बिहार में फिर बदलेगा समीकरण? JDU के हाथ में आ रहा बड़ा पद
बिहार की नई सरकार के गठन के बाद राज्य की सियासत में सत्ता के बंटवारे को लेकर चर्चाओं का दौर जारी है. मुख्यमंत्री के तौर पर सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद अब नजरें बिहार विधान परिषद की शीर्ष कुर्सी पर टिक गई हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विधान परिषद के सभापति का पद एक बार फिर जनता दल यूनाइटेड (JDU) के खाते में जा सकता है. बताया जा रहा है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर सहमति बनने की स्थिति में है.
अगर ऐसा होता है तो यह फैसला केवल एक संवैधानिक पद का बदलाव नहीं होगा, बल्कि भाजपा और जदयू के बीच सत्ता-संतुलन के लिहाज से भी अहम संकेत माना जाएगा.
भाजपा के पास कई बड़े पद
नई सरकार के गठन के बाद सत्ता के महत्वपूर्ण पदों पर भाजपा की मजबूत मौजूदगी दिखाई दे रही है. मुख्यमंत्री पद के अलावा विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी भाजपा के पास है. ऐसे में विधान परिषद के सभापति का पद जदयू को सौंपे जाने की संभावना को गठबंधन के भीतर संतुलन साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
एनडीए में दोनों प्रमुख दलों के बीच राजनीतिक ताकत को देखते हुए संवैधानिक पदों का बंटवारा काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. विधान परिषद की सभापति की कुर्सी जदयू को मिलने से गठबंधन के भीतर दोनों दलों की भागीदारी का संतुलित संदेश जा सकता है.
विधान परिषद में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी
बिहार विधान परिषद के मौजूदा आंकड़े भी इस पूरे घटनाक्रम को दिलचस्प बनाते हैं. परिषद में भाजपा के 25 सदस्य हैं, जबकि जदयू के पास 20 सदस्य हैं. राजद के 15, कांग्रेस के दो और निर्दलीय सात सदस्य हैं. इसके अलावा सीपीआई, सीपीएम, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा, राष्ट्रीय लोक मोर्चा और लोजपा (रामविलास) के एक-एक सदस्य बताए जाते हैं.
भले ही भाजपा परिषद में सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन जदयू की संख्या भी मजबूत है. ऐसे में सभापति पद जदयू को दिए जाने से गठबंधन की आंतरिक शक्ति-संरचना में एक महत्वपूर्ण संतुलन दिखाई दे सकता है.
विधानसभा में भी दोनों दलों की मजबूत पकड़
बिहार विधानसभा के समीकरण भी भाजपा-जदयू की साझेदारी को खास बनाते हैं. विधानसभा में भाजपा के 88 विधायक हैं, जबकि जदयू के 85 विधायक बताए जा रहे हैं. दोनों दलों के बीच संख्या का अंतर सीमित है.
यही वजह है कि सरकार के साथ-साथ सदनों के महत्वपूर्ण पदों का बंटवारा भी राजनीतिक रूप से काफी मायने रखता है. विधानसभा अध्यक्ष का पद भाजपा के पास होने के बाद विधान परिषद सभापति की कुर्सी जदयू को मिलती है तो इसे दोनों दलों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे के तौर पर देखा जा सकता है.
जदयू पहले भी संभाल चुका है सभापति पद
विधान परिषद की सभापति की कुर्सी जदयू के लिए नई नहीं है. भाजपा के वरिष्ठ नेता अवधेश नारायण सिंह से पहले जदयू के देवेश चंद्र ठाकुर इस पद पर रह चुके हैं. उन्होंने करीब दो वर्षों तक सभापति की जिम्मेदारी संभाली थी.
वहीं, महागठबंधन सरकार के दौरान उपसभापति हारुण रशीद ने कार्यकारी सभापति के रूप में परिषद की कार्यवाही संभाली थी. इससे स्पष्ट है कि बिहार विधान परिषद की शीर्ष कुर्सी के साथ जदयू का राजनीतिक जुड़ाव पहले भी रहा है.
अब किसके नाम पर लगेगी मुहर?
सभापति पद जदयू के खाते में जाने की स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि पार्टी इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के लिए किस वरिष्ठ विधान पार्षद को चुनती है. पार्टी के भीतर संभावित नामों को लेकर चर्चा होने की बात सामने आ रही है, लेकिन अभी किसी नाम पर आधिकारिक मुहर नहीं लगी है.
फिलहाल सबकी नजर एनडीए के अगले फैसले पर है. यदि विधान परिषद की सभापति की कुर्सी जदयू को मिलती है तो इसे नई सरकार में भाजपा और जदयू के बीच सत्ता-साझेदारी के नए समीकरण का संकेत माना जाएगा. आने वाले दिनों में यह फैसला बिहार की राजनीति में गठबंधन के भीतर शक्ति-संतुलन की दिशा को और स्पष्ट कर सकता है.
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