Explainer: भारत-पाकिस्तान के बीच समंदर में टकराव! पाकिस्तानी 'गुस्ताखी' पर मोदी सरकार ने उठाया ये बड़ा कदम
अरब सागर में भारतीय नौसेना के जहाज के बेहद करीब आया एक पाकिस्तानी युद्धपोत अब कूटनीतिक विवाद की शक्ल ले चुका है. दरअसल, भारत सरकार ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए पाकिस्तानी पक्ष के सामने सख्त एतराज दर्ज कराया है. मोदी सरकार ने पाक को ये साफ किया कि यह हरकत दोनों देशों के बीच बरसों पुराने समझौते के खिलाफ है.आइए आपको बताते हैं कि दोनों देशों के बीच ऐसे मामलों से निपटने के लिए 1991 का समझौता क्या है? भारत ने किस आधार पर पाक पर कार्रवाई की है.
भारत-पाकिस्तान के बीच आखिर विवाद की जड़ क्या है?
भारत ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि पाकिस्तानी युद्धपोत का व्यवहार अप्रैल 1991 में हुए भारत-पाकिस्तान समझौते के अनुच्छेद 10 के मुताबिक नहीं था. इसी आधार पर नई दिल्ली ने पाकिस्तान उच्चायोग के जरिए कड़ा विरोध दर्ज कराया है. बता दें मामला तब और गंभीर हो गया जब समुद्र में तय सुरक्षित दूरी बनाए रखने के बजाय पाकिस्तानी पोत भारतीय नौसैनिक इकाई के बेहद नजदीक आ गया जिसे नौवहन सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक माना जाता है.
The Pakistani Naval warship involved in the incident is PNS Hunain. The ship is an Offshore Patrol Vessel of the Yarmook class of the Pakistan Navy: Sources https://t.co/l0Jylf7xKj pic.twitter.com/XLiHA1phM1
— ANI (@ANI) September 16, 2026
भारत-पाकिस्तान के बीच 1991 का समझौता क्या है?
6 अप्रैल 1991 को भारत और पाकिस्तान के बीच एक अहम रक्षा-भरोसा समझौता हुआ था, जिसका मकसद दोनों देशों की सेनाओं के बीच अनजाने में होने वाले टकराव या गलतफहमी को रोकना था. इस व्यवस्था के तहत दोनों पक्षों को सैन्य अभ्यास, बड़ी सैन्य गतिविधियों और सैनिकों की आवाजाही की पहले से जानकारी एक-दूसरे को देनी होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक इसका एक अहम प्रावधान यह भी है कि समुद्र में तैनात दोनों देशों के नौसैनिक जहाज अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक-दूसरे के बहुत नजदीक आने से बचें, ताकि किसी भी तरह की भिड़ंत या गलत संकेत जाने का खतरा न रहे.
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समुद्र में इतनी सतर्कता क्यों जरूरी है?
थल सेना और वायुसेना के उलट, दोनों देशों की नौसेनाएं शांति के दौर में भी समुद्र में एक-दूसरे के आसपास मौजूद रह सकती हैं, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र किसी एक देश की सीमा में नहीं आता. इसके अलावा बता दें बीते कुछ समय में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई सख्त राजनयिक कदम उठाए हैं. पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तानी उच्चायोग में तैनात अधिकारियों की संख्या घटाई थी और रक्षा सलाहकारों को देश छोड़ने का आदेश दिया था. सिंधु जल संधि को स्थगित रखा गया है, और सीमा व्यापार से लेकर वीजा छूट तक कई कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं.
क्या पहले भी ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं?
इस पहले भी ऐसी घटनएं हो चुकी हैं, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2011 में पाकिस्तानी नौसेना का जहाज पीएनएस बाबर भारतीय नौसेना के जहाज आईएनएस गोदावरी के बेहद करीब आ गया था. उस समय भारत ने पाकिस्तान उच्चायोग के नौसैनिक सलाहकार को रक्षा मंत्रालय तलब कर औपचारिक विरोध पत्र सौंपा था. भारत का कहना था कि उस घटना में पाकिस्तानी युद्धपोत ने समुद्र में टक्कर रोकने से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ-साथ इसी 1991 के समझौते के अनुच्छेद 10 का भी उल्लंघन किया था. उस वाकये में भारतीय जहाज से उड़ान भर रहे हेलीकॉप्टर के सुरक्षा जाल को भी नुकसान पहुंचा था, जो बताता है कि दूरी कितनी कम रह गई थी.
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भारत ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं?
ताजा घटनाक्रम में भारत सरकार ने पाकिस्तानी पक्ष को औपचारिक तौर पर तलब कर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है. साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि इस तरह के आचरण को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और भविष्य में दोनों देशों की नौसेनाओं को तय सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करना होगा. भारत की तरफ से यह रुख इसलिए भी अहम है क्योंकि मौजूदा दौर में दोनों देशों के बीच पहले से ही तनावपूर्ण रिश्ते चल रहे हैं.
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UPI MDR पर CEO नितिन कामथ का समर्थन, बोले- डिजिटल पेमेंट के बढ़ते दायरे में यह कदम जरूरी
UPI MDR: जेरोधा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नितिन कामथ ने व्यक्ति से व्यापारी (पी2एम) यूपीआई भुगतान पर हाल ही में लागू किए गए मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि यूपीआई का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर होने के बाद इस तरह का कदम किसी न किसी समय उठाया जाना लगभग तय था।
कामथ के मुताबिक, यूपीआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच एमडीआर लागू होने से डिजिटल पेमेंट के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। हालांकि, इसका असर ब्रोकिंग प्लेटफॉर्म्स पर भी पड़ सकता है और उनके लिए यह एक नई चुनौती बन सकती है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किए गए एक पोस्ट में कामथ ने कहा कि एमडीआर लागू होने से यूपीआई इकोसिस्टम में मौजूदा एकाग्रता को कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में यूपीआई बाजार का 95 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल तीन ऐप्स के पास है और नया शुल्क ढांचा अधिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे सकता है।
क्या बोले कामथ?
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि यूपीआई पर एमडीआर किसी न किसी समय लागू होना ही था, खासकर तब जब यूपीआई का उपयोग इतने व्यापक स्तर पर हो चुका है। इससे अधिक प्रतिस्पर्धा भी देखने को मिल सकती है।" हालांकि कामथ ने कहा कि प्रस्तावित एमडीआर संरचना कुछ क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती, विशेष रूप से निवेश और ब्रोकिंग कारोबार के लिए।
समझाया पूरा तरीका
उन्होंने बताया कि ब्रोकर्स के पास यह सुनिश्चित करने का कोई तरीका नहीं होता कि यूपीआई के जरिए उनके खातों में ट्रांसफर किया गया पैसा आखिरकार किसी ट्रेड में इस्तेमाल होगा या नहीं। ग्राहक फंड ट्रांसफर करने के बाद ट्रेड करें, इसके लिए ब्रोकर्स उन्हें बाध्य नहीं कर सकते। ऐसे में यदि यूपीआई शुल्क का बोझ ग्राहकों पर नहीं डाला जा सकता तो ब्रोकर्स को लागत उठानी पड़ सकती है, जबकि उससे कोई अतिरिक्त राजस्व नहीं मिलेगा।
कामथ ने दिया उदाहरण
उदाहरण देते हुए कामथ ने कहा कि यदि 10,000 ग्राहक एक महीने में 2 लाख रुपए के 50-50 यूपीआई ट्रांसफर करें और बाद में कोई ट्रेड न करें, तो प्रस्तावित एमडीआर व्यवस्था के तहत किसी ब्रोकर पर लगभग 2 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। उन्होंने त्रैमासिक निपटान (क्वार्टरली सेटलमेंट-क्यूएस) नियमों का भी उल्लेख किया, जिसके तहत ब्रोकर्स को हर महीने या तिमाही में ग्राहकों के अप्रयुक्त फंड वापस उनके बैंक खातों में भेजने होते हैं।
कामथ ने कहा कि ग्राहक अक्सर यह राशि फिर से अपने ब्रोकिंग खातों में जमा करते हैं और ऐसे आधे से अधिक ट्रांसफर यूपीआई के माध्यम से होते हैं। इससे बार-बार फंड ट्रांसफर पर ब्रोकर्स को यूपीआई शुल्क देना पड़ सकता है, जबकि उनके राजस्व में कोई अतिरिक्त बढ़ोतरी नहीं होती।
उनका कहना है कि यूपीआई पर एमडीआर लागू करने के पीछे तर्क मजबूत है, लेकिन निवेश और ब्रोकिंग जैसे क्षेत्रों की विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अलग व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए, ताकि डिजिटल भुगतान की बढ़ती लागत उद्योग पर अनावश्यक बोझ न बने।
(DISCLAIMER: खबर IANS न्यूज फीड से ली गई है. न्यूजनेशन खबर में किए गए किसी भी डेटा और फैक्ट्स की पुष्टि नहीं करता है.)
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