Changing Face of Terror | ग्लोबल जिहाद का उभार, लेकिन भारत क्यों बना अपवाद |Teh Tak Chapter 5
पिछले तीन दशकों में वैश्विक आतंकवाद ने जिस तरह अपना स्वरूप बदला है, उसकी जड़ें ‘ख़िलाफ़त’ की अवधारणा और ग्लोबल जिहाद के फैलते नेटवर्क में छिपी हैं। अल-कायदा के बिखरे हुए फ्रैंचाइज़ मॉडल से लेकर आईएसआईएस के ज़मीन पर अपना राज्य खड़ा करने के प्रयास तक, जिहादी आंदोलन ने रणनीति, संगठन और महत्वाकांक्षा—तीनों स्तरों पर बड़े बदलाव देखे। 9/11 के बाद अमेरिका के नेतृत्व में शुरू हुए ‘वॉर अगेंस्ट टेरर’ ने अनजाने में ऐसे सत्ता-शून्य पैदा किए, जिनका फायदा कट्टरपंथी संगठनों ने उठाया और मध्य पूर्व को हिंसा के नए दौर में झोंक दिया। लेकिन इसी वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत एक अपवाद बनकर सामने आया। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादियों में से एक होने के बावजूद, भारत अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठनों का मज़बूत गढ़ नहीं बन सका। यह लेख इसी विरोधाभास को समझने की कोशिश करता है।
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खिलाफत का उदय और ग्लोबल जिहाद
पिछले तीन दशकों में वैश्विक जिहाद दो अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़ी रणनीतियों से होकर गुज़रा है—अल-कायदा का बिखरा हुआ “फ्रैंचाइज़ मॉडल” और आईएसआईएस का ज़मीन पर अपना ‘राज्य’ बनाने का प्रयास। दोनों की वैचारिक जड़ें भले ही एक जैसी थीं, लेकिन उनकी सोच, रणनीति और नतीजे बिल्कुल अलग रहे। 9/11 के बाद अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान और इराक में हुए युद्धों ने इन बदलावों में बड़ी भूमिका निभाई। इन युद्धों ने अनजाने में ऐसे सत्ता-शून्य पैदा किए, जिनका फायदा आतंकी संगठनों ने तेजी से उठाया। इसके बावजूद, भारत जैसे देश—जहाँ दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादियों में से एक रहती है—अल-कायदा और आईएसआईएस जैसे संगठनों की बड़े पैमाने पर भर्ती का केंद्र नहीं बन सके। यह सवाल खड़ा करता है कि वैश्विक जिहाद की पहुँच और असर की भी अपनी सीमाएँ हैं।
अल-कायदा के फ्रैंचाइज़ मॉडल से लेकर आईएसआईएस के ऑन ग्राउंड ऑपरेशन
ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल-कायदा ने जिहाद का एक ‘फ्रैंचाइज़ मॉडल’ खड़ा किया। इसका मतलब यह था कि संगठन खुद किसी ज़मीन या देश पर कब्ज़ा नहीं करता था, बल्कि एक ढीले-ढाले वैचारिक नेटवर्क की तरह काम करता था। यमन से लेकर उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण एशिया तक कई स्थानीय आतंकी गुट अल-कायदा के नाम पर काम करते थे, लेकिन अपने-अपने इलाकों में स्वतंत्र रूप से ऑपरेट करते थे। अल-कायदा का उद्देश्य शासन चलाना नहीं, बल्कि बड़े और प्रतीकात्मक हमलों के ज़रिये पश्चिमी प्रभाव को कमजोर करना और व्यापक विद्रोह को भड़काना था। आईएसआईएस ने इस सोच से बिल्कुल अलग रास्ता अपनाया। इराक पर अमेरिकी हमले के बाद पैदा हुई अराजकता से उभरे आईएसआईएस ने जिहाद को सिर्फ वैश्विक हिंसा तक सीमित मानने से इनकार किया। उसने ज़मीन पर कब्ज़ा करने और शासन चलाने की कोशिश की और 2014 में ‘ख़िलाफ़त’ की घोषणा कर दी। उसका लक्ष्य केवल पश्चिम से लड़ना नहीं था, बल्कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को हटाकर अपना तथाकथित इस्लामी राज्य बनाना था। टैक्स वसूली, अदालतें, प्रचार तंत्र और क्षेत्रीय प्रशासन जैसे ढाँचों के साथ यह राज्य-निर्माण मॉडल आधुनिक जिहादी आंदोलन में पहले कभी
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9/11 और वॉर अगेस्ट टेरर
11 सितंबर 2001 के हमलों ने वैश्विक सुरक्षा नीतियों को पूरी तरह बदल दिया। इसके बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला कर अल-कायदा के मुख्य ठिकानों को तोड़ दिया, लेकिन उसकी विचारधारा को खत्म नहीं कर सका। इससे भी ज़्यादा असर 2003 में इराक पर हुए अमेरिकी हमले का पड़ा, जहाँ मौजूदा सरकारी ढाँचे को गिरा दिया गया, लेकिन उनकी जगह कोई मज़बूत और स्थिर व्यवस्था खड़ी नहीं की गई। नतीजतन इराक में सत्ता का खालीपन पैदा हो गया, जिसे सांप्रदायिक तनाव ने और गहरा कर दिया। यही हालात कट्टरपंथी संगठनों के लिए सबसे अनुकूल साबित हुए। इसी अराजकता का सबसे बड़ा फायदा आईएसआईएस को मिला। इराक की पुरानी बाथ पार्टी से जुड़े अधिकारी, खुद को हाशिए पर महसूस करने वाले सुन्नी समुदाय और विदेशी जिहादी—सब मिलकर एक ऐसे संगठन में जुट गए जो सैन्य रूप से भी मजबूत था और वैचारिक रूप से भी आक्रामक। जहाँ अल-कायदा लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष की कल्पना करता था, वहीं आईएसआईएस ने उसी संघर्ष को तुरंत एक ‘राज्य’ में बदलने की कोशिश की।
मुस्लिम बहुलता के बावजूद भारत में अल-कायदा/आईएसआईएस पैर जमाने में क्यों हुए नाकाम
भारत अल-कायदा या आईएसआईएस जैसे संगठनों के लिए वैसा मुफीद ठिकाना नहीं बन पाया, जैसा मध्य पूर्व, अफ्रीका या यूरोप के कुछ हिस्से बने। इसके पीछे कई अहम कारण हैं। सबसे पहला कारण यह है कि भारतीय मुसलमान एक बहुलतावादी और लोकतांत्रिक समाज में गहराई से जुड़े हुए हैं। यहाँ की स्थानीय, सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराएँ ऐसी कट्टर वैश्विक जिहादी विचारधाराओं को स्वीकार नहीं करतीं। दूसरा, भारत में उस तरह का राज्य-ध्वंस या लंबा गृहयुद्ध नहीं हुआ, जिसका फायदा आमतौर पर जिहादी संगठन उठाते हैं। तीसरा, भारतीय इस्लाम की परंपरा ऐतिहासिक रूप से स्थानीय पहचान और आपसी मेल-जोल पर ज़ोर देती रही है। इतना ही नहीं, भारत के मुस्लिम-बहुल इलाकों में किसी बड़े विदेशी सैन्य कब्ज़े का अभाव भी एक अहम वजह है। दुनिया के अन्य हिस्सों में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी को जिहादी संगठन कट्टरपंथ फैलाने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन भारत में ऐसा माहौल न होने के कारण उनकी यह रणनीति कारगर साबित नहीं हो सकी।
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Changing Face of Terror | 26/11 ने कैसे गढ़ी वैश्विक ‘फिदायीन’ आतंक की पटकथा |Teh Tak Chapter 4
26/11 से पहले अधिकांश आतंकी हमले एक तयशुदा ढर्रे पर चलते थे—किसी जगह बम धमाका, कहीं गोलीबारी या आत्मघाती हमला, जिसका उद्देश्य कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा जानें लेना होता था। लेकिन मुंबई ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। 26/11 में हमला किसी एक क्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे शहर को लगभग 60 घंटे तक बंधक बना लेने का प्री-प्लांड मूव था। शहर के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ हमले किए गए, जिससे भय, भ्रम और अफरातफरी लगातार बनी रही। यह साफ हो गया कि आतंकवाद में अब सिर्फ हिंसा नहीं, बल्कि अटैकिंग टाइम का भी वेपन बन गया।
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26/11: वो रात जब गोलियां 60 घंटे गूंजती रहीं
26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए हमले आधुनिक आतंकवाद के विकास में एक निर्णायक मोड़ साबित हुए। 26/11 की घटना महज एक सामूहिक हिंसा की घटना नहीं थी, बल्कि इसने एक नए ऑपरेशनल मॉडल को प्रदर्शित किया। एक ऐसा मॉडल जिसने हमलावरों के छोटे समूहों को रणनीतिक हथियारों में बदल दिया, जो वैश्विक शहरों को पंगु बनाने में सक्षम थे। पीछे मुड़कर देखें तो, इस हमले ने न केवल पश्चिम में भविष्य के हमलों की झलक दिखाई, बल्कि इसने प्रभावी रूप से विश्व भर में फ़ेदायिन शैली के शहरी आतंकवाद के लिए एक आदर्श रूपरेखा तैयार कर दी।
मुंबई से पेरिस तक: हमले की अवधि ही बन गई हथियार
26/11 से पहले अधिकांश आतंकी हमले एक तयशुदा ढर्रे पर चलते थे—किसी जगह बम धमाका, कहीं गोलीबारी या आत्मघाती हमला, जिसका उद्देश्य कम समय में ज़्यादा से ज़्यादा जानें लेना होता था। लेकिन मुंबई ने इस पैटर्न को तोड़ दिया। 26/11 में हमला किसी एक क्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरे शहर को लगभग 60 घंटे तक बंधक बना लेने का प्री-प्लांड मूव था। शहर के अलग-अलग हिस्सों में एक साथ हमले किए गए, जिससे भय, भ्रम और अफरातफरी लगातार बनी रही। यह साफ हो गया कि आतंकवाद में अब सिर्फ हिंसा नहीं, बल्कि अटैकिंग टाइम का भी वेपन बन गया। यही मॉडल बाद के वर्षों में पश्चिमी देशों में भी दिखाई दिया। 2015 के पेरिस हमलों में कैफे, एक कॉन्सर्ट हॉल और स्टेडियम को एक साथ निशाना बनाकर पूरे शहर को लंबे समय तक सुरक्षा संकट में झोंक दिया गया। जिसकी पटकथा पहली बार मुंबई में लिखी गई थी।
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आतंक का नया फ़ॉर्मूला: दस आतंकी, एक शहर ठप
26/11 से मिलने वाला सबसे बड़ा सबक इसकी घातक कार्यक्षमता थी। महज़ दस आतंकी, दो-दो की छोटी टुकड़ियों में बँटकर, न सिर्फ स्थानीय पुलिस को पस्त करने में सफल रहे, बल्कि विशेष बलों को भी कई मोर्चों पर चुनौतियां खड़ी कर दी। नतीजा यह हुआ कि पूरी दुनिया की सुर्ख़ियाँ कई दिनों तक मुंबई पर टिकी रहीं। यह साफ संदेश था कि आतंक के लिए अब बड़े नेटवर्क या सैकड़ों लड़ाकों की ज़रूरत नहीं रही। असली ताकत प्रशिक्षण, आपसी तालमेल और स्पष्ट उद्देश्य में थी। ही सोच बाद में यूरोप में हुए फिदायीन हमलों में दिखाई दी। सीमित संसाधनों और कम मानवबल के बावजूद, छोटी और संगठित टुकड़ियों ने व्यापक दहशत फैलाई और बड़े शहरों को सुरक्षा संकट में डाल दिया। मुंबई में आज़माया गया यह मॉडल बाद में वैश्विक आतंकवाद की रणनीति बन गया।
मीडिया की लाइव कवरेज से आतंकियों को मिली मदद
26/11 के दौरान मुंबई ने यह भी उजागर किया कि आधुनिक आतंकवाद किस तरह लाइव मीडिया को हथियार बना सकता है। टीवी चैनलों की पल-पल की कवरेज ने सुरक्षा बलों की तैनाती, हताहतों की जानकारी और सार्वजनिक प्रतिक्रिया को वास्तविक समय में दुनिया के सामने रख दिया। बताया जाता है कि विदेश में बैठे हैंडलर इन प्रसारणों पर नज़र रखे हुए थे और उसी के आधार पर हमलावरों को निर्देश दे रहे थे। इस तरह हिंसा सिर्फ ज़मीन पर नहीं हो रही थी, बल्कि स्क्रीन के ज़रिये कई गुना बढ़ाई जा रही थी। बाद के वर्षों में पेरिस, ब्रसेल्स और अन्य शहरों में हुए आतंकी हमलों में यही सबक साफ़ तौर पर दिखाई दिया। आतंकियों ने हमलों की योजना इस तरह बनाई कि उन्हें अधिकतम लाइव कवरेज मिले और समाज पर मनोवैज्ञानिक दबाव लंबे समय तक बना रहे। मुंबई में देखा गया यह मीडिया-केंद्रित मॉडल आगे चलकर वैश्विक आतंकवाद की रणनीति का हिस्सा बन गया।
होटल, स्टेशन, कैफ़े—सब निशाने पर
26/11 में निशानों का चयन पूरी तरह सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। लग्ज़री होटल, व्यस्त रेलवे स्टेशन, कैफ़े और एक धार्मिक केंद्र—इन जगहों को केवल ज़्यादा जानें लेने के लिए नहीं चुना गया था, बल्कि इनके प्रतीकात्मक महत्व के कारण निशाना बनाया गया। ये वे स्थान थे जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी, वैश्विक संपर्क और खुले समाज की पहचान थे। इन पर हमला कर आतंकियों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि अब सामान्य जीवन भी सुरक्षित नहीं है। यही सोच बाद के वर्षों में पश्चिमी देशों में हुए फिदायीन हमलों की पहचान बन गई। आम नागरिकों की रोज़मर्रा की जगहों को निशाना बनाकर आतंक ने यह जताया कि उसका उद्देश्य सिर्फ नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि समाज की सुरक्षा भावना को तोड़ना है। मुंबई में अपनाई गई यह रणनीति आगे चलकर वैश्विक आतंकवाद का स्थायी पैटर्न बन गई।
बहरहाल, 26/11 का मुंबई हमला केवल भारत तक सीमित कोई अलग-थलग त्रासदी नहीं था। यह आधुनिक शहरी आतंकवाद का एक ऐसा प्रोटोटाइप था, जिसे बाद के वर्षों में अलग-अलग महाद्वीपों में दोहराया और अपनाया गया। 2015 में पेरिस में जब इसी तरह की रणनीतियाँ देखने को मिलीं, तो वह महज़ संयोग नहीं था, बल्कि आतंक के एक विकसित होते स्वरूप का संकेत था। दुनिया ने 26/11 से मिलने वाले सबक देर से सीखे, क्योंकि उनकी पटकथा पश्चिमी राजधानियों से बहुत दूर लिखी गई थी। आतंकवाद के इतिहास में यह कोई पहला मामला नहीं था—अक्सर चेतावनियों को तब तक पूरी तरह समझा नहीं जाता, जब तक वही खतरा दोबारा, किसी और शहर की सड़कों पर सामने आकर खड़ा नहीं हो जाता।
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