भारतीय सेना की मारक क्षमता को लेकर अब एक ऐसा फैसला लिया गया है जो कि आने वाले दशकों तक देश की सरहद की सुरक्षा को नई दिशा देगा। AK203 एक ऐसी राइफल जिसने अपनी मजबूती और अचूक निशाने से दुनिया को अपना मुरीद बनाया। अब उसे अपनी शक्ति भी भारत से ही मिलेगी। अडानी डिफेंस एंड एयररोस्पेस ने इंडो रशियन राइफल प्राइवेट लिमिटेड आईआरआरपीएल के साथ 5 साल का मेगा एग्रीमेंट साइन कर लिया है। अब भारत की मिट्टी में ही बनी हुई गोलियां रूस की तकनीक से बनी हुई राइफलों से निकलेंगी। यह केवल एक कमर्शियल डील नहीं है बल्कि मेड इन इंडिया के सीने पर गर्व का नया तामगा भी है। अब सबसे पहले समझौते की गहराई को समझते हैं। अडानी डिफेंस ने अगले 5 सालों के लिए आईआरआरपीएल के साथ हाथ मिलाया। इस डील का मुख्य केंद्र है 7.62 * 39 एमm का स्मॉल कैलिबर एमुनेशन। यह वही गोलियां हैं जो कि AK 203 राइफल की जान मानी जाती हैं। इस समझौते का सबसे बड़ा जो रणनीतिक लाभ है वो यह है कि यह एक इंटीग्रेटेड डोमेस्टिक सप्लाई चेन का निर्माण करेगा।
आज के दौर में जब दुनिया में युद्धों की वजह से सप्लाई चेन टूट रही है तब भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि हमारी राइफल्स के लिए गोला बारूद की कमी नहीं होनी चाहिए। यह आत्मनिर्भरता का वो मॉडल है जहां हथियार बनाने वाली संस्था और गोला बारूद बनाने वाली संस्था एक साथ भारत को बाहरी दबाव से मुक्त कर रहे हैं। अब भारत को रूस या किसी देश से बाहर से बार-बार गोलियां मंगवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आईआरआरपीएल यानी कि इंडो रशियन राइफल प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना साल 2019 में हुई थी। यह भारत और रूस के बीच अटूट रक्षा संबंधों का जीता जागता उदाहरण है। उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले के कोरवा में स्थित इसकी फैक्ट्री आधुनिक हथियारों का नया मंदिर बन चुकी है। इस जॉइंट वेंचर में भारत की ओर से एडवांस वेपन एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड और म्यूशन इंडिया लिमिटेड शामिल है। और वहीं रूस की तरफ से विश्व प्रसिद्ध श्वता क्रशिकोफ और रोसोबनोट एक्सपर्ट इसकी रीड है। दिसंबर 2021 में सरकार ने 61400 27 AK203 राइफल्स के उत्पादन का जो कॉन्ट्रैक्ट दिया था वह अब पूरी रफ्तार पकड़ चुका है। इस फैक्ट्री से निकलने वाली हर राइफल के लिए स्वदेशी चारा यानी कि गोला बारूद भी तैयार हो रहा है।
इस पूरी कहानी में अडानी डिफेंस का रोल बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। उत्तर प्रदेश के कानपुर में अडानी डिफेंस ने दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा एमुनेशन और मिसाइल कॉम्प्लेक्स विकसित किया है। यह जो फैसिलिटी है, यह केवल ईंट पत्थरों से नहीं बनी है बल्कि यह भारत की निजी क्षेत्र की रक्षा क्षमताओं का प्रतीक बन रही है। इस समझौते के तहत अडानी डिफेंस ना केवल गोलियों की सप्लाई करेगी बल्कि वह भारतीय सेना की कंटिन्यूटी ऑफ एमुनेशन यानी कि गोला बारूद की निरंतर उपलब्धता की गारंटी देगी। यह डिफेंस सेक्टर में प्राइवेट प्लेयर के बढ़ते हुए दबदबे को भी दिखाता है। कानपुर के प्लांट की क्षमता इतनी है कि वह ना केवल भारतीय सेना बल्कि आने वाले समय में मित्र देशों की जरूरतों को भी पूरा कर सकते हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की उस सोच को साकार करता है जहां हम ना सिर्फ हथियार खरीदेंगे बल्कि उसके बड़े उत्पादक भी बनेंगे।
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नेपाल में भीषण बाढ़ से मची तबाही के दौरान भारत ने जिस तरह से नेपाल की मदद की उसने दुनिया को एक बहुत बड़ा संदेश दिया। भले ही नेपाल की सरकार शुरू में मदद लेने के लिए अजीब तरह की हरकतें कर रही थी, लेकिन फिर भी भारत ने एक पड़ोसी होने के नाते अपना धर्म और कर्म दोनों निभाया। तमाम चुनौतियों के बावजूद भी अपनी जान पर खेलकर भारत की रेस्क्यू टीम मलवे में दबे लोगों को लगातार निकाल रही है। जरूरतमंद लोगों तक खाने-पीने की मदद पहुंचाई जा रही है।
भारत के इसी रूप को देखकर नेपाल के पीएम के सुर बदल गए हैं। जो कुछ दिनों पहले तक चीन से हाथ मिलाकर भारत के साथ संबंधों को खराब करने का संकेत दे रहे थे। अब वही बालेन शाह भारत के मुरीद हो गए हैं। यानी कि संकट की घड़ी में भारत जिस तरह से चट्टान की तरह नेपाल के साथ खड़ा हुआ उसने बालेन शाह का मन बदल दिया है।
अब उन्होंने बहुत बड़ा फैसला लिया है जो चीन को भी चौंका देगा। खबर है कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालन शाह जल्द भारत के दौरे पर आ सकते हैं। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा होगी। जिससे दोनों देशों के संबंधों में अहम बदलाव आ सकता है। बालेन शाह के न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के बाद भारत आने की उम्मीद है। कई रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि बालन शाह दशहरा से पहले भारत आ सकते हैं। बालन शाह या तो न्यूयॉर्क से सीधे भारत आ सकते हैं या नेपाल लौटने के बाद अलग यात्रा के रूप में दौरा कर सकते हैं। हाल ही में नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम ने कहा था कि प्रधानमंत्री के रूप में बालन शाह की पहली विदेश यात्रा भारत की होगी। दरअसल पारंपरिक रूप से नेपाल के प्रधानमंत्री अपनी पहली द्विपक्षी यात्रा के लिए भारत को ही चुनते हैं।
हालांकि कई बार यह परंपरा टूटी भी है। खासतौर पर लिपुलेख, काला पानी जैसे मुद्दों को लेकर बालन शाह के बयानों ने इस दौरे को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी थी। नेपाल ने इन तीनों इलाकों को अपने आधिकारिक नक्शे में शामिल कर लिया था। जिसे डंके की चोट पर भारत ने खारिज कर दिया और कहा कि एक तरफा कारवाही से हकीकत नहीं बदलती। सीमा विवाद का मुद्दा दोनों देशों के बीच कुछ सालों में तनाव की अहम वजह बनकर उभरा है। हालांकि 26 अगस्त की भयावह बाढ़ ने हालात में काफी बदलाव किया है। क्योंकि आपदा के बाद भारत सबसे पहला मददगार बनकर खड़ा हुआ।
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