स्वतंत्र भारद्वाज को तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत, पटियाला हाउस कोर्ट का आदेश
Patiala House Court: जंतर-मंतर पर हुए सीजेपी प्रदर्शन के दौरान छात्र कार्यकर्ता के पिता से कथित मारपीट के मामले में आरोपी स्वतंत्र भारद्वाज को बड़ी राहत मिली है. दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने उन्हें तीन हफ्ते की अंतरिम जमानत दे दी है. यह आदेश अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह ललर ने पारित किया.
नियमित जमानत की थी मांग
स्वतंत्र भारद्वाज ने अदालत से नियमित जमानत की मांग की थी. सुनवाई के दौरान अदालत ने उन्हें फिलहाल तीन सप्ताह के लिए अंतरिम राहत दी. हालांकि, इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने मामले में लगाए गए आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष दे दिया है. मामले की कानूनी कार्यवाही आगे भी जारी रहेगी.
जुलाई में जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़ा है मामला
यह मामला जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए कॉकरेच जनता पार्टी यानी सीजेपी के प्रदर्शन से जुड़ा है. आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान एक छात्र कार्यकर्ता के पिता के साथ स्वतंत्र भारद्वाज ने मारपीट की थी. इस मामले में पुलिस ने उन्हें 5 सितंबर को उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार किया था.
इस मामले में उनके खिलाफ मारपीट के साथ-साथ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून की धाराएं भी लगाई गई हैं. इसके अलावा उनके खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत एक अलग एफआईआर दर्ज होने की बात भी सामने आई है.
शुरुआती एफआईआर में लगी थीं ये धाराएं
शुरुआत में दर्ज एफआईआर में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 115(2) और 126(2) के तहत मामला दर्ज किया था. इनमें साधारण चोट पहुंचाने और किसी व्यक्ति को गलत तरीके से रोकने से जुड़े अपराध शामिल हैं. बाद में मामले में और गंभीर धाराएं जोड़ी गईं.
बाद में जातिसूचक टिप्पणी का आरोप जुड़ा
पुलिस के मुताबिक, मामले में शिकायतकर्ता के बाद में दर्ज किए गए बयान में जातिसूचक टिप्पणी किए जाने का आरोप भी सामने आया. इसी आधार पर एससी/एसटी एक्ट की धाराएं जोड़ी गईं. दिल्ली पुलिस ने अदालत में यह भी बताया कि शुरुआती शिकायत में जातिसूचक टिप्पणी का जिक्र नहीं था, लेकिन बाद में दिए गए बयान में इसका उल्लेख किया गया.
बचाव पक्ष ने गिरफ्तारी को राजनीतिक कार्रवाई बताया
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने स्वतंत्र भारद्वाज की गिरफ्तारी को राजनीतिक वजहों से की गई कार्रवाई बताया. उनके वकील उमेश चंद्र शर्मा ने अदालत में दलील दी कि घटना के दौरान शिकायतकर्ता ने ही पहले हमला किया था. बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि इस संबंध में एक वीडियो मौजूद है, लेकिन पुलिस ने शिकायतकर्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की.
शिकायतकर्ता पक्ष ने आरोपों का किया विरोध
वहीं शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील स्वाति खन्ना ने इन दलीलों का विरोध किया. उनकी ओर से आरोप लगाया गया कि स्वतंत्र भारद्वाज ने शिकायतकर्ता के खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया था. यह भी दावा किया गया कि एक वीडियो में भारद्वाज ने खुद हमला करने की बात स्वीकार की है.
हाईकोर्ट ने पहले खारिज की थी याचिका
इससे पहले स्वतंत्र भारद्वाज ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया था. उन्होंने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका यानी हेबियस कॉर्पस के जरिए गिरफ्तारी को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की थी. हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी. फिलहाल पटियाला हाउस कोर्ट के आदेश के बाद भारद्वाज को तीन सप्ताह की अंतरिम जमानत मिली है. मामले में दोनों पक्षों की दलीलें और पुलिस की जांच आगे भी जारी रहेगी. अदालत के सामने लगाए गए आरोपों पर अंतिम फैसला अभी बाकी है.
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NSE CO-Location Case: चित्रा रामकृष्ण को SC से राहत नहीं, भ्रष्टाचार कानून के तहत चलेगा मुकदमा
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई से जुड़े चर्चित को-लोकेशन मामले में एनएसई की पूर्व प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी चित्रा रामकृष्ण को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत चल रही कार्यवाही में दखल देने से इनकार कर दिया है. यानी उनके खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ सकेगी.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि चित्रा रामकृष्ण का यह सवाल कि एनएसई जैसे निजी संस्थान के अधिकारी को भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लोक सेवक माना जा सकता है या नहीं, निचली अदालत के सामने उठाया जा सकता है. अदालत ने इस मुद्दे पर फिलहाल कोई अंतिम राय नहीं दी है.
क्या है एनएसई का को-लोकेशन मामला?
यह मामला शेयर बाजार में इस्तेमाल होने वाली को-लोकेशन व्यवस्था से जुड़ा है. केंद्रीय जांच ब्यूरो के मुताबिक, साल 2010 से 2014 के बीच कुछ चुनिंदा शेयर दलालों को एनएसई के कारोबार वाले सर्वरों तक कथित तौर पर दूसरों की तुलना में बेहतर और तेज पहुंच हासिल थी.
को-लोकेशन व्यवस्था में शेयर दलालों के सर्वर एनएसई के कारोबार वाले सर्वर के नजदीक लगाए जाते हैं. इसका मकसद कारोबार के आदेशों को तेजी से भेजना होता है. शेयर बाजार में कुछ सेकेंड या उससे भी कम समय का अंतर कारोबार पर असर डाल सकता है. इसलिए इस व्यवस्था में सभी कारोबारियों को बराबर मौका मिलना बेहद जरूरी माना जाता है.
जांच एजेंसी का आरोप है कि इस व्यवस्था का फायदा कुछ चुनिंदा दलालों को मिला. आरोप यह भी है कि उन्हें बाजार से जुड़ी जानकारी तक दूसरे कारोबारियों की तुलना में पहले पहुंच मिल सकती थी. मामले की जांच आगे बढ़ने पर एनएसई के कई पूर्व अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई.
चित्रा रामकृष्ण पर क्या सवाल उठे?
चित्रा रामकृष्ण उस समय एनएसई की शीर्ष अधिकारी थीं. जांच के दौरान उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठे और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत कार्रवाई की गई.
रामकृष्ण की ओर से अदालत में मुख्य दलील यह रही कि एनएसई एक निजी कंपनी है. ऐसे में उसके अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लोक सेवक की श्रेणी में कैसे आ सकते हैं. उनका कहना था कि इस कानून के तहत कार्रवाई के लिए यह जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति सार्वजनिक कर्तव्य निभा रहा हो.
उनकी ओर से यह भी कहा गया कि एनएसई कोई सरकारी विभाग नहीं है और उसके अधिकारी सरकारी कर्मचारी नहीं हैं. ऐसे में भ्रष्टाचार निवारण कानून को उनके मामले में लागू नहीं किया जाना चाहिए.
दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या कहा था?
यही सवाल पहले दिल्ली हाईकोर्ट के सामने भी उठा था. हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया.अदालत ने माना कि केवल एनएसई के निजी संस्था होने के आधार पर उसके अधिकारियों को भ्रष्टाचार निवारण कानून के दायरे से बाहर नहीं किया जा सकता.
अदालत ने एनएसई की शेयर बाजार में भूमिका और उसके काम से जुड़े व्यापक सार्वजनिक हित को भी ध्यान में रखा. हालांकि हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा था कि चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं.अदालत का फैसला केवल इस बात तक सीमित था कि उनके खिलाफ अभियोजन को शुरुआती स्तर पर नहीं रोका जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चित्रा रामकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. वहां भी उनकी ओर से यही सवाल उठाया गया कि एनएसई के अधिकारी भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लोक सेवक नहीं माने जा सकते. सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि चित्रा रामकृष्ण अपने पद पर रहते हुए सार्वजनिक कर्तव्य निभा रही थीं या नहीं, यह सवाल मुकदमे की सुनवाई के दौरान निचली अदालत के सामने उठाया जा सकता है. इसका मतलब यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण को दोषी नहीं ठहराया है. अदालत ने सिर्फ उनके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया को रोकने से इनकार किया है.
आरोपों पर अंतिम फैसला अभी बाकी
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं. आरोपों की सच्चाई का फैसला मुकदमे के दौरान पेश किए जाने वाले दस्तावेजों, गवाहों और दूसरे सबूतों के आधार पर होगा. बचाव पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा. इसके बाद ही अदालत यह तय करेगी कि आरोप साबित होते हैं या नहीं.
क्यों अहम है यह मामला?
एनएसई देश के प्रमुख शेयर बाजारों में शामिल है. ऐसे में उसके कामकाज में पारदर्शिता और वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही का मुद्दा काफी अहम है. इस मामले में बड़ा सवाल यही है कि निजी संस्था में काम करने वाला अधिकारी किन परिस्थितियों में सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाला व्यक्ति माना जा सकता है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने चित्रा रामकृष्ण के खिलाफ कार्रवाई रोकने से इनकार किया है. अब मामले में को-लोकेशन व्यवस्था, अधिकारियों की भूमिका और जांच एजेंसी के सबूतों पर आगे सुनवाई होगी. आरोप सही हैं या नहीं, इसका अंतिम फैसला अभी होना बाकी है.
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