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'पंचायत' के दामाद पहुंचे बिग बॉस के घर:सलमान खान के पास रोए; बोले- सैफ-करीना की शादी में होटल के किचन में सफाई भी की

'पंचायत' वेब सीरीज में दामाद का रोल निभाने वाले राजस्थान के आसिफ खान बिग बॉस में नजर आएंगे। बिग बॉस के मंच पर वे सलमान खान के पास रोने लग गए। इस दौरान उन्होंने कहा- अम्मी आज सलमान खान के साथ खड़ा हूं। आसिफ ने कहा- पढ़ाई में मन नहीं था, स्कूल में नाटक करता था। तब टीचर की तारीफ मिलती थी। इस बीच 2008 में पिता का निधन हो गया। प्राइवेट से सरकारी स्कूल में आ गया। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए साथ-साथ काम किया। चित्तौड़गढ़ के निंबाहेड़ा से जयपुर आने का मौका मिला तो थिएटर किया। अभिनय की बारीकियां सीखीं। मुंबई आकर सपने पूरे हुए और पंचायत वेब सीरीज से लोगों का बहुत प्यार मिला। आसिफ ने अपने संघर्ष के दिनों में सैफ अली खान और करीना कपूर की शादी में होटल के किचन में बर्तन भी धोए। करीब एक साल पहले बीमारी के दौरान उन्होंने सोशल मीडिया पर जिंदगी को लेकर एक भावुक संदेश साझा किया था। उन्होंने लिखा था- 6 घंटे तक एक चीज को देखनेस के बाद उन्हें एहसास हुआ कि जिंदगी बहुत छोटी है। एक दिन को सामान्य मानकर नहीं चलना चाहिए, क्योंकि सब कुछ पलभर में बदल सकता है। उन्होंने लोगों से अपनी जिंदगी में मौजूद चीजों के लिए आभार व्यक्त करने और यह याद रखने की बात कही थी। आसिफ ने अपने जीवन और करियर के बारे में कई बातें साझा की, पढ़िए- सलमान खान के सामने 16 साल पुराना संघर्ष बताया 35 साल के आसिफ ने बिग बॉस के मंच पर 16 साल पुराना किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब सलमान खान की फिल्म ‘रेडी’ बन रही थी। उस समय फिल्म के एक गाने में वह भी भीड़ के बीच बैक डांसर के तौर पर शामिल हुआ। उस समय शायद सोचा भी नहीं होगा कि एक दिन वह उसी सलमान खान के सामने खड़े होंगे और उनके साथ मंच पर डांस करेंगे। बिग बॉस के मंच पर सलमान खान ने उसी गाने पर आसिफ के साथ डांस किया। यह पल आसिफ के लिए बेहद भावुक कर देने वाला था। पढ़ाई से बचने के लिए नाटक करते थे आसिफ के पिता एक सीमेंट कंपनी में काम करते थे। मां गृहिणी थी। आसिफ ने बताया कि वे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ते थे, लेकिन पढ़ाई में उनका मन नहीं लगता था। जैसे-तैसे वह परीक्षा पास करते थे। पढ़ाई से बचने के लिए एनुअल फंक्शन में नाटक में हिस्सा लेते थे। इस छोटे से फैसले ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। पहली बार उन्हें दोस्तों के साथ-साथ उन टीचरों से भी तारीफ मिली, जो पढ़ाई के लिए कभी उनकी प्रशंसा नहीं करते थे। इसी के कारण अलग-अलग नाटक प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगे। धीरे-धीरे चित्तौड़गढ़ और आस-पास के इलाकों में उनकी पहचान एक अच्छे कलाकार के रूप में बनने लगी। पिता के निधन के बाद जीवन में आया संघर्ष आसिफ ने बताया कि पिता का निधन हुआ तब वह सातवीं क्लास में पढ़ते थे। परिवार पर आर्थिक संकट आ गया था। बड़े भाई पढ़ाई में अच्छे थे, इसलिए परिवार ने तय किया कि भाई अपनी पढ़ाई जारी रखेंगे और वह घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करेंगे। निजी स्कूल की फीस भरना मुश्किल हो गया था। तब सरकारी स्कूल में एडमिशन लिया था। परिवार की मदद के लिए काम करना भी शुरू कर दिया था। सुबह से दोपहर तक काम करने के बाद वह स्कूल जाते थे। स्कूल के बाद भी काम करते थे। करीब डेढ़-दो साल तक यह सिलसिला चलता रहा। इस दौरान उन्होंने कई नौकरियां कीं। कुछ समय अपने मामा के साथ स्टील फर्नीचर का काम भी किया। जयपुर से मुंबई गए, पंचायत में दामादजी का रोल मिल आसिफ ने जयपुर में कई साल तक थिएटर किया और यहीं से अभिनय की बारीकियां सीखीं। रंगमंच ने उन्हें मंच पर आत्मविश्वास दिया और अभिनय को पेशे के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा दिखाई। इसके बाद वे मुंबई गए, जहां शुरुआत में आर्थिक परेशानी और छोटे-मोटे कामों से गुजरना पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें अभिनय के मौके मिलने लगे और उन्होंने फिल्मों, वेब सीरीज में काम करना शुरू किया। आसिफ खान को सबसे ज्यादा चर्चा लोकप्रिय वेब सीरीज ‘पंचायत’ से मिली। सीरीज में उनके किरदार ने दर्शकों का ध्यान खींचा और उनके अभिनय को खास पहचान मिली। इसके बाद वह मनोरंजन जगत में एक पहचाना हुआ चेहरा बन गए।

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400 साल पुराने मंदिर से निकली 'द वन' की कहानी:अरुणाभ बोले- कहानी लिखते समय जीभ कटी, फिर नॉन-वेज छोड़ने का फैसला किया

टीवीएफ की चर्चित वेब सीरीज ‘पंचायत’ के निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा अब बड़े पर्दे पर ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ लेकर आ रहे हैं। फिल्म की कहानी भारतीय लोककथाओं, आस्था और संस्कृति से जुड़ी है। इसका आइडिया बिहार के करीब 400 साल पुराने वन देवी मंदिर की कहानी से आया। अरुणाभ कुमार ने एकता कपूर के साथ इसे प्रोड्यूस किया है और आनंदेश्वर द्विवेदी के साथ कहानी लिखी है। फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, मनीष पॉल और सुनील ग्रोवर नजर आएंगे। दैनिक भास्कर से बातचीत में अरुणाभ और दीपक ने फिल्म के आइडिया, 35-40 रातों तक चली शूटिंग, कलाकारों की मेहनत और कहानी से जुड़ा दिलचस्प किस्सा साझा किया। अरुणाभ ने बताया कि कहानी लिखते समय एक बार उनकी जीभ कट गई, जिसके बाद उन्होंने फिल्म पर काम करते हुए नॉन-वेज खाना छोड़ दिया। सवाल: सबसे पहले फिल्म के आइडिया के बारे में बताइए। क्या यह किसी लोककथा या सच्ची घटना से प्रेरित है? जवाब/अरुणाभ कुमार: इस कहानी के मूल स्रोत दो हैं। पहला श्रेय मैं एकता कपूर को देना चाहूंगा। हम अक्सर साथ में मंदिर जाते हैं। एक जनवरी को नए साल के मौके पर हम सिद्धिविनायक मंदिर जाते हैं। महाशिवरात्रि पर मुक्तेश्वर मंदिर भी गए हैं। इन यात्राओं के दौरान मंदिरों से जुड़ी कहानियों पर हमारी बातचीत होने लगी। एकता ने मुझे महालक्ष्मी मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर से जुड़ी कुछ अद्भुत कहानियां सुनाईं। इसके बाद मैंने उन्हें बताया कि बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में भी ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके पीछे बहुत दिलचस्प कहानियां हैं। तब हमें एहसास हुआ कि भारतीय संस्कृति में लगभग हर मंदिर के पीछे कोई न कोई अद्भुत कहानी है। सवाल : इस कहानी से आपका व्यक्तिगत जुड़ाव कैसे हुआ और फिल्म बनाने का फैसला कैसे हुआ? जवाब/अरुणाभ कुमार: दूसरा स्रोत मेरी मां हैं। वह मुझे दुर्गा पूजा के दौरान देवी और शक्ति के अलग-अलग मंदिरों में ले जाया करती थीं। हम वहां पूजा करते थे, साड़ी चढ़ाते थे और कई दिनों तक मंदिर जाते थे। इसी दौरान वह मुझे पटना से करीब 35 किलोमीटर दूर बिहटा स्थित वन देवी मंदिर लेकर गई थीं। यह करीब 400 साल पुराना मंदिर है। मान्यता है कि 16वीं सदी में वैद्यनाथ मिश्रा नाम के व्यक्ति ने इसे स्थापित किया था। उस समय वहां के लोग जंगल से जुड़े रहस्यमय तत्वों से परेशान थे। उनसे बचने के लिए उन्होंने दुर्गा के दस रूपों की प्रार्थना की और उन्हीं में से एक रूप वन देवी के रूप में वहां स्थापित हुआ। मैं इस कहानी से बहुत प्रभावित हुआ। मैंने यह कहानी दीपक और फिर एकता को सुनाई। उन्हें भी यह कहानी बहुत पसंद आई। एकता ने कहा कि इतनी बड़ी और अद्भुत कहानी को बड़े पर्दे पर लाना चाहिए। उन्हें लगा कि यह कहानी बड़े कैनवास की मांग करती है। यहीं से फिल्म की शुरुआत हुई। सवाल: दीपक जी, जब आपने पहली बार यह कहानी सुनी तो आपकी क्या प्रतिक्रिया थी? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: मैं बहुत उत्साहित था। हिंदी सिनेमा में इस तरह की लोककथा बड़े पर्दे पर पहले नहीं दिखाई गई है। मुझे यह बात बहुत नई लगी। हालांकि कहानी लोककथा है, लेकिन इसकी कहानी आज के समाज से जुड़ी है। जब हम किसी ऐसे मंदिर में जाते हैं तो हमारे मन में कई सवाल आते हैं- क्या यह सच है? ऐसा क्यों हुआ? ऐसी मान्यताएं कैसे बनीं? यही जिज्ञासा मुझे इस कहानी की तरफ खींच लाई। सवाल: जब आप सेट पर पहुंचे तो आपके दिमाग में फिल्म की पहली तस्वीर क्या थी? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: हमने कहानी के उस हिस्से से शुरुआत की थी, जहां कहानी मुंबई से शुरू होती है। मेरी पहली कोशिश यही थी कि शुरुआत में यह कहानी बिल्कुल सामान्य इंसान की कहानी लगे। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़े, उसकी असली दुनिया धीरे-धीरे खुलती जाए और उसमें अलग-अलग आयाम जुड़ते जाएं। जब मैं मुंबई में शूट कर रहा था तो मेरे दिमाग में फिल्म की तस्वीर अलग थी। जब गांव और जंगल वाले हिस्से में पहुंचा तो वह तस्वीर पूरी तरह बदल गई। हर लोकेशन और हर दिन अपने साथ एक नई चुनौती लेकर आया। हमारी कोशिश थी कि कहानी को उसकी जरूरत के मुताबिक पूरी तरह जस्टिस दिया जाए। सवाल: इस फिल्म से जुड़ा कोई ऐसा अनुभव रहा, जब आप लोग कहानी में पूरी तरह डूब गए? जवाब/अरुणाभ कुमार: हां, एक बहुत मजेदार किस्सा है। मैंने पहली बार गोवा में दीपक को यह कहानी सुनाई थी। कहानी लिखने के दौरान एक बार मैंने नॉन-वेज खाया और उसी समय मेरी जीभ कट गई। इसके बाद मैंने मन में तय कर लिया कि जब तक इस कहानी पर काम करूंगा, नॉन-वेज नहीं खाऊंगा। धीरे-धीरे बात इतनी आगे बढ़ गई कि मैं वेजिटेरियन ही बन गया। सुनने में यह बात आपको अजीब लग सकती है, लेकिन जब आप किसी कहानी में पूरी तरह डूब जाते हैं तो ऐसी चीजें होने लगती हैं। कई बार ऐसा होता है कि लव स्टोरी लिखते समय आपको अपना पुराना प्यार याद आने लगता है। माता-पिता पर कहानी लिखते हैं तो अपने पेरेंट्स की याद आती है। इसी तरह हम भी इस कहानी में धीरे-धीरे पूरी तरह घुसते चले गए। सवाल: दीपक जी, इस फिल्म की शूटिंग के दौरान आपके साथ ऐसा क्या हुआ जो हमेशा याद रहेगा? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: हमने करीब 35-40 रातों तक लगातार शूटिंग की। पूरी टीम ऐसी हो गई थी कि शूट खत्म होने के बाद भी रात में नींद आना मुश्किल हो गया था। इस कहानी में रात अपने आप में एक कैरेक्टर है। हमने रात में लगातार एक्शन और एक्टिंग सीन्स शूट किए। सुबह 6 बजे तक शूटिंग के बाद भी कलाकार पूरी ऊर्जा के साथ काम करते थे। सबसे अच्छी बात यह थी कि पूरी टीम कहानी में इतनी डूब गई थी कि किसी को महसूस ही नहीं होता था कि हम इतनी रातों से लगातार जाग रहे हैं। सवाल: कलाकारों ने फिल्म के लिए कितनी मेहनत की? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: : सभी कलाकारों ने बहुत मेहनत की। सिद्धार्थ और तमन्ना अपने सीन्स को लेकर काफी सीरियस थे। वे बार-बार पूछते थे कि इसे और बेहतर कैसे किया जा सकता है। कल्चरल ऑथेंटिसिटी को लेकर भी वे बहुत सजग थे। तमन्ना कई बार कहती थीं कि अगर कहानी की दुनिया इतनी ऑथेंटिक है तो उसे उसी तरह दिखाना चाहिए। सिद्धार्थ ने एक्शन पर भी काफी मेहनत की है। मनीष पॉल और सुनील ग्रोवर के किरदार भी दर्शकों के लिए अलग अनुभव होंगे। सवाल: सिद्धार्थ और तमन्ना की कास्टिंग कैसे हुई? जवाब/अरुणाभ कुमार: हमें ऐसा अभिनेता चाहिए था जो शुरुआत में शहर का लगे और बाद में गांव की दुनिया में फिट हो जाए। सिद्धार्थ की पर्सनैलिटी हमें इसके लिए सही लगी। हम करीब एक घंटे के लिए मिलने वाले थे, लेकिन तीन-चार घंटे तक कहानी और किरदार को लेकर बातचीत होती रही। उन्हें कहानी काफी रिलेटेबल लगी। दीपक ने उनके साथ जिस तरह काम किया है, मुझे लगता है कि यह सिद्धार्थ की बेहतरीन परफॉर्मेंस में से एक होगी। तमन्ना ने भी इस तरह का किरदार पहले नहीं निभाया है। हमें उम्मीद है कि दोनों की जोड़ी दर्शकों को पसंद आएगी। सवाल: टीवीएफ की पहली थिएट्रिकल फिल्म होने का अनुभव कैसा रहा? जवाब/अरुणाभ कुमार: यह फिल्म हमने किसी प्लान के तहत शुरू नहीं की थी। पहले कहानियां सुनाते-सुनाते यह आइडिया आया। एकता को कहानी पसंद आई, फिर हमने इसे लिखना शुरू किया और धीरे-धीरे फिल्म बनती चली गई। टीवीएफ की कहानियों में जो रिलेटेबलनेस है, वह इस फिल्म में भी रहेगी। साथ ही दर्शकों को बड़े पर्दे का सिनेमैटिक अनुभव मिलेगा। छठ पर्व, लोककथाएं, जंगल और एनीमेशन जैसे कई तत्व फिल्म को अलग बनाते हैं। सवाल: आपकी कौन-सी वेब सीरीज है, जिस पर आपको लगता है कि बेहतर फिल्म बनाई जा सकती है? जवाब/अरुणाभ कुमार: मुझे लगता है कि ‘ट्रिपलिंग’ पर फिल्म बन सकती है। ‘सपने वर्सेस एवरीवन’ पर भी फिल्म बनाई जा सकती है। ‘पंचायत’ पर भी अगर फिल्म बनानी हो तो बनाई जा सकती है। बनाने को तो हमारी कई कहानियों पर फिल्म बन सकती है, लेकिन आपने पूछा तो फिलहाल ये दो नाम मेरे दिमाग में आए। सवाल: ‘पंचायत’ के सीजन 5 को लेकर कोई अपडेट देना चाहेंगे? जवाब/दीपक कुमार मिश्रा: सीजन 5 आने वाला है। मैं भी उसका इंतजार कर रहा हूं। मैं भी उसे देखने के लिए उत्साहित हूं।

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Duleep Trophy Final: ईशान किशन 270, ईस्ट जोन 708 रन, साउथ जोन के लिए खतरे की घंटी

East zone vs South Zone Duleep Trophy Final: ईशान किशन की ऐतिहासिक 270 रन की पारी के बूते ईस्ट जोन ने अपने दलीप ट्रॉफी इतिहास का सबसे बड़ा स्कोर खड़ा करते हुए साउथ जोन को बैकफुट पर धकेल दिया. दो दिन के खेल के बाद ईस्ट जोन की पारी 708 रन पर सिमटी. अब तीसरे दिन का खेल जब शुरू होगा तो साउथ जोन के बल्लेबाजों की अग्निपरीक्षा भी शुरू होगी. Mon, 7 Sep 2026 18:03:21 +0530

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