कभी हिंदी फिल्मों की दुनिया में कश्मीर सबसे हिट ‘लोकेशन’ हुआ करता था। बर्फ से ढकी चोटियां, डल झील, शिकारे, चिनार और हरी-भरी वादियां बॉलीवुड की रोमांटिक कहानियों की पहचान थीं। लेकिन 1990 के दशक में आतंकवाद के दौर ने सब कुछ बदल दिया। 31 दिसंबर 1990 को आतंकियों की धमकियों के बाद कश्मीर के सिनेमाघरों के दरवाजे बंद हो गए और धीरे-धीरे फिल्म कैमरों का रुख भी घाटी से दूर हो गया। अब, बदली हुई परिस्थितियों और सामान्य होते माहौल के बीच बॉलीवुड और सिनेमा की दुनिया एक बार फिर कश्मीर की ओर लौटती दिखाई दे रही है। इसी वापसी का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संदेश बना जम्मू-कश्मीर का पहला अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव, ‘रंग-ए-सिनेमा’।
सोमवार शाम श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने दीप प्रज्ज्वलित कर महोत्सव का उद्घाटन किया। यह सिर्फ एक फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत नहीं, बल्कि उस घाटी में सिनेमा के पुनर्जन्म का प्रतीक है, जहां कभी थिएटरों की रोशनी आतंकवाद के कारण बुझ गई थी। उद्घाटन फिल्म के रूप में लेबनानी फिल्मकार सारा फ्रांसिस की फिल्म ‘डेड डॉग’ दिखाई गई। इसका प्रदर्शन श्रीनगर के INOX में हुआ, जो फिलहाल घाटी का एकमात्र कार्यरत मल्टीप्लेक्स है और कुछ वर्ष पहले ही खुला था।
हम आपको बता दें कि 7 से 10 सितंबर तक चलने वाला चार दिवसीय ‘रंग-ए-सिनेमा’ महोत्सव श्रीनगर, जम्मू और विश्व प्रसिद्ध स्की रिसॉर्ट गुलमर्ग में आयोजित किया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सहयोग से आयोजित इस महोत्सव में 135 फिल्मों का प्रदर्शन होगा, जिनमें 60 विदेशी फिल्में शामिल हैं। आयोजकों को 80 देशों से 1,100 से अधिक प्रविष्टियां मिली थीं।
फिल्मों की सूची भी इस महोत्सव के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को दर्शाती है। भारत की 64 फिल्में चुनी गई हैं, जबकि फ्रांस की 13 और ईरान की आठ फिल्में शामिल हैं। अर्जेंटीना और स्पेन की चार-चार, जबकि ब्राजील, जर्मनी, रूस और अमेरिका की तीन-तीन फिल्में प्रदर्शित होंगी। तुर्किये, दक्षिण कोरिया, स्वीडन, कतर और कोलंबिया जैसे देशों की फिल्में भी इस सांस्कृतिक संगम का हिस्सा हैं।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कश्मीर को दुनिया का सबसे खूबसूरत प्राकृतिक कैनवास बताते हुए स्पष्ट संदेश दिया कि जम्मू-कश्मीर अब वैश्विक रचनात्मक समुदाय का स्वागत करने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि कश्मीर केवल फिल्मों की ‘लोकेशन’ नहीं, बल्कि कहानियों का जन्मस्थान है। उन्होंने विदु विनोद चोपड़ा, विशाल भारद्वाज, इम्तियाज अली और कबीर खान जैसे फिल्मकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि कश्मीर को सिनेमा में अब केवल पारंपरिक खूबसूरती तक सीमित नहीं रखा जा रहा, बल्कि यहां की मानवीय और गहरी कहानियों को भी पर्दे पर जगह मिल रही है।
महोत्सव का सबसे अनोखा आकर्षण डल झील पर बनने वाला ‘फ्लोटिंग सिनेमा’ है। यहां कश्मीर की खूबसूरत पृष्ठभूमि में जंगली, आरज़ू, कश्मीर की कली और कभी-कभी जैसी घाटी में फिल्माई गई बॉलीवुड फिल्मों की विशेष स्क्रीनिंग हो रही है।
हम आपको बता दें कि फिल्मों का मूल्यांकन पांच सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय जूरी करेगी, जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध सिनेमैटोग्राफर और निर्देशक संतोष सिवन कर रहे हैं। जूरी में ऑस्कर और बाफ्टा विजेता साउंड डिजाइनर रेसुल पूकुट्टी समेत अंतरराष्ट्रीय सिनेमा जगत की कई हस्तियां शामिल हैं। विदु विनोद चोपड़ा, रमेश सिप्पी, इम्तियाज अली, पंकज त्रिपाठी, फातिमा सना शेख और सादिया खातिब जैसे बॉलीवुड सितारों की मौजूदगी भी महोत्सव को विशेष बना रही है।
देखा जाये तो इस फिल्म फेस्टिवल का फायदा सिर्फ कश्मीर की छवि तक सीमित नहीं रहेगा। फिल्मों की शूटिंग बढ़ने से स्थानीय कलाकारों, अभिनेताओं, लेखकों, तकनीशियनों, संगीतकारों और युवाओं को रोजगार और अवसर मिलेंगे। होटल, परिवहन, पर्यटन, हस्तशिल्प, खान-पान और स्थानीय कारोबार को भी सीधा लाभ होगा। फिल्म पर्यटन के जरिए कश्मीर की संस्कृति, विरासत और प्राकृतिक सुंदरता दुनिया तक पहुंचेगी।
कुल मिलाकर देखें तो ‘रंग-ए-सिनेमा’ सिर्फ कैमरों की वापसी नहीं है। यह उस कश्मीर की वापसी का संकेत है, जहां कभी आतंकवाद के साए में सिनेमाघरों की रोशनी बुझ गई थी। अब वही कश्मीर दुनिया को संदेश दे रहा है कि वादियां फिर तैयार हैं, कैमरे फिर तैयार हैं और सिनेमा की रोशनी एक बार फिर कश्मीर में फैलने लगी है।
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उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने ऐसा क्या बदल दिया कि समाजवादी पार्टी की पहचान में अब लाल के साथ नीला रंग भी दिखाई देने लगा है। क्या यह सिर्फ एक टीशर्ट का रंग बदलना है या फिर इसके पीछे 2027 के चुनाव की बड़ी रणनीति छिपी है क्योंकि समाजवादी पार्टी की छात्रसभा के कार्यकर्ता अब लाल टीशर्ट की जगह नीली टीशर्ट में नजर आएंगे और इसी नीली टीशर्ट पर सिर्फ साइकिल नहीं है बल्कि बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की तस्वीर भी है। यानी संदेश बिल्कुल साफ है। सपा अब अपने पुराने लाल रंग के साथ नीले रंग की राजनीति को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक करीब 21 प्रतिशत माना जाता है। और यही वो वोट बैंक है जिस पर कभी मायावती की बहुजन समाज पार्टी का मजबूत प्रभाव हुआ करता था। लेकिन पिछले कुछ चुनाव में बसपा का राजनीतिक प्रभाव लगातार कमजोर हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने यूपी में 37 सीटें जीती और अखिलेश यादव की पार्टी राज्य की सबसे बड़ी विपक्षी ताकत बनकर उभरी और अब अखिलेश की नजर उस वोट बैंक पर है जो लंबे समय से यूपी की राजनीति का सबसे अहम फैक्टर रहा है। यानी दलित वोट और शायद इसीलिए अखिलेश खुद भी हाल ही में नीला गमछा डाले नजर आए थे। नीला रंग बाबासाहेब आंबेडकर और दलित राजनीति। यूपी की राजनीति में इन तीनों का कनेक्शन किसी से छिपा नहीं है।
31 अगस्त को एसपी चीफ का नया पॉलिटिकल लुक देखने को मिला था। पार्टी की बैठक में अखिलेश यादव सिर पर लाल टोपी तो पहने जरूर नजर आए लेकिन गले में नीला गमछा भी पहने हुए थे। मीटिंग में उनके चाचा और पार्टी के बड़े नेता शिवपाल यादव भी गले में ब्लू गमछा लटकाए हुए थे। अब अखिलेश यादव ने दलित वोटरों को साधने के लिए बड़ा सियासी कदम उठाया है। इसके लिए पार्टी की यूथ विंग की ड्रेस में बदलाव किए गए हैं। समाजवादी पार्टी की यूथ विंग के कार्यकर्ता नीली जींस और नीली टीशर्ट में दिखने वाले हैं। जिस पर सपा छात्र सभा का लोगो और पार्टी का चुनाव निशान साइकिल बनी हुई है। जिसकी आज लॉन्चिंग भी होने वाली है। जिसमें सैकड़ों कार्यकर्ताओं को बुलाया गया है। अलग-अलग विश्वविद्यालय और छात्र संघ के पूर्व और वर्तमान अध्यक्षों, छात्र संघ के नेताओं को आमंत्रित किया गया है। अब सपा ने अपनी स्टूडेंट विंग यानी छात्रसभा का ड्रेस कोड बदला है तो इस यूनिफार्म पॉलिटिक्स पर सियासी कयासबाजियां चल पड़ी हैं। दरअसल नीले रंग को यूपी की सियासत में अब तक दलित आंदोलन और बीएसपी से जोड़कर देखा जाता रहा है। मायावती की पार्टी के झंडे का रंग भी नीला है। तो इस नीले रंग की राजनीति में एसपी अध्यक्ष ने पॉलिटिकल एंट्री कर ली है।
अखिलेश यादव के ब्लू ड्रेस वाले कदम को दलित वोटरों को साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक अखिलेश को पीडीए फार्मूले और नीले रंग में भविष्य की राह दिखने लगी है। यूपी की राजनीति में दलित वोटरों का बड़ा हिस्सा बीएसपी के साथ रहा है। वहीं गैर जाटव, दलित और गैर यादव, पिछड़ा वर्ग बीजेपी के साथ मजबूती के साथ खड़ा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए फार्मूले के चलते इस समीकरण में काफी चेंज देखने को मिला था। एसपी ने दलितों और पिछड़ों के एक वर्ग को अपनी ओर खींचा था। ऐसे में एसपी अध्यक्ष उसी आधार को विधानसभा चुनाव में अपने सबसे बड़े पॉलिटिकल टूल को सियासी हथियार बनाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं।
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