पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, केंद्र की 271 याचिकाएं खारिज
पूर्व सैन्य अधिकारियों को दिव्यांगता पेंशन दिए जाने से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राहत नहीं दी. जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ ने केंद्र की ओर से दाखिल करीब 271 अपीलों और विशेष अनुमति याचिकाओं को खारिज कर दिया. ये मामले सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और अलग-अलग हाईकोर्ट के उन आदेशों से जुड़े थे, जिनमें पूर्व सैन्यकर्मियों को दिव्यांगता पेंशन का लाभ देने के निर्देश दिए गए थे.
मामले की शुरुआत उन पूर्व सैन्य अधिकारियों की शिकायतों से हुई, जिनकी मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट में उनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से जुड़ा या सैन्य सेवा के कारण बढ़ा हुआ नहीं माना गया था. मेडिकल बोर्ड की इस राय के आधार पर उन्हें दिव्यांगता पेंशन का लाभ नहीं मिला. इसके बाद कई अधिकारियों ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट का रुख किया. इन मंचों से उन्हें राहत मिलने के बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने 2008 के Entitlement Rules को लेकर केंद्र की दलीलों पर भी विचार किया. अदालत ने कहा कि नियमों में बदलाव के बावजूद दिव्यांगता पेंशन से जुड़ी पुरानी लाभकारी व्यवस्था पूरी तरह खत्म नहीं हुई है. कोर्ट के मुताबिक केवल यह बदलाव कि सैन्य सेवा में प्रवेश के समय व्यक्ति के पूरी तरह स्वस्थ होने की पुरानी धारणा को हटा दिया गया है, अपने आप में पेंशन से जुड़े मूल सिद्धांतों को बदलने के लिए पर्याप्त नहीं है.
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्य स्थिति में अगर किसी पूर्व सैन्यकर्मी की सेवा के दौरान दिव्यांगता सामने आती है, तो यह साबित करने का भार सेना यानी नियोक्ता पर होगा कि उसकी दिव्यांगता सैन्य सेवा के कारण नहीं हुई और न ही सेवा की वजह से उसकी स्थिति खराब हुई. हालांकि, अदालत ने एक महत्वपूर्ण अपवाद भी बताया. अगर संबंधित व्यक्ति सैन्य सेवा से बाहर होने, रिटायरमेंट या रिलीज के 15 साल या उससे अधिक समय बाद दावा लेकर आता है, तो सबूत का भार दावेदार पर आ सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के महत्व को भी रेखांकित किया. अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. लंबित मामलों पर फैसला करते समय संबंधित न्यायाधिकरणों और अदालतों को बोर्ड की राय और उसके पीछे दिए गए कारणों की गंभीरता से जांच करनी होगी.
मौजूदा मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपीलों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया. अदालत ने देरी और मामले के गुण-दोष, दोनों आधारों पर अपीलें खारिज कर दीं. पीठ ने इस तरह के मामलों में लगातार चल रही मुकदमेबाजी पर भी चिंता जताई. कोर्ट के सामने रखे आंकड़ों के मुताबिक प्रथम अपीलीय स्तर पर बड़ी संख्या में दावे खारिज हुए थे.
सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में रक्षा मंत्री की विशेषज्ञ समिति की उस सिफारिश का भी उल्लेख किया, जिसमें दिव्यांग सैनिकों से जुड़े इस तरह के लंबित मुकदमों को वापस लेने की बात कही गई थी. अदालत ने कहा कि उस सिफारिश को पूरी तरह लागू नहीं किया गया. इस फैसले से उन पूर्व सैन्यकर्मियों के मामलों पर असर पड़ेगा, जिनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से असंबंधित मानते हुए पेंशन से वंचित किया गया था और जिन्होंने अदालतों या सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के जरिए राहत की मांग की थी.
जीडीपी से नहीं जमीन पर नजर आए बदलाव
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से भारत की तरक्की का जश्न मनाने के लिए कहते हुए 7.8% की शानदार जीडीपी ग्रोथ के लिए बधाई दी। सवाल यह है कि क्या आम आदमी देश में जीडीपी ग्रोथ को समझता है। क्या जीडीपी बढ़ना देश की मौजूदा समस्याओं के समाधान का कोई पैमाना है। देश में जब प्रधानमंत्री जीडीपी बढ़ोतरी की घोषणा कर रहे थे, उसी दिन कमर्शियल एलपीजी के दाम में बढ़ोतरी हो गई है। दिल्ली में इसके दाम में 9.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। दिल्ली में अब कमर्शियल सिलेंडर की कीमत 2747.50 रुपये, मुंबई में 2701 रुपये और चेन्नई में 2916.50 रुपये हो गई है। कमर्शियल सिलेंडर के महंगे होने से होटल, ढाबे आदि में खाना-पीना महंगा होना तय है। वहीं घर मिलने वाली चीजों के दाम में भी बढ़ोतरी हो सकती है। इसके अलावा 5 किलो वाले गैस सिलेंडर का भी दाम 2 रुपये बढ़कर 764 रुपये हो गया है।
मुंबई और तमिलनाडु में दूध महंगा हो गया है। बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने थोक दूध की कीमतों में 9 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की है। इससे दूध की थोक दर 93 रुपये से बढ़कर 102 रुपये प्रति लीटर हो गई है। भारत में जुलाई-अगस्त 2026 के दौरान खाद्य महंगाई दर बढ़कर 5.52% हो गई है, जिसके कारण चीनी, प्याज, टमाटर, दाल और खाना पकाने के तेल जैसी जरूरी रसोई की चीजें महंगी हो गई हैं. चावल और दूध के दाम भी स्थिर से लेकर उच्च स्तर पर बने हुए हैं।
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महंगाई बढ़ने के कारण प्याज (22.54%), लहसुन (35.36%) और अदरक (83.62%) की कीमतों में भारी तेजी आई है। ईंधन और परिवहन महंगाई बढ़कर 4.43% हो गई है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ी है। रेस्त्रां और आवास सेवाओं की महंगाई दर बढ़कर लगभग 7.72% हो गई है। देश के आम आदमी को हर दिन होने वाली कठिनाईयों से जूझना पड़ रहा है। देश का मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग को जीडीपी की ग्रोथ से अंतर तब पड़ता है, जब उनकी बुनियादी सुविधाओं कोई बेहतरी नजर आए।
देश में पानी, बिजली, स्कूल, अस्पताल, सड़क, रोजगार, महंगाई जैसी बुनियादी समस्याओं की भरमार है। इनसे राहत मिलती भी है तो उूंट के मुंह में जीरे जितनी। इससे बदलाव नजर नहीं आता। भारत की आधी से अधिक आबादी यानी करीब 60 करोड़ लोग गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। देश के भूजल का बड़ा हिस्सा आर्सेनिक, फ्लोराइड और अन्य भारी धातुओं (हैवी मेटल्स) की वजह से दूषित हो चुका है। बारिश का पर्याप्त पानी होने के बावजूद उचित हार्वेस्टिंग (संचयन) न होने के कारण पानी बेकार बह जाता है। नीति आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, साफ पीने का पानी न मिलने के कारण हर साल देश में करीब 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
वर्ष 2026 में भीषण गर्मी, रिकॉर्ड बिजली मांग (मई 2026 में 270 गीगावाट से अधिक) और स्थानीय रख-रखाव के कारण उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, ओडिशा और तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों के इलाकों में आंशिक या अस्थायी कटौती की गई।
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेघरता की दर प्रति 10,000 लोगों पर 13 है। अर्थात 17 प्रतिशत लोगों को पास अपना घर नहीं है। देश के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत गांवों में स्थानीय स्तर पर कोई भी बुनियादी चिकित्सा सुविधा या स्वास्थ्य केंद्र उपलब्ध नहीं है। ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों और सर्जनों की भारी कमी है, जो लगभग 80 प्रतिशत तक खाली पड़े हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों (2014-15 से 2024-25) में देश भर में करीब 94,000 सरकारी स्कूल बंद या आपस में मर्ज किए गए हैं। इसका मतलब है कि औसतन हर दिन 25 स्कूलों पर ताला लगा है। इसी दशक में सरकारी स्कूलों में कुल छात्रों का नामांकन 2.26 करोड़ कम हुआ है, जो 2014-15 के 26.95 करोड़ से घटकर 2024-25 में 24.69 करोड़ रह गया है। देश के एक लाख से अधिक स्कूलों में आज भी बिजली की उचित सुविधा नहीं है, और कई स्थानों पर पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। 71,959 स्कूलों में लड़कियों के लिए और 1.12 लाख स्कूलों में लड़कों के लिए काम करने वाले शौचालय मौजूद नहीं हैं। 1.39 लाख स्कूलों में लाइब्रेरी और 2.65 लाख स्कूलों में खेल का मैदान नहीं है। डिजिटल लाइब्रेरी का अभाव तो लगभग 13.62 लाख स्कूलों में है।
भारत में 15 से 29 वर्ष के युवाओं की बेरोज़गारी दर जून 2026 में बढ़कर 16.2% हो गई है, 15–29 आयु वर्ग की महिलाओं में यह दर बढ़कर 20.7% हो गई। इसी आयु वर्ग के पुरुषों में यह दर 14.6% दर्ज की गई। जून 2026 में शहरी युवा बेरोज़गारी दर 18.2% और ग्रामीण युवा बेरोज़गारी दर 15.1% रही। नीति आयोग की बहुआयामी गरीबी सूचकांक रिपोर्ट के अनुसार, सबसे अधिक गरीबी वाले राज्य बिहार में 51.91% आबादी गरीब है। झारखंड मे 42.16% लोग गरीबी में जीवन बिता रहे हैं। उत्तर प्रदेश में 37.79% जनसंख्या गरीब है। मध्य प्रदेश में 36.65% लोग गरीब हैं।
भारत में सबसे अमीर 10% लोगों के पास कुल संपत्ति का लगभग 65% हिस्सा है. सबसे ज़्यादा कमाई करने वाले 10% लोग राष्ट्रीय आय का 58% हिस्सा पाते हैं जबकि सबसे निचले 50% लोगों को सिर्फ़ 15% मिलता है। आर्थिक असमानता की यह खाई लगातार बढ़ती जा रही है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री का यह हक है कि जीडीपी की ग्रोथ पर खुशी मनाने का आह्वान करें पर जब तक इसका असर देश की मूल समस्याओं के निराकरण में नजर नहीं आएगा, देश के लोगों की उदासी दूर नहीं होगी।
- योगेन्द्र योगी
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