जिनपिंग के दिल्ली पहुंचने से पहले आई खुशखबरी, भारत के लिए फिर शुरू होंगी इस एयरलाइंस की उड़ान
BRICS Summit 2026: चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत आ रहे हैं. ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए उनके दिल्ली पहुंचने से पहले दोनों देशों के संबंधों को लेकर बड़ा सकारात्मक संकेत मिला है. दरअसल, चीन और भारत के बीच तनाव के चलते पिछले 6 साल से बंद नई दिल्ली-ग्वांगझोऊ उड़ान सेवा फिर से शुरू होने जा रही है. चीन की चाइना सदर्न एयरलाइन्स ने कहा है कि वह 21 सितंबर से एक बार फिर दोनों देशों के बीच विमान सेवा शुरू करेगी.
एक सप्ताह में 100 उड़ानों का होगा संचालन
इसके साथ ही चाइना सदर्न एयरलाइन्स ने कहा है कि उड़ान सेवाएं दोबारा शुरू होने के बाद एक सप्ताह में करीब 100 उड़ानों का संचालन किया जाएगा. बता दें कि इससे पहले इसी साल अप्रैल की शुरुआत में ही नई दिल्ली से बीजिंग की विमान सेवा शुरू हो गई थी. इसके साथ ही 18 अप्रैल से कोलकाता और कुनमिंग के बीच भी हवाई यात्रा फिर से बहाल हो गई थी.
China Southern Airlines announced on Saturday that it will resume regular passenger services on the Guangzhou-New Delhi route starting September 21, marking the relaunch of China Southern's India service after a six-year suspension. Following the restart, the airline will run… pic.twitter.com/DKHVNlGnmf
— Global Times (@globaltimesnews) September 12, 2026
2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद खराब हुए थे संबंध
दिल्ली पहुंचे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
चीनी प्रतिनिधिमंडल में शामिल 400 सदस्य
हरीश रावत का इस्तीफा 2027 के चुनाव पर कितना डालेगा असर, क्या BJP को मिलेगा फायदा?
उत्तराखंड की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत के संगठनात्मक पदों से हटने की पेशकश ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले नई सियासी बहस छेड़ दी है. यह कदम ऐसे समय आया है जब रावत के करीबी सहयोगी चंदन सिंह जीना से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई चर्चा में है. एजेंसी के मुताबिक, यह कार्रवाई 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी यानी VPDO परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के तहत हुई है.
ऐसे में सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि हरीश रावत ने पद छोड़ने की पेशकश क्यों की, बल्कि यह भी है कि इसका असर कांग्रेस की चुनावी रणनीति और 2027 के सियासी नैरेटिव पर कितना पड़ सकता है.
पद छोड़ने की पेशकश के पीछे क्या है सियासी गणित?
रावत के फैसले को सबसे पहले कांग्रेस को संभावित राजनीतिक नुकसान से बचाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. कांग्रेस उत्तराखंड में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कथित भ्रष्टाचार और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर भाजपा सरकार को घेरने की तैयारी कर रही है.
ऐसे में यदि विपक्षी दल के किसी वरिष्ठ नेता के करीबी व्यक्ति से जुड़ी पुरानी भर्ती परीक्षा की जांच राजनीतिक बहस का केंद्र बनती है, तो कांग्रेस के हमले की धार प्रभावित हो सकती है.
रावत का पद छोड़ने का प्रस्ताव इसी असहज स्थिति को अलग करने की कोशिश माना जा सकता है. संदेश यह हो सकता है कि जांच को पार्टी की मौजूदा राजनीतिक रणनीति से जोड़कर कांग्रेस को निशाना न बनाया जाए और यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ ठोस सबूत हैं तो कानून अपना काम करे.
कांग्रेस के लिए असली चिंता भर्ती का मुद्दा
उत्तराखंड में सरकारी नौकरियां और भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता लंबे समय से युवाओं के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दे रहे हैं. कांग्रेस भाजपा सरकार पर भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक और रोजगार के सवालों को लेकर लगातार हमलावर रही है.
लेकिन 2016 की VPDO परीक्षा से जुड़ी जांच ने कांग्रेस के लिए मुश्किल पैदा कर दी है. जिस भर्ती व्यवस्था को लेकर पार्टी भाजपा सरकार से जवाब मांगती रही है, उसी क्षेत्र में कांग्रेस शासनकाल की पुरानी परीक्षा की जांच सामने आने से भाजपा को पलटवार का अवसर मिल सकता है.
अब भाजपा यह सवाल उठा सकती है कि सत्ता में रहते हुए कांग्रेस के दौर में भर्ती प्रक्रियाएं कितनी पारदर्शी थीं.
क्या BJP को सीधे राजनीतिक फायदा मिलेगा?
भाजपा के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को अपनी प्रमुख राजनीतिक उपलब्धियों में शामिल किया है.
सरकार की ओर से बड़ी संख्या में सरकारी नियुक्तियों और नकल विरोधी कानून को भी उपलब्धियों के रूप में सामने रखा जाता रहा है. ऐसे में पुरानी भर्ती प्रक्रिया की जांच को भाजपा इस संदेश के साथ जोड़ सकती है कि उसकी सरकार पिछली सरकारों के कार्यकाल की कथित गड़बड़ियों पर भी कार्रवाई कर रही है.
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू भी है. किसी व्यक्ति के यहां जांच या तलाशी होना अपने आप में अपराध साबित नहीं करता. अंतिम जिम्मेदारी और दोष का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के परिणाम से ही होगा.
हरीश रावत का कदम कितना नुकसान कम कर सकता है?
राजनीतिक तौर पर रावत के सामने दो संभावनाएं हैं. यदि कांग्रेस नेतृत्व उनके पद छोड़ने के प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो वह यह तर्क दे सकते हैं कि उन्होंने पार्टी को किसी संभावित विवाद से बचाने के लिए संगठनात्मक जिम्मेदारी से दूरी बनाई.
वहीं यदि पार्टी उनका प्रस्ताव स्वीकार नहीं करती, तो भी रावत इसे अपने खिलाफ किसी आरोप से बचने की कोशिश के बजाय संगठन के प्रति अपनी जिम्मेदारी के रूप में पेश कर सकते हैं.
इस तरह दोनों परिस्थितियों में उनका व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव पूरी तरह खत्म होना जरूरी नहीं है.
'राजनीतिक बलिदान' का संदेश भी?
हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं और राज्य की राजनीति में उनका अपना प्रभाव है. वह पहले ही संकेत दे चुके हैं कि 2027 का विधानसभा चुनाव लड़ने की उनकी इच्छा नहीं है, हालांकि कांग्रेस के लिए सक्रिय रहने की बात कही है.
ऐसे में संगठनात्मक पद छोड़ने की पेशकश को एक तरह के राजनीतिक त्याग के संदेश के रूप में भी देखा जा सकता है. इसका मकसद यह दिखाना हो सकता है कि व्यक्तिगत पद से ज्यादा पार्टी और चुनावी रणनीति महत्वपूर्ण है.
हालांकि इसका वास्तविक राजनीतिक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि कांग्रेस और भाजपा इस घटनाक्रम को आने वाले महीनों में किस तरह जनता के सामने रखते हैं.
BJP के लिए भी आसान नहीं होगी लड़ाई
यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इस मामले से भाजपा को स्वतः चुनावी फायदा मिल जाएगा. उत्तराखंड के मतदाताओं के लिए केवल पिछली सरकारों की जांच ही मुद्दा नहीं होगी.
युवाओं का सवाल यह भी होगा कि मौजूदा सरकार की भर्ती व्यवस्था कितनी तेज, पारदर्शी और भरोसेमंद है. लंबित भर्तियों, परीक्षा प्रक्रिया और सरकारी नौकरियों में अवसर को लेकर भी विपक्ष भाजपा से सवाल पूछ सकता है.
इसलिए भाजपा के लिए पुरानी भर्ती जांच को राजनीतिक मुद्दा बनाना तभी प्रभावी होगा, जब उसके साथ मौजूदा सरकार की उपलब्धियों का ठोस रिकॉर्ड भी जनता के सामने रखा जाए.
जांच की दिशा तय करेगी चुनावी नैरेटिव
आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण यह रहेगा कि जांच कहां तक पहुंचती है. यदि जांच किसी व्यक्ति विशेष तक सीमित रहती है और तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व से कोई प्रत्यक्ष संबंध सामने नहीं आता, तो कांग्रेस इसे भाजपा की राजनीतिक रणनीति बताने की कोशिश कर सकती है.
इसके उलट यदि जांच में ऐसे दस्तावेज या साक्ष्य सामने आते हैं जो तत्कालीन सत्ता व्यवस्था से किसी प्रत्यक्ष भूमिका को जोड़ते हैं, तो कांग्रेस के लिए राजनीतिक मुश्किल बढ़ सकती है.
यानी फिलहाल चुनावी असर का आकलन जांच के शुरुआती चरण में ही अंतिम रूप से करना संभव नहीं है.
युवाओं के लिए असली सवाल क्या है?
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग उत्तराखंड के युवाओं के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि यदि किसी भर्ती परीक्षा में अनियमितता हुई थी, तो उसका लाभ किसे मिला और नुकसान किन अभ्यर्थियों को उठाना पड़ा.
किस स्तर पर कथित गड़बड़ी हुई, परीक्षा से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका क्या थी और जिम्मेदार लोगों तक जांच कब पहुंचेगी ये सवाल चुनावी बयानबाजी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
यदि जांच केवल छापेमारी और बरामदगी तक सीमित रहती है, तो उसका राजनीतिक प्रभाव सीमित रह सकता है. लेकिन यदि पूरी प्रक्रिया में जिम्मेदारी तय होती है और अदालत के स्तर पर भी मामला आगे बढ़ता है, तो इसका चुनावी असर कहीं बड़ा हो सकता है.
2027 में रोजगार बन सकता है बड़ा चुनावी मुद्दा
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की जमीन अभी से तैयार हो रही है. रोजगार, पलायन, भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे आने वाले चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं.
हरीश रावत प्रकरण ने इसी बहस को और तेज कर दिया है. कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह भाजपा पर भ्रष्टाचार और भर्ती को लेकर हमला जारी रखते हुए अपने शासनकाल से जुड़े पुराने मामलों पर भी विश्वसनीय जवाब दे.
वहीं भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह पुराने मामलों को मुद्दा बनाने के साथ-साथ अपने शासनकाल की भर्ती प्रक्रिया और रोजगार के आंकड़ों पर भी जनता का भरोसा कायम रखे.
आखिर किसे होगा फायदा?
फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि हरीश रावत के इस्तीफे से सीधे तौर पर भाजपा को चुनावी फायदा मिलेगा. लेकिन इतना जरूर है कि इस घटनाक्रम ने कांग्रेस के उस नैरेटिव को चुनौती दी है, जिसमें भर्ती और भ्रष्टाचार को भाजपा सरकार के खिलाफ प्रमुख हथियार बनाया जा रहा था.
रावत का पद छोड़ने का कदम कांग्रेस को संभावित राजनीतिक नुकसान से कुछ हद तक अलग करने की कोशिश हो सकता है, लेकिन चुनावी राजनीति में किसी फैसले का असर केवल उसके इरादे से तय नहीं होता. जांच की दिशा, सामने आने वाले साक्ष्य, कांग्रेस की प्रतिक्रिया और भाजपा की रणनीति ये सभी मिलकर इसका प्रभाव तय करेंगे.
2027 में असली मुकाबला सिर्फ हरीश रावत बनाम भाजपा नहीं होगा. लड़ाई इस बात पर होगी कि उत्तराखंड के युवा किस पार्टी पर भर्ती में पारदर्शिता, रोजगार और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं.
यह भी पढ़ें - PA पर ED की कार्रवाई के अगले दिन हरीश रावत का इस्तीफा, भर्ती घोटाले पर दी सफाई
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation






.jpg)
