भारत में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की तस्वीरें इस वक्त पूरी दुनिया में तहलका मचा रही हैं। जिस तरह से दुनिया के शक्तिशाली नेताओं के साथ पीएम मोदी की केमिस्ट्री देखने को मिली उसने भारत के दुश्मनों के पेट में दर्द कर दिया। इस दौरान पीएम मोदी ने ब्रिक्स सदस्य देशों के सामने जो एजेंडा रखा और उस पर सबकी एक साथ जो सहमति देखने को मिली उससे साफ हो गया कि आने वाले दिनों में भारत दुनिया में एक बहुत बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है। वो बदलाव जिन देशों की मनमानी पर रोक लगाएगा जो महाशक्ति की सनद में कुछ भी करने के लिए तैर रहते हैं।
ब्रिक्स में रूस और भारत की धूम तो देखने को मिली ही। साथ ही उस चीन ने भी कमाल कर दिया जो दशकों से पाकिस्तान का सदाबहार दोस्त बना हुआ था और भारत के साथ सीमा विवाद को बढ़ावा दे रहा था। भारत से चीन जाते-जाते राष्ट्रपति जिनपिंग क्या बड़ा धमाका कर गए कि जिसने अमेरिका और पाकिस्तान को हिला कर रख दिया। साथ ही बताऊंगा कि पीएम मोदी के सामने जिनपिंग ने ऐसा क्या ऐलान किया कि भारत विरोधियों का दिमाग चकरा गया। दरअसल ब्रिक्स सम्मेलन से पहले भारत विरोधी और मोदी विरोधी लॉवी ने खूब झूठ फैलाने की कोशिशें की। सबसे ज्यादा झूठ जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर फैलाया कि वह भारत नहीं आएंगे। इससे जताने की कोशिश की गई कि यह मोदी सरकार की विदेश नीति की विफलता है। लेकिन जैसे ही जिनपिंग भारत पहुंचे तो उनके सीने पर सांप लौट गया। कहा गया कि जिनपिंग ना तो सीमा विवाद पर बात करेंगे ना ही भारत के साथ संबंधों को ठीक करने पर जोर देंगे। यानी कि वह खानापूर्ति करके चीन चले जाएंगे। लेकिन हुआ इसके उलट। जिनपिंग ने वो सब कर दिया।
जिसकी भारत के दुश्मनों को उम्मीद भी नहीं थी। सबसे पहले आपको जिनपिंग के बयान के बारे में बताता हूं जिसने सबको चौंका दिया है। दरअसल पीएम मोदी के साथ द्विपक्षीय बैठक के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि जटिल अंतरराष्ट्रीय हालात जिनमें कई तरह के बदलाव और चुनौतियां शामिल हैं। उन्हें देखते हुए दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों और ग्लोबल साउथ के अहम सदस्य होने के नाते चीन और भारत की बड़ी जिम्मेदारियां हैं। उन्होंने आगे कहा कि चीन हमेशा रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से भारत चीन संबंधों को देखता और विकसित करता आया है। पिछले दो सालों में मेरी और पीएम मोदी की दो बार मुलाकात हुई है। इस बातचीत ने दोनों देशों के रिश्तों को एक नई शुरुआत से नई ऊंचाई तक पहुंचा है। यही नहीं बल्कि जिनपिंग एक और सबसे बड़ी बात कहकर सबको चौंका दिए। जिनपिंग ने कहा कि भारत और चीन साझेदार हैं। प्रतिद्वंदी नहीं। वह एक दूसरे के विकास के लिए खतरा नहीं बल्कि अवसर पैदा करते हैं। यह रणनीतिक निर्णय दोनों देशों के विकास के चरणों और अंतरराष्ट्रीय परिवेश पर आधारित है और दोनों देशों के लोगों के साझा हितों को पूरा करता है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों को द्विपक्षीय संबंधों को आगे बढ़ाने और सीमा मुद्दे को समानांतर पटरियों पर सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए। तो इस तरह से जिनपिंग ने भारत और चीन के रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने के लिए बड़ी बातें कही।
पीएम मोदी और जिनपिंग के बीच किन मुद्दों पर सहमति बनी है। पहला यह कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलने दिया जाएगा। दूसरा सीमा विवाद का निष्पक्ष और स्वीकार्य समाधान तलाशा जाएगा और व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंधों को आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अलावा दोनों देशों के लोगों के बीच आवाजाही को बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही आर्थिक और व्यापारिक चिंताओं का समाधान तलाशा जाएगा। तो वहीं क्षेत्रीय और वैश्विक चुनौतियों पर सहयोग बढ़ाने के मुद्दे पर सहमति बनी है। खास बात यह है कि जब पीएम मोदी ने यूएन सिक्योरिटी काउंसिल में बदलाव करने की बात कही तो इस पर भी चीन सहमति जताता हुआ दिखाई दिया। तो वहीं ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के फाइनल डे पर पीएम मोदी का संबोधन सुनने के बाद जिनपिंग ने ग्रुप फोटो भी खिंचवाई। इस फोटो में पीएम मोदी के एक तरफ जिनपिंग तो दूसरी तरफ पुतिन खड़े दिखाई दिए जो एक अपने आप में बहुत बड़ा संदेश दे रही है।
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पश्चिमी देशों और अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों के बीच रूस ने बर्फीले आर्कटिक के सीने को चीर कर एक ऐसा तेल का खजाना खोल दिया है जिसने दुनिया के ऊर्जा समीकरण को हिला कर रख दिया। राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन भारत हैं। लेकिन वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उन्होंने साइबेरिया के सबसे बड़े बोस्तोक ऑयल प्रोजेक्ट से कच्चे तेल की पहली खेप को हरी झंडी दिखा दी है। अब यह खबर सिर्फ रूस तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत को मिलने जा रहा है। जमीन के नीचे दबा 700 करोड़ टन तेल का महाभंडार और भारत के लिए स्टेट ऑफ हॉर्मोज के संकट से हमेशा के लिए आजादी का रास्ता। रूस के उत्तरी साइबेरिया स्थित तैमीर प्रायद्वीप में शुरू हुआ वोक ऑयल प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा प्रोजेक्ट्स में से एक माना जा रहा है। अब इसका पहला पॉइंट है विशाल भंडार।
अनुमान के मुताबिक इस पूरे इलाके में करीब 700 करोड़ टन कच्चे तेल का भंडार मौजूद है। दूसरा पॉइंट है उत्पादन लक्ष्य। रूस का लक्ष्य साल 2027 की दूसरी छमाही तक इस प्रोजेक्ट से सालाना 3 करोड़ टन यानी कि 30 मिलियन टन कच्चा तेल निकालने का है। तीसरा पॉइंट है पैमाना। इसे समझने के लिए आंकड़ा देखिए। भारत ने पूरे वित्त वर्ष साल 2024-25 में कुल मिलाकर 2.87 करोड़ टन घरेलू तेल का उत्पादन किया था। यानी रूस के इस अकेले प्रोजेक्ट का शुरुआती लक्ष्य भारत के कुल सालाना घरेलू उत्पादन से भी ज्यादा है। अब -40 से 50° के तापमान में चल रहे इस मेगा प्रोजेक्ट में अब तक करीब 4.4 लाख करोड़ का भारी भरकम निवेश हो चुका है। यहां 500 से अधिक लोग काम कर रहे हैं और 16,000 से ज्यादा भारी मशीनें तैनात है। परिवहन के लिए 3500 मीटर लंबे रनवे वाला एक नया एयरपोर्ट भी तैयार किया जा रहा है।
प्रोजेक्ट का भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक महत्व क्या है?
वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% कच्चा तेल हॉर्मूज के संकरित समुद्री रास्ते से मंगाता है। जनवरी फरवरी 2026 के आंकड़े के मुताबिक इस रास्ते से भारत रोजाना करीब 26 लाख बैरल तेल आयात कर रहा था जो मुख्य रूप से इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आता है। लेकिन यह रास्ता हमेशा से बारूद के ढेर पर रहता है। अमेरिका, ईरान का तनाव ही देख लीजिए। खाड़ी में सैन्य तनाव, प्रतिबंध और टैंकरों पर हमलों के खतरे लगातार बने रहे हैं। दूसरा पॉइंट है इसका सप्लाई चेन का चोक पॉइंट। अगर हरमूज में कोई भी रुकावट आती है तो भारत में तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और वह देखा भी हमने है। यहीं पर पुतिन का वो स्टोक प्रोजेक्ट भारत के लिए गेम चेंजर साबित हुआ।
वो स्टोक प्रोजेक्ट से निकलने वाला तेल 790 कि.मी. लंबी पाइपलाइन के जरिए कारा सागर के बुक सेवेवर टर्मिनल तक पहुंचेगा। वहां से बड़े ऑयल टैंकरों के जरिए इसे सीधे भारत और अन्य देशों में भेजा जाएगा। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है। फायदा यह है रूस से आने वाले इन जहाजों और की संकरी खाड़ी से गुजरने की कोई जरूरत नहीं होगी। यह एक पूरी तरह स्वतंत्र और सुरक्षित समुद्री मार्ग है। जानकारों का मानना है कि इस प्रोजेक्ट के पूरी क्षमता से शुरू होने के बाद भारत की हॉर्मू पर निर्भरता घटकर लगभग आधी रह सकती है। यह केवल खरीदार और विक्रेता का हिस्सा नहीं है। भारत इस प्रोजेक्ट में एक अहम साझेदार है। चलिए अब जान लेते हैं भारत की 49.9% हिस्सेदारी और आर्थिक फायदे।
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