बेंगलुरु में स्विगी इंस्टामार्ट के गोदाम पर छापा, स्वास्थ्य मंत्री ने लोगों से खरीदारी से पहले एक्सपायरी डेट जांचने की अपील की
बेंगलुरु, 8 सितंबर (आईएएनएस)। कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग ने एक्सपायर्ड खाद्य पदार्थों और दवाइयों के भंडारण व बिक्री के खिलाफ चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत मंगलवार को बेंगलुरु में स्विगी इंस्टामार्ट के एक गोदाम पर छापा मारा। इस बीच राज्य के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री यू.टी. खादर ने लोगों से खाद्य पदार्थ और दवाइयां खरीदने से पहले उनकी एक्सपायरी डेट अवश्य जांचने की अपील की।
यह कार्रवाई खाद्य सुरक्षा विभाग और औषधि सुरक्षा विभाग द्वारा बेंगलुरु और आसपास के इलाकों में चलाए जा रहे व्यापक प्रवर्तन अभियान का हिस्सा है। अधिकारियों ने बताया कि छापेमारी से जुड़ी विस्तृत जानकारी अभी सामने आनी बाकी है।
मीडिया से बातचीत में मंत्री यू.टी. खादर ने कहा कि पिछले एक सप्ताह के दौरान राज्यभर में लगभग तीन करोड़ रुपये मूल्य के एक्सपायर्ड खाद्य पदार्थ और दवाइयां जब्त की गई हैं। इनमें ऐसे उत्पाद भी शामिल हैं, जिन पर कथित तौर पर दोबारा लेबल लगाकर बिक्री की तैयारी की जा रही थी।
उन्होंने लोगों से सतर्क रहने की अपील करते हुए कहा, मैं सभी लोगों से आग्रह करता हूं कि कोई भी खाद्य पदार्थ, दवा या अन्य उत्पाद खरीदने से पहले उसकी एक्सपायरी डेट जरूर देखें। यदि आपको कोई छोटी-सी भी गड़बड़ी या संदेह नजर आए तो तुरंत इसकी सूचना दें, क्योंकि इससे किसी बड़े रैकेट का खुलासा हो सकता है।
खादर ने बताया कि विभाग ने उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए क्यूआर कोड और बारकोड प्रणाली शुरू की है, जिससे लोग उत्पादों की जानकारी और वैधता की जांच कर सकते हैं। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी इस व्यवस्था के बारे में लोगों को जागरूक करने की अपील की।
उन्होंने कहा, मैं सामाजिक कार्यकर्ताओं से अनुरोध करता हूं कि वे क्यूआर कोड और बारकोड की जानकारी आम जनता तक पहुंचाएं और लोगों को जागरूक करें। उन्हें इस व्यवस्था को मजबूत बनाने में आगे आना चाहिए।
मंत्री ने कहा कि ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से एक्सपायर्ड और गलत लेबल वाले खाद्य पदार्थ तथा दवाइयां उपभोक्ताओं तक न पहुंचें, इसके लिए लगातार निरीक्षण और जनता की भागीदारी बेहद जरूरी है।
खादर ने बताया कि होसकोटे स्थित डार्क स्टोर में अधिकारियों को करीब 45 लाख रुपये की दवाइयां मिली हैं। प्रारंभिक जांच में आशंका है कि इनमें से कुछ उत्पादों पर दोबारा लेबल लगाया गया था। जब्त दवाइयों को विभाग ने अपने कब्जे में ले लिया है और मामले की जांच जारी है।
मंत्री ने तथाकथित पेप्टाइड पार्टी के खिलाफ की गई कार्रवाई का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम की जानकारी उन्हें सोशल मीडिया के जरिए मिली थी, जिसके बाद उन्होंने तुरंत विभागीय आयुक्त को मामले की जांच के निर्देश दिए।
उन्होंने बताया कि विभाग के अधिकारियों ने ग्राहक बनकर ऑनलाइन पंजीकरण कराने की कोशिश की, लेकिन उन्हें रजिस्ट्रेशन की अनुमति नहीं दी गई। आयोजक चुनिंदा लोगों को ही कार्यक्रम में शामिल होने दे रहे थे।
बार-बार प्रयास के बावजूद पंजीकरण नहीं होने पर विभाग ने आयोजकों को नोटिस जारी कर पूछताछ के लिए बुलाया। कानूनी कार्रवाई की चेतावनी मिलने के बाद आयोजकों ने कार्यक्रम रद्द कर दिया, लेकिन विभाग ने जांच जारी रखी।
पूछताछ के दौरान आयोजकों ने अधिकारियों को बताया कि कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को फार्मास्यूटिकल और न्यूट्रास्यूटिकल क्षेत्र के नए उत्पादों से परिचित कराना था। उन्होंने यह भी दावा किया कि कुछ उत्पाद अमेजन के डार्क स्टोर के जरिए उपलब्ध कराए गए थे।
इस सूचना के आधार पर खाद्य सुरक्षा विभाग ने संबंधित गोदामों पर छापेमारी की और लाखों रुपये की दवाइयां तथा अन्य उत्पाद जब्त किए।
खादर ने बताया कि मंगलवार को खाद्य सुरक्षा विभाग और औषधि सुरक्षा विभाग की तीन संयुक्त टीमों ने अनेकल समेत कई स्थानों पर निरीक्षण किया। इस दौरान बड़ी मात्रा में खाद्य पदार्थ और दवाइयां बरामद हुईं।
लिंगराजपुरम स्थित एक गोदाम की जांच में करीब 45 लाख रुपये मूल्य के एक्सपायर्ड उत्पाद मिले। मंत्री ने कहा, अब तक लगभग एक करोड़ रुपये मूल्य के एक्सपायर्ड उत्पादों का पता चल चुका है।
उन्होंने बताया कि कई कंपनियों के ऐसे उत्पाद मिले हैं जिनकी एक्सपायरी समाप्त हो चुकी थी, लेकिन उन्हें गोदाम में रखा गया था। इससे आशंका है कि इन्हें बाद में उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा सकता था।
मंत्री ने कहा कि सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ और कड़े कानूनी प्रावधान लाने पर विचार कर रही है, जो जानबूझकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ करते हैं।
उन्होंने कहा, जो लोग स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में जनता को धोखा देते हैं और उनकी जान जोखिम में डालते हैं, उनके खिलाफ आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। इस संबंध में कानूनी प्रावधान मौजूद हैं और हम विधि विभाग से चर्चा कर रहे हैं। साथ ही केंद्र सरकार से भी इस विषय पर हस्तक्षेप करने का आग्रह करेंगे।
खादर ने कहा कि केवल चेतावनी, जुर्माना और अन्य नियामकीय कार्रवाई से कुछ लोग बाज नहीं आ रहे हैं। इसलिए ऐसे मामलों में और सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
उन्होंने खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारियों की सराहना करते हुए कहा कि वे चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं और बिना किसी पक्षपात के लगातार निरीक्षण और छापेमारी कर रहे हैं, ताकि जनता के स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
--आईएएनएस
डीएससी
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संभल मस्जिद विवाद: मुस्लिम पक्ष की बहस पूरी, अब हिंदू पक्ष रखेगा अपनी दलील; SC में अहम सुनवाई
Sambhal Dispute: संभल की मस्जिद से जुड़े विवाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने मस्जिद परिसर के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त किए जाने के आदेश पर गंभीर सवाल उठाए. मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी ने दलील दी कि निचली अदालत ने कमिश्नर नियुक्त करने से पहले इस बात पर पर्याप्त विचार नहीं किया कि आखिर मौके पर जाकर जांच की जरूरत क्यों है. उन्होंने कहा कि सिर्फ यह मान लेना कि सर्वे से मदद मिल सकती है, कमिश्नर नियुक्त करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच के सामने हुई सुनवाई में अहमदी ने पूजा स्थल अधिनियम, 1991 और प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 से जुड़े कानूनी पहलुओं को भी उठाया. उनका कहना था कि पूजा स्थल अधिनियम की धारा 3 का उद्देश्य धार्मिक स्थलों के स्वरूप में बदलाव को रोकना है. उनके मुताबिक किसी प्राचीन स्मारक को संरक्षित करने का मतलब केवल उसकी इमारत को बचाना नहीं है, बल्कि उसके मौजूदा चरित्र को भी सुरक्षित रखना है. मस्जिद कमेटी की ओर से यह भी कहा गया कि मुकदमे में कुछ धार्मिक गतिविधियों के लिए परिसर में प्रवेश की मांग की गई है. अहमदी ने दलील दी कि इस तरह की मांग पर विचार करते समय उस स्थान के मौजूदा धार्मिक चरित्र को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
जानें सर्वे के मुद्दे को लेकर क्या बोला मुस्लिम पक्ष
सर्वे के मुद्दे पर मुस्लिम पक्ष ने खास तौर पर CPC के Order 26 Rule 9 का हवाला दिया. इस प्रावधान के तहत अदालत किसी विवाद को स्पष्ट करने के लिए स्थानीय जांच का आदेश दे सकती है, लेकिन इसके लिए अदालत को यह देखना होता है कि मौके की जांच वास्तव में जरूरी या उचित है. कमिश्नर अपनी जांच के बाद अदालत को रिपोर्ट देता है. अहमदी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि संभल मामले में ट्रायल कोर्ट के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि कमिश्नर को किस खास मुद्दे की जांच करनी है. उनका कहना था कि आदेश में केवल यह कहा गया कि सर्वे कराया जाना संभव है, लेकिन स्थानीय जांच की वास्तविक जरूरत पर अदालत ने पर्याप्त संतुष्टि दर्ज नहीं की. उन्होंने यह भी दलील दी कि कमिश्नर की नियुक्ति का आदेश एकतरफा तरीके से यानी दूसरे पक्ष को पर्याप्त अवसर दिए बिना पारित किया गया. अहमदी ने सवाल उठाया कि करीब 70 साल बाद मुकदमा दाखिल होने के बावजूद इतनी जल्दबाजी में सर्वे का आदेश क्यों दिया गया.
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सुनवाई के दौरान किया गया हिस्सा का जिक्र
सुनवाई के दौरान अहमदी ने संभल में सर्वे के बाद हुई हिंसा का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस दौरान स्थिति तनावपूर्ण हुई और पुलिस फायरिंग में छह लोगों की मौत हुई. उनके मुताबिक अचानक कमिश्नर के पहुंचने से नमाज भी बाधित हुई. हालांकि अदालत के सामने मुख्य कानूनी सवाल यह रहा कि क्या सर्वे का आदेश संबंधित कानूनी प्रावधानों और निर्धारित प्रक्रिया के मुताबिक था. मुस्लिम पक्ष ने यह भी कहा कि पूजा स्थल अधिनियम से जुड़े कुछ अन्य मामले पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं और उनमें बड़े बेंच के सामने कानून की व्याख्या का सवाल भी उठाया गया है. ऐसे में संभल मामले को उन मामलों के साथ देखा जाना चाहिए. अहमदी ने कहा कि 1991 के पूजा स्थल कानून और 1958 के प्राचीन स्मारक कानून को अलग-अलग देखने के बजाय उनके बीच के संबंध को भी समझना जरूरी है.
मस्जिद कमेटी ने यह दलील भी दी कि केवल इसलिए कि किसी समझौते में मुतवल्लियों को संरक्षक बताया गया है, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन्होंने संपत्ति पर अपना मालिकाना हक छोड़ दिया है. इस मुद्दे पर भी हाईकोर्ट के निष्कर्ष को चुनौती दी गई. अपनी दलीलों के अंत में अहमदी ने सहिष्णुता का जिक्र करते हुए कहा कि देश की परंपरा और संविधान दोनों ही आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना पर जोर देते हैं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया.
अगली तारीख पर अपना दलीलें रखेगा हिंदू पक्ष
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट निजाम पाशा ने भी पूजा स्थल अधिनियम और प्राचीन स्मारक कानून को साथ पढ़ने की जरूरत बताई. उनका कहना था कि दोनों कानूनों को अलग-अलग तरीके से पढ़ने पर कई व्यावहारिक और कानूनी मुश्किलें पैदा हो सकती हैं. सुप्रीम कोर्ट में इस चरण पर मुस्लिम पक्ष की ओर से बहस पूरी हो गई है. अब अगली तारीख पर हिंदू पक्ष अपनी दलीलें रखेगा. इसके बाद अदालत के सामने यह महत्वपूर्ण सवाल रहेगा कि मस्जिद परिसर के सर्वे के लिए एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति का आदेश कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप था या नहीं, साथ ही पूजा स्थल अधिनियम और प्राचीन स्मारक कानून से जुड़े व्यापक सवालों का इस मामले पर क्या असर पड़ता है.
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