Explainer: अनफिट इंडिया? ऑस्ट्रेलिया से क्यों नहीं सीखता BCCI, जानें क्यों रिहैब से निकलते ही दोबारा चोटिल हो रहे हैं भारतीय खिलाड़ी
Explainer: भारतीय स्टार स्पिनर वरुण चक्रवर्ती साइड स्ट्रेन के कारण अफगानिस्तान के खिलाफ टी20 सीरीज और आगामी एशियन गेम्स से बाहर हो गए हैं. हैरान करने वाली बात यह है कि वह पैर की मांसपेशी की चोट से उबरने के बाद ठीक दो महीने के रिहैब से लौटे थे, लेकिन सिर्फ एक मैच में चार ओवर गेंदबाजी करते ही दोबारा चोटिल हो गए. वरुण चक्रवर्ती अकेले ऐसे खिलाड़ी नहीं हैं. पिछले कुछ महीनों में जसप्रीत बुमराह, हार्दिक पांड्या, हर्षित राणा और नितिश कुमार रेड्डी जैसे कई खिलाड़ी बेंगलुरु स्थित बीसीसीआई के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) में हफ्तों बिताने के बाद मैदान पर लौटते ही दोबारा चोट की चपेट में आ चुके हैं. ऐसे में यह बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है कि भारतीय टीम के खिलाड़ी आखिर बार-बार चोटिल क्यों हो रहे हैं और हमारा फिटनेस सिस्टम कहां चूक रहा है? आइए इस ऑर्टिकल में समझने की कोशिश करते हैं.
वर्कलोड मैनेजमेंट और बिना ब्रेक का क्रिकेट
आधुनिक क्रिकेट का कैलेंडर बेहद बिजी हो चुका है. भारतीय खिलाड़ी साल के 12 महीने तीनों फॉर्मेट (टेस्ट, वनडे, टी20) के साथ-साथ 2 महीने आईपीएल की अत्यधिक दबाव वाली क्रिकेट खेलते हैं. पूर्व भारतीय दिग्गज सुनील गावस्कर ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि खिलाड़ी मशीन या गन्ना नहीं हैं जिनसे लगातार रस निकाला जा सके. एक सीरीज खत्म होते ही दूसरी सीरीज शुरू हो जाती है, जिससे शरीर को आराम देने का समय ही नहीं मिलता.
रिकवरी मैनेजमेंट की अनदेखी
चोट लगने से ज्यादा खतरनाक है खिलाड़ी का पूरी तरह ठीक न होना. स्पोर्ट्स साइंस विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय क्रिकेट में असली समस्या खिलाड़ियों के फिटनेस स्तर की नहीं, बल्कि 'रिकवरी मैनेजमेंट' (चोट से उबरने की प्रक्रिया) की है. जब कोई खिलाड़ी हाई-इंटेंसिटी वाले मैच खेलता है, तो उसकी मांसपेशियों और जोड़ों पर भारी दबाव पड़ता है. अगर मैचों के बीच में मांसपेशियों को आराम और सही थेरेपी नहीं मिलती, तो वे कमजोर हो जाती हैं और मैदान पर उतरते ही दोबारा टूट जाती हैं.
खिलाड़ियों को जल्दबाजी में मैदान पर उतारना
कई बार बड़े टूर्नामेंट्स या सीरीज के समीकरणों को देखते हुए खिलाड़ियों को उनकी तय रिकवरी टाइमलाइन से पहले ही मैदान पर उतार दिया जाता है. उदाहरण के लिए, तेज गेंदबाज हर्षित राणा को पूरी तरह फिट होने से पहले ही मैदान पर उतार दिया गया, जिससे वे दोबारा चोटिल हो गए. वरुण चक्रवर्ती के मामले में भी आईपीएल के दौरान पैर में हेयरलाइन फ्रैक्चर के बावजूद खेलने की खबरें आई थीं. यह 'जल्दबाजी' खिलाड़ियों के लंबे करियर के लिए घातक साबित हो रही है.
BCCI के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (CoE) पर उठते सवाल
खिलाड़ियों के बार-बार चोटिल होने के कारण बीसीसीआई का CoE (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस) भी गंभीर सवालों के घेरे में है. खिलाड़ियों की रिकवरी प्रोसेस को लेकर यहां की व्यवस्था पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं. जब वरुण चक्रवर्ती और जसप्रीत बुमराह जैसे स्टार खिलाड़ी यहां हफ्तों बिताने के बाद मैदान पर उतरते ही दोबारा चोटिल हो जाते हैं, तो पूरी व्यवस्था पर उंगली उठना लाजमी है. विशेषज्ञों और पूर्व क्रिकेटरों के अनुसार, इस सिस्टम में मुख्य रूप से निम्नलिखित कमियां सामने आ रही हैं:
स्पोर्ट्स साइंस हेड का पद खाली होना: मार्च 2025 में नितिन पटेल के जाने के बाद से करीब डेढ़ साल बीत चुके हैं, लेकिन बोर्ड अभी तक 'हेड ऑफ स्पोर्ट्स साइंस एंड मेडिसिन' के मुख्य पद पर किसी की स्थायी नियुक्ति नहीं कर सका है. नेतृत्व की इस कमी का सीधा असर खिलाड़ियों की मॉनिटरिंग पर पड़ रहा है.
कम्युनिकेशन गैप: रिपोर्टों के अनुसार मौजूदा समय में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के मेडिकल स्टाफ, राष्ट्रीय चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट के बीच आपसी तालमेल और संवाद में एक बड़ी खाई देखने को मिल रही है. खिलाड़ियों की फिटनेस रिपोर्ट और उनकी वापसी की टाइमलाइन को लेकर अलग-अलग विभागों के बीच 'कम्युनिकेशन ब्रेकडाउन' हो चुका है, जिसके कारण अनफिट खिलाड़ियों को भी जल्दबाजी में ग्रीन सिग्नल मिल जाता है.
कमजोर एसओपी (SOP): फिटनेस जांच के लिए साल 2023 में जो मानक (SOP) बनाए गए थे, उन्हें अपडेट नहीं किया गया है. अब फिटनेस टेस्ट सिर्फ 'मैच खेलने की बुनियादी क्षमता' जांचने तक सीमित रह गए हैं, न कि खिलाड़ी की लंबे समय तक फिटनेस देखने के लिए.
हर फॉर्मेट के लिए अलग ट्रेनिंग की कमी
टी20 में जहां विस्फोटक पावर की जरूरत होती है, वहीं टेस्ट क्रिकेट में लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता चाहिए होती है. खिलाड़ियों को एक फॉर्मेट से दूसरे फॉर्मेट में बिना किसी खास तैयारी या कस्टमाइज्ड कैंप के भेज दिया जाता है. अचानक बदले इस वर्कलोड को खिलाड़ियों का शरीर झेल नहीं पाता.
???? BIG BLOW FOR INDIA ❌
— Johns. (@CricCrazyJohns) September 16, 2026
- Varun Chakaravarthy ruled out of the Asian Games 2026. [Sports Today] pic.twitter.com/4qU9D82CLg
विदेशी टीमें हमसे कैसे अलग हैं?
अगर दुनिया के बाकी देशों को देखें, तो ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे बड़े क्रिकेट बोर्ड अपने स्टार खिलाड़ियों के आराम और फिटनेस को लेकर बेहद कड़क रुख अपनाते हैं. वे खिलाड़ियों को थकाकर बीमार करने में नहीं, बल्कि संभाल कर रखने में भरोसा करते हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण ऑस्ट्रेलियाई कप्तान पैट कमिंस हैं. जब उन्हें पीठ में चोट (स्ट्रेस फ्रैक्चर) की शिकायत हुई, तो एशेज जैसी दुनिया की सबसे बड़ी और अहम टेस्ट सीरीज होने के बावजूद उनके बोर्ड ने कोई रिस्क नहीं लिया. उन्हें जल्दबाजी में मैदान पर उतारने के बजाय जबरन आराम दिया गया, ताकि उनकी चोट पूरी तरह ठीक हो सके. इतना ही नहीं, विदेशी बोर्ड बड़े टूर्नामेंट्स के लिए अपने खिलाड़ियों को फ्रेश रखने के लिए उन्हें आईपीएल जैसी महंगी लीग्स तक को छोड़ने की सलाह देने से भी पीछे नहीं हटते.
BCCI को बाहर के बोर्ड से सीखने की है जरूरत
अगर टीम इंडिया को दुनिया में नंबर वन बने रहना है, तो सिर्फ कागजों पर मजबूत दिखने से काम नहीं चलेगा. मैदान पर मैच जिताने वाले खिलाड़ियों का पूरी तरह फिट होना जरूरी है. इसके लिए बीसीसीआई को अपने फिटनेस और रिहैब सिस्टम को पूरी तरह दुरुस्त करना होगा. बोर्ड को जरूरत पड़ने पर बड़े खिलाड़ियों को जबरन आराम देने जैसे कड़े फैसले भी लेने होंगे, फिर चाहे कोई बड़ा टूर्नामेंट ही क्यों न हो. चोटों को संभालने और खिलाड़ियों को लंबे समय तक फिट रखने के मामले में भारतीय सिस्टम को विदेशी क्रिकेट बोर्ड्स से सबक लेने की सख्त जरूरत है.
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पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र की 271 याचिकाएं खारिज
पूर्व सैन्य अधिकारियों को दिव्यांगता पेंशन दिए जाने से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राहत नहीं दी. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने केंद्र की ओर से दाखिल करीब 271 अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज कर दिया. ये मामले सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और अलग-अलग हाईकोर्ट के उन आदेशों से जुड़े थे, जिनमें पूर्व सैन्यकर्मियों को दिव्यांगता पेंशन का लाभ देने के निर्देश दिए गए थे.
मामले की शुरुआत उन पूर्व सैन्य अधिकारियों की शिकायतों से हुई, जिनकी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में उनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से जुड़ा या सैन्य सेवा के कारण बढ़ा हुआ नहीं माना गया था. मेडिकल बोर्ड की इस राय के आधार पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन का लाभ नहीं मिला. इसके बाद कई अधिकारियों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट का रुख किया. इन मंचों से उन्हें राहत मिलने के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के Entitlement Rules को लेकर केंद्र की दलीलों पर भी विचार किया. अदालत ने कहा कि नियमों में बदलाव के बावजूद दिव्यांगता पेंशन से जुड़ी पुरानी लाभकारी व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. कोर्ट के मुताबिक केवल यह बदलाव कि सैन्य सेवा में प्रवेश के समय व्यक्ति के पूरी तरह स्वस्थ होने की पुरानी धारणा को हटा दिया गया है, अपने आप में पेंशन से जुड़े मूल सिद्धांतों को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य स्थिति में अगर किसी पूर्व सैन्यकर्मी की सेवा के दौरान दिव्यांगता सामने आती है, तो यह साबित करने का भार सेना यानी नियोक्ता पर होगा कि उसकी दिव्यांगता सैन्य सेवा के कारण नहीं हुई और न ही सेवा की वजह से उसकी स्थिति खराब हुई. हालांकि, अदालत ने एक महत्वपूर्ण अपवाद भी बताया. अगर संबंधित व्यक्ति सैन्य सेवा से बाहर होने, रिटायरमेंट या रिलीज के 15 साल या उससे अधिक समय बाद दावा लेकर आता है, तो सबूत का भार दावेदार पर आ सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के महत्व को भी रेखांकित किया. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लंबित मामलों पर फैसला करते समय संबंधित न्यायाधिकरणों और अदालतों को बोर्ड की राय और उसके पीछे दिए गए कारणों की गंभीरता से जांच करनी होगी.
मौजूदा मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपीलों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया. अदालत ने देरी और मामले के गुण-दोष, दोनों आधारों पर अपीलें खारिज कर दीं. पीठ ने इस तरह के मामलों में लगातार चल रही मुकदमेबाजी पर भी चिंता जताई. कोर्ट के सामने रखे आंकड़ों के मुताबिक प्रथम अपीलीय स्तर पर बड़ी संख्या में दावे खारिज हुए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में रक्षा मंत्री की विशेषज्ञ समिति की उस सिफारिश का भी उल्लेख किया, जिसमें दिव्यांग सैनिकों से जुड़े इस तरह के लंबित मुकदमों को वापस लेने की बात कही गई थी. अदालत ने कहा कि उस सिफारिश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया. इस फैसले से उन पूर्व सैन्यकर्मियों के मामलों पर असर पड़ेगा, जिनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से असंबंधित मानते हुए पेंशन से वंचित किया गया था और जिन्होंने अदालतों या सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के जरिए राहत की मांग की थी.
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