रिश्वतखोरी मामले में रेलवे के सीनियर सेक्शन इंजीनियर को हुई चार साल की सजा, 10 हजार रुपये जुर्माना भी लगा
UP News: गाजियाबाद की सीबीआई अदालत ने रिश्वतखोरी के एक मामले में रेलवे के तत्कालीन सीनियर सेक्शन इंजीनियर (इलेक्ट्रिकल), ट्रैक्शन डिस्ट्रीब्यूशन (TRD), मुख्यालय, सीनियर डिविजनल इलेक्ट्रिकल इंजीनियर कार्यालय, आगरा कैंट, आगरा निवासी सुख देव शर्मा को दोषी करार देते हुए चार साल के कारावास की सजा सुनाई है. अदालत ने दोषी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है.
क्या है मामला?
सीबीआई के मुताबिक, यह मामला 1 जनवरी 2016 को दर्ज किया गया था. आरोप था कि सुख देव शर्मा ने मुंबई स्थित एक निजी कंपनी के पांच ट्रेलर/वाहनों को आगरा के रेल गेट पथोल के पास रेलवे ट्रैक पार कराने की अनुमति देने के लिए शिकायतकर्ता से 70 हजार रुपये की अवैध रिश्वत की मांग की थी. शिकायत मिलने के बाद सीबीआई ने 1 जनवरी 2016 को ही जाल बिछाकर ट्रैप कार्रवाई की. इस दौरान आरोपी सुख देव शर्मा को शिकायतकर्ता से 35 हजार रुपये की रिश्वत मांगते और स्वीकार करते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया. सीबीआई के अनुसार, यह रकम मांगी गई रिश्वत की पहली किस्त थी और यह वैध पारिश्रमिक के अतिरिक्त अवैध रूप से ली जा रही थी.
CBI ने दाखिल किया आरोपपत्र, अब मिली सजा
मामले की जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 23 फरवरी 2016 को आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया. अदालत ने इसके बाद 21 मार्च 2016 को आरोप तय किए और मामले में सुनवाई शुरू हुई. सीबीआई की ओर से पेश साक्ष्यों और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अदालत ने आरोपी को रिश्वतखोरी के मामले में दोषी पाया. ट्रायल पूरा होने के बाद 10 सितंबर 2026 को गाजियाबाद की सीबीआई अदालत ने सुख देव शर्मा को चार वर्ष के कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई.
सीबीआई ने कहा कि यह मामला सरकारी पद पर रहते हुए अपने आधिकारिक दायित्व से संबंधित अनुमति देने के बदले अवैध रिश्वत मांगने और स्वीकार करने का है. अदालत के फैसले को भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही कार्रवाई के तहत महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
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लाल किला ब्लास्ट से पहले अरावली में की थी IED टेस्टिंग, NIA चार्जशीट में बड़ा खुलास
Delhi Red Fort Blast Update: NIA द्वारा दाखिल किए गए चौंकाने वाले आरोपपत्र से यह बात सामने आई है कि फरीदाबाद के सुनसान खेत और प्राचीन अरावली के जंगल किसी समय एक खतरनाक आतंकी मॉड्यूल की टेस्टिंग के मुख्य ठिकाने हुआ करते थे. जांच एजेंसी के मुताबिक, अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े तीन डॉक्टरों पर आत्मघाती हमले की खतरनाक साजिश रचने के दौरान इन्हीं जंगलों और खेतों में अत्याधुनिक आईईडी और हथियारों का गुप्त परीक्षण करने का गंभीर आरोप है. यह पूरी तैयारी उस भयानक विस्फोट से ठीक पहले चल रही थी, जिसने पिछले साल 10 नवंबर को लाल किले के पास लगभग 15 बेकसूर लोगों की जान ले ली थी.
खेतो से निकलकर अरावली की पहाड़ियों तक फैला था दायरा
जांच एजेंसी के अनुसार, इस पूरे मॉड्यूल के मुख्य चेहरों में शामिल उमर उन नबी, मुजम्मिल शकील गनई और अदील अहमद राथर ने विभिन्न विस्फोटक मिश्रणों के साथ कई बार खतरनाक प्रयोग किए थे. शुरुआत में इस संदिग्ध समूह ने आम उर्वरक आधारित मिश्रणों का सहारा लिया था, लेकिन बाद में इसकी विनाशक क्षमता को परखने के बाद वे अधिक खतरनाक माने जाने वाले विस्फोटक टीएटीपी की ओर आगे बढ़ गए. आरोपपत्र के मुताबिक, विस्फोटकों की यह टेस्टिंग यूनिवर्सिटी के ठीक पास से ही शुरू की गई थी. सितंबर और अक्टूबर के महीनों के दौरान उमर, गनई और एक छात्र जिसका नाम जसिर बिलाल वानी है, अल-फलाह परिसर के भीतर एक ट्यूबवेल के पास नाइट्रो-ग्लिसरीन का कथित परीक्षण किया था. एनआईए का यह भी दावा है कि इस खतरनाक सामग्री को आरोपी गनई के निजी फ्लैट के अंदर ही तैयार किया गया था. इसके बाद इन आरोपियों ने यूनिवर्सिटी के बाहरी हिस्से में स्थित एक खेत में छोटा टेस्ट ब्लास्ट किया और फिर धीरे-धीरे अपनी गतिविधियों को बढ़ाते हुए फरीदाबाद की अरावली पहाड़ियों में स्थित धौज के घने जंगलों तक पहुंच गए.
धौज के जंगलों में टीएटीपी और हथियारों के खौफनाक परीक्षण
एनआईए के आरोपपत्र में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि धौज के वन क्षेत्रों में उमर और गनई ने टीएटीपी के कई अतिरिक्त परीक्षणों को अंजाम दिया था. इनमें से एक परीक्षण के दौरान इस्तेमाल किए गए पाइप जैसे संदिग्ध उपकरण के अवशेष भी बाद में जांच के दौरान बरामद किए जाने का दावा किया गया है. इसके अलावा, अक्टूबर और नवंबर 2024 के दौरान जब अदील अल-फलाह आया हुआ था, तब गनई, अदील और यूनिवर्सिटी के फार्माकोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर शाहीन अहमद अंसारी ने धौज के ही एक अन्य जंगली इलाके में क्रिंकोव राइफल का कथित रूप से परीक्षण किया था.
लाखों रुपयों की फंडिंग और हथियारों की खरीद-फरोख्त
जांच एजेंसी ने एसोसिएट प्रोफेसर शाहीन अहमद अंसारी पर अंसार गजवत-उल-हिंद संगठन के सदस्यों को करीब 16 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि मुहैया कराने का भी गंभीर आरोप लगाया है. एनआईए के अनुसार, यह पैसा गनई के माध्यम से आगे पहुंचाया गया था जिसका मुख्य इस्तेमाल एक क्रिंकोव राइफल, एक एके-47 और दो पिस्तौल जैसे घातक हथियार खरीदने के लिए किया गया था. आरोपपत्र में इस बात का भी जिक्र है कि खोरी जमालपुर और धौज इलाकों में जो ठिकाने किराए पर लिए गए थे, उनका असल मकसद रसायनों, परीक्षण उपकरणों और इन खतरनाक विस्फोटकों को आम लोगों की नजरों से छिपाकर सुरक्षित रखना था.
छात्र की तकनीकी मदद
इस पूरे आतंकी षड्यंत्र में काजीगुंड के रहने वाले छात्र जसिर बिलाल वानी की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है जिस पर मॉड्यूल को तकनीकी और रसद संबंधी सहायता देने का आरोप है. एनआईए के मुताबिक, वह लगातार अल-फलाह आता-जाता रहता था, विस्फोटक बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से मदद करता था और कच्चे माल को सुरक्षित रूप से किराए के कमरों तक पहुंचाने का काम संभालता था. एजेंसी का यह भी आरोप है कि वानी ने उमर के कमरे में रहने के दौरान रॉकेट जैसे दिखने वाले आईईडी भी तैयार किए थे. इस तरह से इस पूरे समूह ने बेहद सुनियोजित तरीके से विस्फोटक तैयार करने, उनके सफल परीक्षण करने और साजो-सामान को अलग-अलग ठिकानों पर ठिकाने लगाने का ताना-बाना बुना था.
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