिल्म ‘हनुमान अंश’ बाबा नीम करोली के जीवन पर आधारित है। फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ गाने को धीरेंद्र मुलकलवार ने कंपोज किया है। खास बात यह है कि यह गाना पहले कहानी का हिस्सा था ही नहीं। एक सीन के बैकग्राउंड म्यूजिक से इसकी शुरुआत हुई और बाद में यही गाना फिल्म की पहचान बन गया। धीरेंद्र बताते हैं कि फिल्म से जुड़ने से पहले ही वे कैंची धाम जाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन सफल नहीं हो पा रहे थे। कैंची धाम पहुंचने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें फिल्म का ऑफर मिला। धीरेंद्र ने दैनिक भास्कर से बातचीत में फिल्म के दौरान हुए चमत्कार, गाने की मेकिंग और 20 साल के संघर्ष पर बात की। सवाल: फिल्म ‘हनुमान अंश’ से आपका जुड़ना भी किसी चमत्कार से कम नहीं रहा। कैसे? जवाब: मैं पिछले चार-पांच साल से कैंची धाम जाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन किसी न किसी वजह से जा नहीं पा रहा था। पिछले साल अप्रैल में आखिरकार कैंची धाम पहुंचा और बाबा जी के दर्शन हुए। इसके करीब दो महीने बाद जुलाई में विशाल चतुर्वेदी जी का फोन आया। वे बाबा नीम करोली पर फिल्म बना रहे थे और 43 दिनों का हनुमान चालीसा पाठ कर रहे थे। उसी दौरान उन्होंने मुझसे फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर करने के लिए पूछा। मैंने बिना सोचे हां कर दी। मुझे लगा कि यह बाबा जी की कृपा से हुआ है। सवाल: फिल्म का साउंड तय करने वाली शुरुआती धुन कैसे बनी? जवाब: विशाल जी ने मुझे फिल्म की कहानी सुनाई और शूट पर जाने से पहले एक थीम बनाने को कहा। मैं करीब दो महीने तक अलग-अलग आइडिया बनाता और खुद ही रिजेक्ट करता रहा। मुझे लग रहा था कि बाबा जी पर बनी फिल्म के लिए जो बनाऊं, वह मेरे स्तर का सबसे अच्छा काम होना चाहिए। एक दिन मुझे एक किस्सा याद आया। विशाल जी ने बताया था कि एक कंपोजर ने बाबा जी की तस्वीर के सामने बैठकर कुछ पंक्तियों को पांच मिनट में कंपोज कर दिया था। वही बात मेरे दिमाग में आई। मैंने बाबा जी का स्मरण किया और अचानक एक धुन दिमाग में आई। सिस्टम ऑन किया और करीब पांच से सात मिनट में पूरी धुन तैयार हो गई। सवाल: वही धुन आगे फिल्म की पहचान बन गई? जवाब: हां। मैंने धुन का अरेंजमेंट करके विशाल जी को भेज दिया। दो-तीन दिन बाद उनके ऑफिस गया तो देखा कि उन्होंने उसे एडिट पर लगा दिया था और ऑफिस में लोग उसे बार-बार सुन रहे थे। फिल्म की शुरुआत में बांसुरी और सितार पर यही धुन आती है। यही फिल्म का साउंड तय करने वाली मुख्य थीम बन गई। सवाल: ‘सियावर रामचंद्र की जय’ गाना कैसे बना? जवाब: फिल्म में एक सीन है, जिसमें एक क्रांतिकारी, जो नास्तिक है, बाबा जी के पास लौटता है। बाबा जी उसे कंबल ओढ़ाते हैं, हाथ में काठी देते हैं और भस्म लगाकर कहते हैं- ‘जाओ, देश का काम करो।’ इस सीन में देशभक्ति और आध्यात्मिकता दोनों का भाव चाहिए था। मैंने एक म्यूजिक बनाया, लेकिन विशाल जी को लगा कि कुछ कमी है। फिर मैंने विजुअल्स बंद कर दिए और सिर्फ सीन का भाव दिमाग में रखा। अचानक एक रिदम आई और मेरे मुंह से अपने आप निकला- ‘सीताराम, सीताराम।’ वहीं से ‘जय जय श्री राम, सीताराम’ की धुन बनी। इसके बाद मंदिरों में होने वाला जयघोष याद आया- ‘सियावर रामचंद्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय, उमापति महादेव की जय।’ मैंने इसे धुन में जोड़ दिया। गाना पहले फिल्म में था ही नहीं। बैकग्राउंड म्यूजिक से इसकी शुरुआत हुई। सवाल: फिर बैकग्राउंड म्यूजिक से पूरा गाना कैसे बना? जवाब: जब यह म्यूजिक एडिट पर लगा तो सबको लगा कि यह ट्रेलर के अंत में भी अच्छा बैठेगा। ट्रेलर में इस्तेमाल करने के बाद लगा कि सिर्फ ‘सीताराम’ और ‘सियावर रामचंद्र की जय’ तक सीमित नहीं रहना चाहिए। फिर इसे पूरा गाना बनाने का फैसला हुआ। मेरे दोस्त शांतनु सुदामे ने इसे लिखा और गाया, जबकि कंपोज मैंने किया। बजट बहुत कम था, इसलिए स्टूडियो का खर्च उठाना मुश्किल था। मैंने अपना घर ही स्टूडियो में बदल दिया था। शांतनु पुणे से आए और करीब एक महीने मेरे घर पर रहकर रिकॉर्डिंग की। सवाल: कम बजट में भी म्यूजिक की क्वालिटी से समझौता नहीं किया? जवाब: बिल्कुल नहीं। फिल्म सिनेमाघरों में दिखाई जानी थी, इसलिए सिनेमैटिक अनुभव जरूरी था। शांतनु ने इंस्ट्रूमेंट्स बजाए। सिताराम और दिलरुबा की रिकॉर्डिंग हुई। स्वर शर्मा के अलाप लिए गए। इंटरवल के एक बड़े सीन के लिए भारी परकशन चाहिए था। इसके लिए परकशनिस्ट जैनत पटनायक को फोन किया। मैंने उन्हें फिल्म और बाबा जी के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि बाबा जी के लिए वे जरूर आएंगे। उन्होंने दो दिन दिए और हमने लगातार रिकॉर्डिंग की। सवाल: फिल्म की कमाई बढ़ने के बाद क्या आपको ज्यादा पैसे मिले? जवाब: मेरे और विशाल जी के बीच दोस्ती है, इसलिए पैसों को लेकर ज्यादा बातचीत नहीं हुई। मैंने उनसे कहा था कि जितनी न्यूनतम तकनीकी लागत आए, वह कर दीजिए। उससे ज्यादा मैं कुछ नहीं मांगूंगा। मेरे लिए यह बाबा जी की फिल्म थी। मुझे जो सबसे बड़ा प्रसाद मिलना था, वह मुझे पहले ही मिल चुका था। बाकी बाबा जी जो देंगे, वही मिलेगा। सवाल: कैंची धाम में आपका अनुभव कैसा रहा? जवाब: हम आरती के समय पहुंचे और पांच मिनट के अंदर दर्शन हो गए। जहां बाबा जी की मूर्ति है, वहां आमतौर पर लोगों को जाने का मौका नहीं मिलता, लेकिन हमें वहां जाने और बैठकर ध्यान करने का भी अवसर मिला। वह अनुभव इतना अद्भुत था कि वहां से आने के बाद भी मैं उसी भाव में रहा। दो महीने बाद जब फिल्म का ऑफर आया तो मुझे लगा कि शायद बाबा जी ने ही यह रास्ता बनाया था। सवाल: आपके 20 साल के करियर में फिल्मी संगीत तक पहुंचने का सफर कैसा रहा? जवाब: बचपन से सपना था कि फिल्मों में म्यूजिक करूं। मेरे बड़े भाई ने मुझे अच्छा संगीत सुनाया और वहीं से संगीत के प्रति लगाव बढ़ा। घर में बर्तन बजाता रहता था तो मेरी मां ने एक दिन कहा कि इसे तबला सिखाओ। मेरे गुरु राजीव पिल्ले जी ने मुझे तबले की तालीम दी। मुंबई आने के बाद ऑडियो इंजीनियरिंग की और रेडियो में ऑडियो इंजीनियर की नौकरी की। रात में डेमो बनाता था और लोगों से काम मांगता था। शुरुआत में फिल्मों में काम नहीं मिला तो विज्ञापनों और जिंगल्स पर काम किया। अब तक 500 से ज्यादा जिंगल्स और विज्ञापनों पर काम कर चुका हूं। इसके बाद टॉयलेट: एक प्रेम कथा का ‘सुबह की ट्रेन’ गाना प्रोड्यूस करने का मौका मिला। फिर उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक, अटैक और आर्टिकल 15 जैसी फिल्मों में म्यूजिक प्रोडक्शन का काम किया। सवाल: फिल्म ‘हनुमान अंश’ से पहले का दौर कितना मुश्किल था? जवाब:कैंची धाम जाने से पहले करीब डेढ़ साल बहुत मुश्किल रहा। फिल्मों में म्यूजिक करने का सपना पूरा नहीं हो रहा था और आर्थिक परेशानियां भी थीं। विज्ञापन और डॉक्यूमेंट्री के काम पर भी असर पड़ा। मुझे लगने लगा था कि मुंबई छोड़कर अपने होमटाउन वापस चला जाऊं। लेकिन तभी कैंची धाम जाने का मौका मिला और उसके दो महीने बाद हनुमान अंश का ऑफर आया। मुझे लगा कि 20 साल की मेहनत के बाद शायद बाबा जी ने फल देने का समय तय कर दिया है। ___________________________________ यह इंटरव्यू भी पढ़ें.. ‘हनुमान अंश’ की शूटिंग के दौरान पहुंचा रहस्यमयी बंदर:मूर्ति स्थापना देखता रहा; भगवान दास बोले- लगा जैसे हनुमान जी खुद निगरानी कर रहे हों फिल्म ‘हनुमान अंश’ में गोपाल का किरदार निभाकर अभिनेता भगवान दास पटेल इन दिनों दर्शकों का ध्यान खींच रहे हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर से मुंबई तक का उनका सफर आसान नहीं रहा। थिएटर में छह साल बिताने के बाद उन्होंने टीवी और फिल्मों में छोटे-बड़े किरदार निभाए।पूरा इंटरव्यू पढ़ें..
लहर-लहर:मुश्किल वक्त में आपको ये तय करना है कि आप टूटेंगे या कोई रास्ता निकालेंगे
जीवन संघर्ष यानी लाइफ स्ट्रगल को इस तरह से समझिए कि इस ग्रह पर लगभग 8 अरब लोग रहते हैं और हर इंसान की कोशिश एक अलग तरह की है। हर कोई जो चाह रहा है, वह बाकियों से जरा-सा अलग है। किसी को भी आप पूछिए तो उसकी अपनी महत्वाकांक्षा है। जो उसका सपना है, वह बाकियों से थोड़ा-सा अलग है। इसका मतलब यह है कि एक मेला है, जिसमें 8 अरब लोग अलग-अलग दिशाओं में चल रहे हैं। ये 8 अरब लोग एक ही जगह पर हैं, लेकिन इनकी दिशा थोड़ी-सी अलग है। इस घमासान में आपको रास्ता मिल जाए और आप जहां जाना चाहते हैं वहां तक पहुंच जाएं, ये कोई हंसी-खेल नहीं है, क्योंकि बाकी लोग भी चल रहे हैं लेकिन वे उस दिशा में नहीं जा रहे हैं जिधर आपको जाना है। वो कहीं और जा रहे हैं। हर आदमी कहीं और जा रहा है। जीवन के इस मेले में कभी-कभी ऐसा होगा कि आपको अपनी मर्जी का रास्ता मिल जाए। जैसे कि दस-बारह आदमी उसी दिशा में जा रहे हों, जो आपकी भी दिशा है तो आप तेजी से इस घमासान से निकल जाएंगे। कहीं ऐसा होगा कि लोग दूसरी तरफ जा रहे होंगे तो आप नहीं निकल पाएंगे; आप फंस जाएंगे। समाज में लोगों की कोशिश और ईगो की वजह से ये नए-नए पैटर्न बन जाते हैं। दुनिया में 8 अरब ईगो और 8 अरब प्रयास हो रहे हैं। उसमें कभी आपको रास्ता मिल पाता है, कभी नहीं भी मिलता, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि यदि आप प्रयास में लगे ही रहें, तो आपको रास्ता मिल ही जाएगा। हो सकता है कि रास्ता मिलने में थोड़ी देर लग जाए। और अगर लोगों की इस भीड़ में आप पीछे छूट गए तो ये सिर्फ बदनसीबी ही होगी। जिंदगी में सफलता रास्ते में आने वाली चट्टानों से टकराती है और अपना रास्ता तलाश लेती है। मुश्किल वक्त में आपको यह तय करना पड़ता है कि आप टूटेंगे या अपने लिए कोई रास्ता निकालेंगे। यही है लाइफ स्ट्रगल। जब आपको कोई रास्ता नहीं मिलता, तो अकसर लगता है कि शायद मेरा ही नसीब खराब है। आपको रास्ता नहीं मिल रहा होता है तब ऐसा महसूस होता है। जबकि किसी को फुर्सत नहीं है आपका नसीब खराब करने की। हर कोई अपनी दिशा में, अपने रास्ते जा रहा है। आप बेवजह अपने को इम्पोर्टेंस दे रहे हैं और सोच रहे हैं कि दुनिया आपको तंग कर रही है। जबकि सच यह है कि दुनिया को परवाह ही नहीं है आपकी। हो सकता है आप भी किसी के रास्ते की अड़चन बन रहे होंगे जो आपको पता नहीं है। आप सोचने लगें कि कोई ऊपर सातवें आसमान में एक बूढ़ा आदमी बैठा है, जिसकी लम्बी सफेद दाढ़ी है जो सबकुछ कमांड करता है। उससे अगर मैं मांगूं तो वह रास्ता बनवा देगा, लेकिन सवाल है कि किस-किस का रास्ता बनवाएगा वो? भौतिक रूप से ये संभव नहीं है। एक ही चीज संभव है कि आप कोशिश करते रहिए कि आपको वो रास्ता मिले। जब आप प्रयास में लगे ही रहेंगे तो आप हमेशा फंसे थोड़ी ही रहेंगे। मिल ही जाएगा रास्ता। फिर थोड़ी दूर तक जल्दी-जल्दी निकल जाएंगे। अगर फिर फंस जाएं तो फिर कोशिश कीजिएगा। यही है जिंदगी। जिंदगी इस मेले में ही रहने का नाम है। इस मेले में रास्ता ढूंढने का नाम है। इस मेले में हर आदमी जहां अलग-अलग दिशाओं में जा रहा है, वहां आप अपनी दिशा तय करें कि आप कहां जाना चाहते हैं और किसी भी तरह से, चाहे मर-खप के, अपना रास्ता बनाएं। यही स्ट्रगल है और इसे ही हम लाइफ स्ट्रगल, जीवन संघर्ष कहते हैं। संघर्ष हमारी जिंदगी का कोई अलग हिस्सा नहीं है, बल्कि वह जिंदगी का ही हिस्सा है। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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