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स्तन कैंसर से बचाव की पहली सीढ़ी है जागरूकता, इन बदलावों पर दें ध्यान

नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। स्तन कैंसर महिलाओं में होने वाले प्रमुख कैंसर में से एक है। इसकी शुरुआती पहचान और समय पर चिकित्सीय मूल्यांकन से आगे की देखभाल और उपचार की दिशा तय करने में मदद मिल सकती है। इसलिए अपने शरीर में होने वाले बदलावों को समझना और उन्हें लेकर सजग रहना बेहद जरूरी है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर बताया कि स्तन में नई गांठ या कोई कठोर हिस्सा महसूस होना ऐसा बदलाव है, जिस पर ध्यान देना चाहिए। हर गांठ कैंसर नहीं होती। कई बार गांठ के पीछे सामान्य कारण भी हो सकते हैं। फिर भी अगर स्तन में कोई नई गांठ महसूस हो, खासकर जो बनी रहे या समय के साथ बदलती महसूस हो, तो डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

अगर स्तन के आकार, स्वरूप या बनावट में अचानक कोई बदलाव दिखाई दे, तो उसे नजरअंदाज न करें। दोनों स्तनों के आकार में थोड़ा अंतर सामान्य हो सकता है, लेकिन किसी एक स्तन में नया और असामान्य बदलाव नजर आए तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।

स्तन की त्वचा पर लालिमा, मोटापन, सूजन, गड्ढे जैसा दिखना या बनावट में अचानक बदलाव भी ध्यान देने योग्य संकेत हो सकते हैं। ऐसे बदलावों का कारण संक्रमण या कोई दूसरी समस्या भी हो सकती है, इसलिए केवल लक्षण देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय विशेषज्ञ से जांच कराना सही कदम है।

निप्पल या उसके आसपास की त्वचा में अचानक परिवर्तन, जैसे निप्पल का अंदर की ओर खिंचना, त्वचा में बदलाव या लगातार किसी तरह की परेशानी महसूस होना, डॉक्टर को बताना चाहिए।

यदि निप्पल से बिना दबाए अपने आप कोई असामान्य स्राव निकलता है, खासकर अगर उसमें खून दिखाई दे, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी है।

सबसे जरूरी बात यह है कि इनमें से कोई भी एक लक्षण दिखने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को स्तन कैंसर ही है। लेकिन शरीर में नया या असामान्य बदलाव लगातार बना रहे, तो डॉक्टर से संपर्क करने में देरी नहीं करनी चाहिए।

--आईएएनएस

पीआईएम/एएस

डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.

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धड़ाम होने वाली हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें? तेल के दामों पर ट्रंप ने किया बड़ा दावा

दुनियाभर में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने सरकारों से लेकर आम उपभोक्ताओं तक की चिंता बढ़ा दी है. ईरान के साथ सैन्य टकराव, होर्मूज जलडमरूमध्य में तनाव और सऊदी अरब की अहम तेल पाइपलाइन के बंद होने से ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर दबाव बढ़ा है. इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तेल की कीमतों को लेकर बड़ा दावा किया है.

ट्रंप का कहना है कि ईरान के साथ सैन्य टकराव खत्म होते ही कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से गिरावट आ सकती है. उनका मानना है कि मौजूदा संकट लंबे समय तक नहीं चलेगा और तेल बाजार जल्द सामान्य स्थिति में लौट सकता है.

लेकिन सवाल यह है कि जब अभी सप्लाई को लेकर इतनी चिंता है, तब क्या वाकई युद्ध खत्म होते ही तेल की कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं? इसे समझने के लिए मौजूदा संकट के कई पहलुओं पर गौर करना जरूरी है.

होर्मूज संकट ने बढ़ाई तेल बाजार की चिंता

कच्चे तेल की मौजूदा तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण मध्य पूर्व में बढ़ा तनाव है. दुनिया के लिए होर्मूज जलडमरूमध्य बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है. फारस की खाड़ी से निकलने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से की आवाजाही इसी रास्ते से होती है.

ईरान की ओर से इस क्षेत्र में निगरानी और सैन्य गतिविधियां बढ़ने से बाजार में यह आशंका पैदा हुई कि अगर होर्मूज में तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई तो वैश्विक बाजार में सप्लाई की बड़ी कमी हो सकती है.

तेल बाजार में केवल वास्तविक सप्लाई ही कीमत तय नहीं करती, बल्कि भविष्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका भी कीमतों को तेजी से ऊपर ले जा सकती है.

सऊदी अरब की पाइपलाइन बंद होने से बढ़ा दबाव

इसी बीच सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को नुकसान पहुंचने की खबर ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी. यह पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका इस्तेमाल कच्चे तेल को लाल सागर की तरफ पहुंचाने के लिए किया जाता है, जिससे कुछ तेल को होर्मूज जलडमरूमध्य से बचाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक भेजा जा सकता है.

रिपोर्टों के मुताबिक, इराक से छोड़े गए ड्रोन के हमले में पाइपलाइन को नुकसान पहुंचा. इसके बाद सऊदी अरब ने पाइपलाइन को बंद कर दिया. हालांकि, रियाद ने नुकसान की पूरी जानकारी और इसे दोबारा चालू करने की समयसीमा सार्वजनिक नहीं की है.

इस घटनाक्रम ने बाजार में यह डर पैदा किया कि मध्य पूर्व से तेल की वैकल्पिक आपूर्ति क्षमता भी फिलहाल प्रभावित हो सकती है.

ब्रेंट क्रूड 108 डॉलर के करीब

सप्लाई को लेकर बढ़ती चिंताओं का सीधा असर तेल की कीमतों पर दिखाई दिया. अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड करीब 108 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI भी 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया.

यह तेजी केवल मौजूदा सप्लाई में कमी की वजह से नहीं है. बाजार भविष्य की संभावित परिस्थितियों को भी कीमतों में शामिल करता है. अगर निवेशकों को लगता है कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है और तेल की आवाजाही और प्रभावित हो सकती है, तो वे पहले ही ऊंची कीमतों पर खरीदारी शुरू कर देते हैं.

ट्रंप को क्यों भरोसा है कि तेल सस्ता होगा?

डोनाल्ड ट्रंप की दलील का आधार यह है कि मौजूदा तेजी मुख्य रूप से भू-राजनीतिक संकट से पैदा हुई है. अगर ईरान के साथ सैन्य टकराव समाप्त होता है और होर्मूज जलडमरूमध्य में सामान्य स्थिति लौटती है, तो सप्लाई को लेकर बाजार का डर कम हो सकता है.

जैसे ही जोखिम का प्रीमियम घटेगा, तेल की कीमतों पर भी दबाव कम होने की संभावना है. यही वजह है कि ट्रंप ने मौजूदा महंगे तेल को व्यापक महंगाई के बीच एक अस्थायी अपवाद बताया और कहा कि कीमतों में जल्द तेज गिरावट आ सकती है.

हालांकि, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष किस तरह खत्म होता है और तेल उत्पादन तथा परिवहन व्यवस्था कितनी जल्दी सामान्य होती है.

बाइडेन पर भी ट्रंप ने साधा निशाना

ट्रंप ने अमेरिका में ऊर्जा कीमतों को लेकर पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन पर भी हमला बोला. उन्होंने दावा किया कि बाइडेन के कार्यकाल में तेल की कीमतें मौजूदा स्तर की तुलना में अधिक थीं और अमेरिका में कीमतों में बढ़ोतरी के लिए पिछला प्रशासन जिम्मेदार था.

ट्रंप ने मौजूदा महंगाई और ऊर्जा कीमतों का राजनीतिक बचाव करते हुए कहा कि उनके प्रशासन को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए.

यह बयान ऐसे समय आया है जब तेल की कीमतों में तेजी अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आने वाले मध्यावधि चुनावों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकती है.

क्या युद्ध खत्म होते ही तेल 100 डॉलर के नीचे आ जाएगा?

यह कहना अभी मुश्किल है. युद्ध या सैन्य टकराव खत्म होना निश्चित रूप से बाजार के लिए सकारात्मक संकेत होगा, लेकिन तेल की कीमतें कई दूसरे कारकों पर भी निर्भर करती हैं.

सबसे पहले यह देखना होगा कि ईरान का तेल उत्पादन और निर्यात कितनी जल्दी सामान्य होता है. दूसरा सवाल होर्मूज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही का है. तीसरा, सऊदी अरब की बंद पाइपलाइन कितने समय में चालू होती है.

इसके अलावा रूस, सऊदी अरब और दूसरे प्रमुख तेल उत्पादकों की उत्पादन नीति भी कीमतों को प्रभावित करेगी. यदि वैश्विक मांग कमजोर होती है और उत्पादन पर्याप्त बना रहता है, तो कीमतों में गिरावट ज्यादा तेज हो सकती है.

भारत के लिए क्यों अहम है कच्चे तेल की कीमत?

भारत अपनी जरूरत के बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल का आयात करता है. इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत के आयात बिल, रुपये की विनिमय दर और महंगाई पर पड़ सकता है.

महंगा कच्चा तेल पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ परिवहन, लॉजिस्टिक्स, प्लास्टिक, केमिकल और कई अन्य उत्पादों की लागत बढ़ा सकता है. इसके विपरीत अगर ट्रंप का अनुमान सही साबित होता है और क्रूड तेजी से नीचे आता है, तो भारत को आयात लागत में राहत मिल सकती है.

हालांकि, इसका फायदा तभी ज्यादा दिखाई देगा जब वैश्विक तेल कीमतों में गिरावट पर्याप्त समय तक बनी रहे और घरेलू ईंधन कीमतों में भी उसका असर दिखाई दे.

आगे बाजार किस दिशा में जाएगा?

फिलहाल तेल बाजार पूरी तरह मध्य पूर्व के घटनाक्रम पर नजर लगाए हुए है. संघर्ष लंबा चलता है तो सप्लाई जोखिम बढ़ सकता है और कीमतों में फिर तेजी आ सकती है. वहीं तनाव जल्दी खत्म होता है, होर्मूज में आवाजाही सामान्य होती है और सऊदी अरब समेत प्रमुख उत्पादकों की सप्लाई बहाल होती है तो कीमतों में तेज करेक्शन संभव है.

इसलिए ट्रंप का दावा बाजार के लिए एक संभावित परिदृश्य जरूर बताता है, लेकिन इसे निश्चित भविष्यवाणी मानना जल्दबाजी होगी. तेल की कीमतों की असली दिशा इस बात से तय होगी कि ईरान संकट कितनी जल्दी खत्म होता है और वैश्विक सप्लाई नेटवर्क कितनी तेजी से सामान्य स्थिति में लौटता है.

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