UPI MDR पर CEO नितिन कामथ का समर्थन, बोले- डिजिटल पेमेंट के बढ़ते दायरे में यह कदम जरूरी
UPI MDR: जेरोधा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नितिन कामथ ने व्यक्ति से व्यापारी (पी2एम) यूपीआई भुगतान पर हाल ही में लागू किए गए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि यूपीआई का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने के बाद इस तरह का कदम किसी न किसी समय उठाया जाना लगभग तय था।
कामथ के मुताबिक, यूपीआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच एमडीआर लागू होने से डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। हालांकि, इसका असर ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी पड़ सकता है और उनके लिए यह एक नई चुनौती बन सकती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए एक पोस्ट में कामथ ने कहा कि एमडीआर लागू होने से यूपीआई इकोसिस्टम में मौजूदा एकाग्रता को कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में यूपीआई बाजार का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल तीन ऐप्स के पास है और नया शुल्क ढांचा अधिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकता है।
क्या बोले कामथ?
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यूपीआई पर एमडीआर किसी न किसी समय लागू होना ही था, खासकर तब जब यूपीआई का उपयोग इतने व्यापक स्तर पर हो चुका है। इससे अधिक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल सकती है।" हालांकि कामथ ने कहा कि प्रस्तावित एमडीआर संरचना कुछ क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती, विशेष रूप से निवेश और ब्रोकिंग कारोबार के लिए।
समझाया पूरा तरीका
उन्होंने बताया कि ब्रोकर्स के पास यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं होता कि यूपीआई के जरिए उनके खातों में ट्रांसफर किया गया पैसा आखिरकार किसी ट्रेड में इस्तेमाल होगा या नहीं। ग्राहक फंड ट्रांसफर करने के बाद ट्रेड करें, इसके लिए ब्रोकर्स उन्हें बाध्य नहीं कर सकते। ऐसे में यदि यूपीआई शुल्क का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला जा सकता तो ब्रोकर्स को लागत उठानी पड़ सकती है, जबकि उससे कोई अतिरिक्त राजस्व नहीं मिलेगा।
कामथ ने दिया उदाहरण
उदाहरण देते हुए कामथ ने कहा कि यदि 10,000 ग्राहक एक महीने में 2 लाख रुपए के 50-50 यूपीआई ट्रांसफर करें और बाद में कोई ट्रेड न करें, तो प्रस्तावित एमडीआर व्यवस्था के तहत किसी ब्रोकर पर लगभग 2 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। उन्होंने त्रैमासिक निपटान (क्वार्टरली सेटलमेंट-क्यूएस) नियमों का भी उल्लेख किया, जिसके तहत ब्रोकर्स को हर महीने या तिमाही में ग्राहकों के अप्रयुक्त फंड वापस उनके बैंक खातों में भेजने होते हैं।
कामथ ने कहा कि ग्राहक अक्सर यह राशि फिर से अपने ब्रोकिंग खातों में जमा करते हैं और ऐसे आधे से अधिक ट्रांसफर यूपीआई के माध्यम से होते हैं। इससे बार-बार फंड ट्रांसफर पर ब्रोकर्स को यूपीआई शुल्क देना पड़ सकता है, जबकि उनके राजस्व में कोई अतिरिक्त बढ़ोतरी नहीं होती।
उनका कहना है कि यूपीआई पर एमडीआर लागू करने के पीछे तर्क मजबूत है, लेकिन निवेश और ब्रोकिंग जैसे क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि डिजिटल भुगतान की बढ़ती लागत उद्योग पर अनावश्यक बोझ न बने।
(DISCLAIMER: खबर IANS न्यूज फीड से ली गई है. न्यूजनेशन खबर में किए गए किसी भी डेटा और फैक्ट्स की पुष्टि नहीं करता है.)
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