1569 के बाद अब बदला दुनिया का नक्शा, 164 देशों ने नए विश्व मानचित्र का किया समर्थन
New World Map: मानव इतिहास में नक्शों ने हमेशा से हमारी सोच, भूगोल और दुनिया को देखने के नजरिए को गढ़ा है. सदियों से जिस चपटे कागज पर हम दुनिया को देखते आए हैं, वह असल में हमारी धरती की एक भ्रामक तस्वीर पेश कर रहा था. समय के साथ इस गलती को सुधारने की मांग उठती रही और आखिरकार अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है.
साल 1569 में बनाया गया था दुनिया का नक्शा
सोलहवीं सदी में जब जेरार्डस मर्केटर ने साल 1569 में दुनिया का नक्शा बनाया था, तब उसका मुख्य उद्देश्य यूरोपीय खोजकर्ताओं को समुद्र में रास्ता खोजने में मदद करना था. यह नक्शा नौकायन के लिए तो उपयोगी साबित हुआ, लेकिन एक गोलाकार पृथ्वी को सपाट कागज पर दिखाने की प्रक्रिया में इसके अनुपात पूरी तरह बिगड़ गए.
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जानें नक्शे में क्या थी तकनीकी खामी
मर्केटर प्रोजेक्शन की सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि यह भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों, जैसे कि उत्तरी अमेरिका, यूरोप, रूस और ग्रीनलैंड को उनके वास्तविक आकार से कई गुना बड़ा दिखाता था, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास के इलाके छोटे नजर आते थे. इसी तकनीकी खामी के कारण ग्रीनलैंड और विशाल अफ्रीकी महाद्वीप नक्शे पर लगभग एक बराबर आकार के दिखाई देते थे, जबकि हकीकत में अफ्रीका ग्रीनलैंड से चौदह गुना बड़ा है.
164 देशों ने किया मानचित्र का समर्थन
संयुक्त राष्ट्र महासभा में हाल ही में हुए मतदान में इस पुरानी ऐतिहासिक भूल को सुधारने की आधिकारिक शुरुआत कर दी गई है. टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसी द्वारा अफ्रीकी यूनियन के समर्थन से पेश किए गए 'इक्वल अर्थ कार्टोग्राफिक प्रोजेक्शन' प्रस्ताव को भारी बहुमत मिला. इस मतदान में भारत, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम समेत 164 देशों ने नए मानचित्र का समर्थन किया, जबकि अमेरिका अकेला ऐसा देश था जिसने इसके विरोध में वोट दिया. अमेरिकी प्रतिनिधियों ने इसे गंभीर वैश्विक मुद्दों से भटकाव करार दिया, वहीं समर्थक देशों का मानना था कि यह बदलाव दुनिया की एक न्यायसंगत और वास्तविक तस्वीर पेश करने की दिशा में एक जरूरी कदम है.
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किसी भी नक्शे का बदलना केवल भौगोलिक सीमाओं का फेरबदल नहीं होता, बल्कि यह हमारी सामूहिक चेतना और वैचारिक समझ को भी प्रभावित करता है. दशकों तक छोटे दिखाए गए अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और दक्षिण एशियाई देश अब वैश्विक मानचित्र पर अपने सही अनुपात में जगह पा रहे हैं. फ्रांस जैसे देशों द्वारा इस नए प्रोजेक्शन को अपनाने की घोषणा करना इस बात का प्रमाण है कि नक्शों की यह राजनीति अब औपनिवेशिक दृष्टिकोण से बाहर निकलकर भौगोलिक यथार्थ की ओर बढ़ रही है. अंततः यह नया मानचित्र आने वाली पीढ़ियों को हमारी धरती का एक अधिक सटीक, संतुलित और सच्चा परिचय कराएगा.
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Jharkhand: झारखंड के दुमका में पहली बार होगी नारियल की खेती, 10 हजार पौधों से किसानों की बढ़ेगी कमाई
Jharkhand: झारखंड की उपराजधानी दुमका के किसानों के लिए अच्छी खबर है. अब यहां किसान पहली बार नारियल की खेती कर अपनी आमदनी बढ़ा सकेंगे. कृषि विभाग ने इसके लिए पायलट प्रोजेक्ट तैयार करना शुरू कर दिया है. योजना के तहत दुमका के सभी 10 प्रखंडों में करीब 10 हजार नारियल के पौधे लगाए जाएंगे. दरअसल, अब नारियल को सिर्फ समुद्र के किनारे वाले राज्यों की फसल नहीं माना जाता. देश के कई दूसरे हिस्सों में भी इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. नारियल की बढ़ती मांग और खपत को देखते हुए दुमका के उपायुक्त अभिजीत सिन्हा ने कृषि विभाग को यहां नारियल की खेती शुरू कराने का निर्देश दिया है.
किसानों को मुफ्त मिलेंगे पौधे
कृषि विभाग के अनुसार, पायलट प्रोजेक्ट में दुमका के सभी 10 प्रखंडों के किसानों को शामिल किया गया जाएगा. इसके लिए पहले किसानों की पहचान की जाएगी. किसान अपने खेत, बाड़ी या तालाब की मेढ़ पर नारियल के पौधे लगा सकेंगे. जिला कृषि पदाधिकारी लव कुमार के मुताबिक, किसानों को नारियल विकास बोर्ड की मिशन इंटीग्रेटेड हॉर्टिकल्चर डेवलपमेंट योजना से जोड़ने के लिए विभाग ने पत्राचार किया है. उन्नत किस्म के 10 हजार पौधों के लिए नारियल विकास बोर्ड की पटना शाखा से मांग की गई है. बता दें कि चिह्नित किसानों को 10 से लेकर 300 तक पौधे दिए जा सकते हैं. पहली बार पौधे किसानों को मुफ्त मिलेंगे. साथ ही नारियल विकास बोर्ड के विशेषज्ञ किसानों को खेती और पौधों की देखभाल का प्रशिक्षण भी देंगे.
एक एकड़ में 65 से 71 पौधे
तैयार किए जा रहे ब्लू प्रिंट में एकल खेती के साथ मिश्रित खेती पर भी जोर दिया गया है. एक एकड़ जमीन में 7.5 मीटर की दूरी पर करीब 65 से 71 नारियल के पौधे लगाए जा सकते हैं. पौधे लगाने के लिए करीब एक मीटर लंबा, चौड़ा और गहरा गड्ढा तैयार करना होगा. सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है. नारियल के साथ केला, पपीता, सब्जियां, हल्दी और अदरक जैसी अंतर फसलें भी उगाई जा सकती हैं. इससे किसानों को एक ही जमीन से अतिरिक्त आमदनी मिल सकती है.
तीन से चार साल में शुरू हो सकता है उत्पादन
नारियल की उन्नत किस्मों में चौघट ऑरेंज ड्वार्फ, कल्पश्री, कल्प ज्योति, कल्प सूर्या, कल्प स्वर्णा, कल्प हरिता, चंद्र शंकरा, केरा शंकरा, समृद्धि और कल्प श्रेष्ठ शामिल हैं. इनमें कई किस्मों में तीन से चार साल में फल आना शुरू हो सकता है. नारियल के पेड़ में अलग-अलग समय पर फूल और फल विकसित होते हैं. इसलिए पूरी फसल एक साथ तैयार नहीं होती. सामान्य तौर पर 45 से 60 दिन के अंतराल पर नारियल की तुड़ाई की जा सकती है. साल में करीब 6 से 8 बार फल मिल सकते हैं, जिससे किसानों को नियमित आमदनी का मौका मिलेगा.
पानी और खाद का रखना होगा ध्यान
नारियल की खेती में खाद और पानी का विशेष ध्यान रखना जरूरी है. विकसित पेड़ को सलाना करीब 50 किलो जैविक खाद के साथ जरूरी पोषक तत्व देने की जरूरत होती है. दुमका में गर्मी के दौरान पानी की कमी बड़ी चुनौती हो सकती है. इसलिए ब्लू प्रिंट में बोरिंग, कुआं और ड्रिप सिंचाई जैसी सुविधाओं की व्यवस्था पहले से करने का सुझाव दिया गया है.
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