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दैनिक अंक ज्योतिष (Dainik Ank Jyotish 10 September 2026): निकल न जाए सुनहरा मौका, हौसले को जगाकर नए काम की करें शुरुआत

Daily Numerology: किसी काम के शत-प्रतिशत सही होने का इंतजार करके उसे टालें नहीं, बल्कि सही समय पर उसकी शुरुआत कर दें. खुद की देखभाल और सेहत का ध्यान रखें.

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बुक रिव्यू- भारतीय राजनीति में लोहिया का योगदान:आजादी की लड़ाई से लेकर समाजवादी आंदोलन तक, लोहिया को समझने के लिए पढ़ें ये किताब

किताब: लोहिया (एक प्रामाणिक जीवनी) लेखक: ओंकार शरद प्रकाशक: लोकभारती मूल्य: 175 रुपए भारत की राजनीति में कुछ नेता ऐसे रहे हैं, जिन्हें उनके समय से कहीं ज्यादा बाद की पीढ़ियों ने समझने की कोशिश की। डॉ. राममनोहर लोहिया उन्हीं में से एक हैं। वे भारतीय राजनीति, समाज और लोकतंत्र को अपने अलग नजरिए से देखने वाले विचारक थे। लेखक ओंकार शरद की किताब ‘लोहिया एक प्रामाणिक जीवनी’ उनके व्यक्तित्व और विचारधारा को समझाने की कोशिश करती है। ओंकार शरद की किताब लोहिया के बचपन से शुरू होकर उनकी शिक्षा, गांधी से संबंध, स्वतंत्रता आंदोलन, जेल-यात्रा, समाजवादी राजनीति, जाति-विरोधी विचार, गैर-कांग्रेसवाद और उनके अंतिम दौर तक जाती है। किताब की खासियत किताब की खासियत यह है कि इसमें लोहिया के बड़े राजनीतिक विचारों के साथ उनके निजी स्वभाव और जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग भी हैं। जैसेकि- बचपन में उनका स्वभाव, पढ़ाई के प्रति उनका दृष्टिकोण, विदेश में बने अंग्रेज मित्रों से संबंध, जेल में यातना और अंतिम दिनों की बेचैनी। ओंकार ने डॉ. लोहिया के जीवन को करीब से देखा है। वे उनके सहयोगी भी रहे हैं। उन्होंने किताब में लोहिया के जीवन के अलग-अलग दौर को अलग अध्यायों में क्रमबद्ध किया है- ग्राफिक में लोहिया के जीवन के प्रमुख पड़ाव देखिए- अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाला स्वभाव लोहिया सामान्य परिवार से थे। लेकिन बचपन से ही उनके व्यक्तित्व में असाधारण जिद और संवेदनशीलता दिखाई देने लगी थी। किताब में उनके बचपन के कई प्रसंग आते हैं, जिनसे पता चलता है कि वे अन्याय को चुपचाप स्वीकार करने वालों में नहीं थे। बचपन में ही वे कमजोर पर होने वाले अत्याचार को लेकर बेचैन हो जाते थे। स्कूल के दिनों में भी उनका व्यवहार दूसरे बच्चों से अलग था। खेल, शरारत और पढ़ाई के बीच उनका व्यक्तित्व धीरे-धीरे तर्क, सवाल और विरोध की तरफ बढ़ रहा था। मां के निधन के बाद दादी और परिवार की दूसरी महिलाओं ने उनका पालन-पोषण किया। पिता हीरालाल का भी उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। आगे चलकर यही पारिवारिक संस्कार उनके भीतर निर्भीकता और सामाजिक बराबरी की भावना को मजबूत करते हैं। शिक्षा के साथ राजनीति की समझ लोहिया उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए। किताब का ‘लंदन नहीं, बर्लिन’ अध्याय इस दौर को खास तरीके से सामने रखता है। आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं, फिर भी वे विदेश जाकर पढ़ाई पूरी करने के लिए निकले। बर्लिन में रहते हुए लोहिया ने केवल पढ़ाई नहीं की, बल्कि यूरोप में चल रहे राजनीतिक बदलावों को भी करीब से देखा। जर्मनी में हिटलर के उभार का दौर था। इसी समय उनके सामने यह सवाल भी था कि जिस देश में वे पढ़ रहे हैं, वहां बढ़ती तानाशाही आगे क्या रूप लेगी। किताब के अनुसार लोहिया ने ‘नमक सत्याग्रह’ पर अपना शोध-प्रबंध पूरा किया और डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। लेकिन जर्मनी में बदलते राजनीतिक माहौल ने उन्हें वहां रुकने नहीं दिया। यह प्रसंग बताता है कि उनके लिए शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं थी। इसके साथ ही देश और समाज के सवाल भी लगातार उनके साथ चलते रहे। गांधी से प्रभावित, लेकिन अंध-समर्थक नहीं लोहिया के राजनीतिक जीवन को गांधी से अलग करके समझना मुश्किल है। किताब में गांधी और लोहिया के संबंधों को कई प्रसंगों के जरिए सामने लाया गया है। लोहिया गांधी के सत्याग्रह, अहिंसा और जन-आधारित राजनीति से प्रभावित थे। लेकिन वे गांधी के हर राजनीतिक फैसले से सहमत हों, ऐसा नहीं था। यही उनकी खासियत भी थी। वे सम्मान करते हुए असहमति जताने का साहस रखते थे। किताब में गांधी के साथ उनके संवाद और स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर उनके विचारों से यह स्पष्ट होता है कि लोहिया गांधी को केवल नेता नहीं, बल्कि नैतिक शक्ति के रूप में देखते थे। वहीं कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों को लेकर वे लगातार सवाल उठाते रहे। ग्राफिक में किताब की 10 खास बातें देखिए- जेल, यातना और संघर्ष लोहिया की राजनीतिक यात्रा का सबसे कठिन दौर 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ था। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आंदोलन में उनकी भूमिका सक्रिय थी। वे अंडरग्राउंड रहे, गिरफ्तार हुए और जेल में उन्हें कठोर यातनाएं दी गईं। किताब में लाहौर किले की जेल का वर्णन बेहद प्रभावशाली है। वहां पूछताछ और यातनाओं के बीच लोहिया को मानसिक और शारीरिक दबाव से तोड़ने की कोशिश की गई। लेकिन उन्होंने अपने विचारों से समझौता नहीं किया। जेल में यातना के बीच वे योग और आत्म-अनुशासन का सहारा लेते थे। वे दर्द को केवल सहते नहीं थे, बल्कि उसे समझने और उसके ऊपर मानसिक नियंत्रण पाने की कोशिश करते थे। लोहिया के लिए जेल स्वतंत्रता आंदोलन का केवल एक अध्याय नहीं थी। जेल उनके राजनीतिक चरित्र की परीक्षा थी। आजादी के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन लोहिया के लिए संघर्ष खत्म नहीं हुआ। किताब का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह आजादी के बाद के लोहिया को भी उतनी ही गंभीरता से देखती है। वे कांग्रेस के भीतर की राजनीति और सत्ता के केंद्रीकरण से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि आजादी का मतलब केवल अंग्रेजों का जाना नहीं, बल्कि समाज में बराबरी और आम आदमी की वास्तविक आजादी भी है। कांग्रेस से अलग होकर समाजवादी राजनीति को मजबूत करना इसी सोच का हिस्सा था। वे ‘सत्ता के विकल्प की जरूरत’ पर जोर देते रहे। समाजवादी सोच के प्रवर्तक लोहिया की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा जाति-विरोध और सामाजिक बराबरी से जुड़ा था। वे मानते थे कि भारत में आर्थिक असमानता के साथ जातिगत असमानता भी सत्ता और समाज को प्रभावित करती है। उनका जोर पिछड़े वर्गों को राजनीतिक हिस्सेदारी देने पर था। वे केवल यह नहीं चाहते थे कि पिछड़ों की स्थिति पर चर्चा हो। वे चाहते थे कि सत्ता और प्रशासन में उनकी वास्तविक भागीदारी बढ़े। सत्ता को चुनौती देने की रणनीति किताब का एक महत्वपूर्ण अध्याय है- ‘लोकसभा में, कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ’। लोहिया का मानना था कि लंबे समय तक एक ही पार्टी के सत्ता में रहने से लोकतंत्र कमजोर हो सकता है। इसलिए विपक्ष को मजबूत होना चाहिए। उनकी रणनीति का मकसद व्यक्तिगत सत्ता हासिल करना नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना था। अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों को कांग्रेस के खिलाफ एक मंच पर लाने की कोशिश इसी रणनीति का हिस्सा थी। आगे चलकर भारतीय राजनीति में गठबंधन और गैर-कांग्रेस राजनीति के जिस दौर की शुरुआत हुई, उसकी वैचारिक जमीन तैयार करने वालों में लोहिया का नाम प्रमुखता से आता है। लोकसभा में लोहिया किताब का अंतिम राजनीतिक दौर बेहद महत्वपूर्ण है। लोहिया ने संसद में पहुंचकर सत्ता से सवाल पूछने को अपनी राजनीति का माध्यम बनाया। वे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बड़े आलोचक थे और संसद में सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल उठाते थे। उनकी भाषा सीधी थी और शैली आक्रामक, लेकिन उसका उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं था। वे गरीबी, महंगाई, असमानता और आम आदमी की समस्याओं को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में लाना चाहते थे। लोहिया के लिए संसद सत्ता के साथ समझौते की जगह नहीं, सत्ता से सवाल पूछने की जगह थी। लोहिया की भाषा-शैली लोहिया की सबसे बड़ी ताकत उनकी राजनीतिक भाषा भी थी। वे जटिल विचारों को ऐसे वाक्यों में रखते थे, जो आम आदमी तक पहुंच सकें। उनके भाषणों में नारे थे, लेकिन उनके पीछे वैचारिक आधार भी था। यही वजह है कि दशकों बाद भी उनके कई राजनीतिक सूत्र भारतीय राजनीति में सुनाई देते हैं। किताब की खूबियां और सीमाएं इस जीवनी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह लोहिया को केवल ‘महान नेता’ बनाकर पेश नहीं करती। उनके संघर्ष, असहमति, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और निजी जीवन के प्रसंग साथ-साथ चलते हैं। यह किताब मुख्य रूप से जीवन और राजनीतिक यात्रा को समझने वाली जीवनी है। यह किताब किन्हें पढ़नी चाहिए, ग्राफिक में देखिए- किताब के बारे में मेरी राय किताब से पता चलता है कि लोहिया ने आजीवन संघर्ष किया। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई हो या आजाद भारत की सरकार से असहमति- उनके लिए सत्ता बदलना पर्याप्त नहीं था। वे समाज और राजनीति, दोनों में बदलाव चाहते थे। किताब की खासियत यह भी है कि लोहिया के विचार उनके जीवन की घटनाओं से निकलते हुए दिखाई देते हैं। बचपन के विद्रोही स्वभाव से लेकर जेल की यातना सहने तक और संसद में सरकार को घेरने तक एक निरंतरता नजर आती है। लोहिया को समझने के लिए यह किताब हर किसी को पढ़नी चाहिए। ****************** ग्राफिक- विपुल शर्मा …………… ये बुक रिव्यू भी पढ़ें बुक रिव्यू- पीपल की छांव में:एक आदमी, एक पेड़ और एक ऐसी मुहिम की कहानी, जो धीरे-धीरे आंदोलन बन गई हम अक्सर पर्यावरण की बात तब करते हैं, जब गर्मी बढ़ जाती है, बारिश का मौसम बदल जाता है या किसी शहर की हवा जहरीली हो जाती है। लेकिन पेड़, मिट्टी, पक्षी और प्रकृति हमारे जीवन को हर दिन कैसे प्रभावित करते हैं, इस पर कम ही सोचते हैं। पूरी खबर पढ़ें…

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Women Asia Cup 2026: शेफाली-हरमन-मंधाना, भारत की तीन टॉप तोप, बांग्लादेश को कर देगी नेस्तनाबूद, आज एशिया कप का पहला सेमीफाइनल

IND W vs BAN W Women Asia Cup 2026: भारत और बांग्लादेश के बीच आज दुबई में रात आठ बजे से महिला एशिया कप टी-20 टूर्नामेंट का पहला सेमीफाइनल खेला जाएगा. भारतीय महिला टीम अगर फाइनल में पहुंचती है तो आठवीं बार टाइटल अपने नाम करने का सपना देखेगी. बांग्लादेश के लिए भारत को रोकना बिलकुल भी आसान नहीं होने वाला है. Thu, 10 Sep 2026 05:53:57 +0530

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