2030 तक हर साल 50 लॉन्च की तैयारी, 450 से अधिक स्टार्टअप्स के दम पर वैश्विक स्पेस पावर बनने की ओर बढ़ रहा भारत: पवन गोयनका
नई दिल्ली, 6 सितंबर (आईएएनएस)। भारत आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छूने की तैयारी कर रहा है। भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (आईएन-स्पेस) के चेयरमैन पवन के गोयनका ने रविवार को कहा कि भारत ने वर्ष 2030 तक हर साल 50 अंतरिक्ष प्रक्षेपण (लॉन्च) करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी और इसरो की तकनीकी क्षमता के संयोजन से भारत वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका को और मजबूत कर रहा है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा किए गए अपने विचारों में पवन गोयनका ने कहा कि पांच वर्ष पहले भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था। इस फैसले के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य थे। पहला, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को नई और उन्नत तकनीकों पर काम करने का अवसर देना और दूसरा, निजी उद्योगों को अंतरिक्ष क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विस्तार करने का मौका प्रदान करना। उन्होंने कहा कि आज दोनों लक्ष्य धरातल पर साकार होते दिखाई दे रहे हैं।
पवन गोयनका ने अपने पोस्ट में कहा कि पांच वर्ष पहले भारत में अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े स्टार्टअप्स की संख्या बेहद सीमित थी, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 450 से अधिक हो चुकी है। निजी कंपनियां अब केवल प्रोटोटाइप तैयार करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अंतरिक्ष प्रक्षेपण और उपग्रह निर्माण जैसे जटिल क्षेत्रों में भी सफलता हासिल कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि एक भारतीय निजी कंपनी पहले ही सफलतापूर्वक रॉकेट को कक्षा में भेज चुकी है। यह उपलब्धि इस बात का संकेत है कि भारतीय निजी अंतरिक्ष उद्योग अब प्रयोगात्मक चरण से आगे बढ़कर व्यावसायिक स्तर पर काम करने की क्षमता विकसित कर चुका है।
गोयनका ने कहा कि अब सबसे बड़ी चुनौती इस क्षेत्र का बड़े पैमाने पर विस्तार करना है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने हर वर्ष 50 लॉन्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
उन्होंने कहा कि इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार और निजी उद्योगों को मिलकर काम करना होगा। केवल तकनीकी विकास पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि बड़े पैमाने पर निर्माण क्षमता विकसित करना, अधिक रॉकेट तैयार करना, अधिक उपग्रह बनाना और नई तकनीकों का विकास भी आवश्यक होगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी शुरू होने के बाद भारत का स्पेस इकोसिस्टम तेजी से विकसित हुआ है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में जहां अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़ा केवल एक स्टार्टअप था, वहीं अगस्त 2026 तक ऐसी कंपनियों की संख्या लगभग 440 से अधिक हो चुकी है।
वर्तमान में भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 9 अरब डॉलर आंका जाता है। अनुमान है कि अगले एक दशक में यह बढ़कर 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। वहीं, निजी निवेश भी तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2021-22 में जहां इस क्षेत्र में 100.5 मिलियन डॉलर का निवेश हुआ था, वहीं मार्च 2026 तक यह बढ़कर 618.5 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया।
पवन गोयनका ने कहा कि अब निजी उद्योगों को अलग-अलग परियोजनाओं से आगे बढ़कर बड़े पैमाने पर विनिर्माण क्षमता विकसित करनी होगी। अधिक रॉकेट, अधिक उपग्रह, अधिक प्रक्षेपण क्षमता और नई अंतरिक्ष तकनीकों का विकास भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेगा।
उन्होंने कहा कि इसरो की भूमिका भविष्य में भी नई तकनीकी सीमाओं को आगे बढ़ाने पर केंद्रित रहेगी, जबकि निजी कंपनियां उन तकनीकों को व्यावसायिक उत्पादों और सेवाओं में बदलने का काम करेंगी।
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र में कई कंपनियां तेजी से उभर रही हैं। स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉसमॉस, पिक्सल और दिगांतारा जैसी कंपनियां लॉन्च व्हीकल, उपग्रह निर्माण, पृथ्वी अवलोकन और अंतरिक्ष तकनीक-आधारित सेवाओं के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
पवन गोयनका की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब इसरो ने हाल ही में जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट के जरिए ईओएस-05 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया है। यह भारत का पहला इमेजिंग सैटेलाइट है, जिसे भू-समकालिक कक्षा से संचालन के लिए डिजाइन किया गया है।
यह उपग्रह आपदा प्रबंधन, कृषि, पर्यावरण निगरानी और रणनीतिक पर्यवेक्षण जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसके अलावा करीब 2,367 किलोग्राम वजनी ईओएस-05 जीएसएलवी द्वारा प्रक्षेपित अब तक का सबसे भारी उपग्रह भी बन गया है, जो भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता को दर्शाता है।
पवन गोयनका ने कहा कि भारत के सामने अब एक बड़ा अवसर मौजूद है। उन्होंने कहा, भारत में निर्माण करो, भारत से लॉन्च करो और भारत से पूरी दुनिया को सेवाएं प्रदान करो।
उनका मानना है कि भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और तकनीकी नेतृत्व को भी नई दिशा देगा। उन्होंने विश्वास जताया कि भारत वास्तविक और प्रतीकात्मक दोनों अर्थों में अपने अंतरिक्ष क्षेत्र को एक नई कक्षा में पहुंचाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
--आईएएनएस
डीबीपी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
भारत में खेले जाते हैं कौन-कौन से घरेलू टूर्नामेंट? BCCI कैसे तैयार करता है स्टार खिलाड़ी, समझिए पूरा गणित
BCCI Domestic Tournament: इस बात में कोई दोराय नहीं है कि बीसीसीआई इंटरनेशनल खिलाड़ियों के साथ-साथ अपने डोमेस्टिक प्लेयर्स को भी काफी मौके देती है. पूरे साल जहां, टीम इंडिया किसी न किसी टीम के साथ मैच खेलती रहती है, वहीं घरेलू स्तर पर बीसीसीआई के कई टूर्नामेंट्स भी खेले जा रहे होते हैं, जिसमें युवा खिलाड़ी प्रदर्शन करके टीम इंडिया तक का सफर तय करते हैं. अलग-अलग फॉर्मेट में खेले जाने वाले इस इवेंट्स में वह इंटरनेशनल प्लेयर्स भी हिस्सा लेते हैं, जो उस वक्त टीम का हिस्सा नहीं होते या ब्रेक पर होते हैं. जी हां, हर फॉर्मेट के लिए भारत में घरेलू टूर्नामेंट्स खेले जाते हैं. तो आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि भारत में कौन-कौन से डोमेस्टिक टूर्नामेंट खेले जाते हैं...
रणजी ट्रॉफी
रणजी ट्रॉफी भारत का सबसे अहम और प्रमुख घरेलू फर्स्ट-क्लास क्रिकेट प्रतियोगिता है. इसकी शुरुआत 1934-35 में हुई थी. टूर्नामेंट का पहला मुकाबला 4 नवंबर 1934 को मद्रास और मैसूर के बीच खेला गया था. शुरुआत में इसका नाम ‘क्रिकेट चैंपियनशिप ऑफ इंडिया’ था, लेकिन 1935-36 से इसका नाम महान भारतीय क्रिकेटर सर रंजीतसिंहजी (रणजी) के सम्मान में रणजी ट्रॉफी रखा गया.
इस प्रतियोगिता में भारत के अलग-अलग राज्यों और क्रिकेट संघों की टीमें हिस्सा लेती हैं. रणजी ट्रॉफी से कई दिग्गज खिलाड़ियों ने भारतीय टीम तक का सफर तय किया है. मुंबई इस टूर्नामेंट की सबसे सफल टीम है, जिसने रिकॉर्ड 42 बार खिताब जीता है. मुंबई ने 1958-59 से 1972-73 तक लगातार 15 खिताब भी जीते थे. 2025-26 सीजन में जम्मू-कश्मीर ने पहली बार रणजी ट्रॉफी का खिताब जीता, जबकि कर्नाटक 8 खिताब के साथ दूसरी सबसे सफल टीम है.
दलीप ट्रॉफी
दलीप ट्रॉफी भारत की मुख्य फर्स्ट-क्लास क्रिकेट प्रतियोगिताओं में से एक है. इसकी शुरुआत 1961-62 सीजन में हुई थी., जिसका नाम महान भारतीय क्रिकेटर कुमार श्री दलीपसिंहजी के सम्मान में रखा गया था. वह रणजी के भतीजे थे और इंग्लैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट भी खेल चुके थे. शुरुआत में टूर्नामेंट में भारत के अलग-अलग जोन की टीमें हिस्सा लेती थीं और इसे नॉकआउट आधार पर खेला जाता था. बाद में इसके फॉर्मेट में कई बदलाव किए गए.
दलीप ट्रॉफी के इतिहास में वेस्ट जोन सबसे सफल टीम है. उसने अब तक 19 बार खिताब जीता है. टूर्नामेंट में नॉर्थ, साउथ, ईस्ट और सेंट्रल जोन जैसी टीमें भी प्रमुख रूप से हिस्सा लेती रही हैं. यह टूर्नामेंट भारतीय क्रिकेट में प्रतिभाओं को पहचानने और खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम के लिए तैयार करने का अहम मंच माना जाता है.
The captains are ready ????????
— BCCI Domestic (@BCCIdomestic) September 6, 2026
The teams are ready ????????
Let's go ????#DuleepTrophy | #EZvSZ pic.twitter.com/5ysM6ZIrEv
ईरानी कप
भारत के मुख्य डोमेस्टिक टूर्नामेंट्स में ईरानी कप का नाम भी शुमार है. ये एक भारत की एक प्रतिष्ठित फर्स्ट क्लास क्रिकेट प्रतियोगिता है. इसकी शुरुआत 1959-60 सीजन में रणजी ट्रॉफी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में हुई थी. इस टूर्नामेंट का नाम बीसीसीआई के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष और अध्यक्ष रहे जाल आर. ईरानी Z. R. Irani के नाम पर रखा गया.
यह वार्षिक मुकाबला मौजूदा रणजी ट्रॉफी विजेता और भारत के अन्य राज्यों के चुनिंदा खिलाड़ियों से बनी 'शेष भारत' (Rest of India - ROI) टीम के बीच खेला जाता है. पांच दिनों तक चलने वाले इस मैच को जीतने वाली टीम चैंपियन बनती है. इतिहास की बात करें तो शेष भारत (ROI) ने सबसे ज्यादा 30 बार यह खिताब जीता है. वहीं, घरेलू राज्य टीमों में मुंबई सबसे सफल टीम है, जिसने 15 बार ईरानी कप पर कब्जा किया है. यह टूर्नामेंट युवा खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम के चयनकर्ताओं के सामने अपनी प्रतिभा दिखाने का एक बेहतरीन मंच प्रदान करता है.
विजय हजारे ट्रॉफी
विजय हजारे ट्रॉफी भारत की एक प्रमुख घरेलू सीमित ओवरों की क्रिकेट प्रतियोगिता है. इसकी शुरुआत सीजन 1993-94 में 'रणजी वनडे ट्रॉफी' के रूप में हुई थी, जिसे साल 2002-03 में एक राष्ट्रीय नॉकआउट टूर्नामेंट का रूप दिया गया. इसके बाद साल 2007 में भारत के महान और दिग्गज क्रिकेटर विजय हजारे के सम्मान में इसका नाम बदलकर 'विजय हजारे ट्रॉफी' रख दिया गया. विजय हजारे वही कप्तान थे जिनकी अगुवाई में भारत ने 1952 में अपनी पहली टेस्ट जीत दर्ज की थी.
इस टूर्नामेंट का आयोजन बीसीसीआई द्वारा किया जाता है, जिसमें रणजी ट्रॉफी की सभी 38 टीमें हिस्सा लेती हैं. इतिहास की बात करें तो राष्ट्रीय नॉकआउट दौर के बाद से तमिलनाडु और कर्नाटक ने सबसे ज्यादा 5-5 बार यह प्रतिष्ठित खिताब जीता है. टूर्नामेंट के नवीनतम 2025-26 संस्करण की विजेता विदर्भ की टीम रही है.
सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी
सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी भारत की T20 फॉर्मेट वाली प्रतियोगिता है. इसकी शुरुआत सीजन 2006-07 में 'इंटर-स्टेट ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट' के नाम से हुई थी. बाद में साल 2010 में BCCI ने इसका नाम बदलकर 'सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी' रख दिया. यह नाम भारत के महान और दिग्गज क्रिकेटर सैयद मुश्ताक अली के सम्मान में रखा गया, जिन्होंने 1936 में इंग्लैंड के खिलाफ विदेशी धरती पर टेस्ट शतक लगाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बनने का गौरव हासिल किया था.
इस वार्षिक टूर्नामेंट में रणजी ट्रॉफी की सभी 38 टीमें भाग लेती हैं. आईपीएल नीलामी से ठीक पहले होने के कारण युवाओं के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण मंच है. इतिहास की बात करें तो तमिलनाडु इस टूर्नामेंट की सबसे सफल टीम है, जिसने सबसे ज्यादा 3 बार यह खिताब जीता है. टूर्नामेंट के हालिया 2025-26 संस्करण की चैंपियन झारखंड की टीम रही, जिसने ईशान किशन की कप्तानी में पहली बार यह ट्रॉफी उठाई.
सीनियर वुमेन्स टूर्नामेंट में मुख्य रूप से दो टूर्नामेंट शामिल हैं:-
सीनियर महिला वन-डे ट्रॉफी: यह 50-50 ओवर का फॉर्मेट है, जहां विभिन्न राज्यों की टीमें घरेलू स्तर पर प्रतिस्पर्धा करती हैं. सीनियर महिला टी20 ट्रॉफी: यह फटाफट क्रिकेट का रोमांचक फॉर्मेट है, जो खिलाड़ियों को राष्ट्रीय टीम और विमेंस प्रीमियर लीग (WPL) के लिए तैयार करता है. इंटर-जोनल टूर्नामेंट के तहत अलग-अलग जोन (जैसे नॉर्थ, साउथ, ईस्ट, वेस्ट, सेंट्रल, नॉर्थ-ईस्ट) के बीच मुकाबले होते हैं. इसमें सीनियर महिला मल्टी-डे ट्रॉफी और वनडे अंतर-क्षेत्रीय ट्रॉफी शामिल हैं, जो खिलाड़ियों के धैर्य और तकनीकी कौशल को निखारती हैं.
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation







