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Makhan Mishri Recipe: जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को चढ़ाएं पसंदीदा माखन-मिश्री का भोग, नोट करें आसान रेसिपी

Makhan Mishri Recipe: आज देशभर में धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है. जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है. आज उनका 5253वां जन्मोत्सव मनाया जा रहा है. हम सभी ने कान्हा की बचपन की लीलाएं सुनी हैं, उन्हीं में से माखन चुराकर खाना भी शामिल है. उन्हें आज के दिन 56 भोगों का प्रसाद चढ़ाया जाता है लेकिन उनमें सबसे खास होता है माखन-मिश्री. ये उनका सबसे प्रिय भोग माना जाता है. मगर आजकल बाजारों से इन्हें खरीदना एक मुश्किल स्थिति हो गई है. मिठाइयों की मिलावट ने भोग को लेकर भी लोगों के मन में शंका भर दी है. प्रसाद का शुद्ध और सात्विक होना आवश्यक होता है.

ऐसे में अगर आप घर में ही माखन-मिश्री बनाना चाहते हैं तो इस आसान विधि से बना सकते हैं. कान्हा की पूजा के लिए घर पर शुद्ध और ताजा माखन-मिश्री बनाना है तो इन चीजों की आवश्यकता होगी.

माखन-मिश्री बनाने की सामग्रियां (Makhan Mishri Ingredients)

  • शुद्ध् देसी घी
  • बर्फ के टुकड़े
  • ठंडा पानी
  • धागे वाली मिश्री
  • केसर
  • तुलसी के पत्ते

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माखन-मिश्री बनाने की स्टेप-बाय-स्टेप रेसिपी (Makhan Mishri Recipe) 

स्टेप.1- सबसे पहसे एक बड़े और चौड़े मुंह वाले बर्तन या किसी पतीले और कटोरी में 1 कप देसी घी डाल दें. घी सामान्य तापमान का या पिघला होना चाहिए. अब उसमें बर्फ के टुकड़े डालें.

स्टेप.2- अब साफ हाथों से बर्फ को घी के ऊपर गोल-गोल घुमाएं. ये हैंड व्हिस्किंग प्रोसेस होता है, जिसमें आपको एक सामान्य गती में बर्फ को लगातार रोटेट करना होता है.

स्टेप.3- जैसे-जैसे बर्फ से घी को फेटेंगे तो आप देखेंगे 1 से 2 मिनटों में ही उसका टेक्सचर में बदलाव आ जाएगा. घी का टेक्सचर बिल्कुल सॉफ्ट और फ्लफी सा हो जाएगा. ये आपको बिल्कुल मक्खन जैसे महसूस होगा और हल्का लगेगा.

स्टेप.4- जब घी से पूरी तरह सफेद मलाईदार मक्खन निकल जाए तो बर्फ के टुकड़े निकाल लें. इसके बाद माखन से पानी को भी अलग करके बाहर निकाल दें.

स्टेप.5- अब आप चाहे तो बर्फ के पानी या ठंडे पानी से माखन को थोड़ा साफ कर सकते हैं. मगर ऐसा करते समय हल्के हाथों का इस्तेमाल करें ताकि माखन बिखर न जाएं.

स्टेप.6- इसके बाद माखन में मिश्री मिलाई जाती है. मिश्री को पहले से पीसकर पाउडर बना सकते हैं और फिर माखन में डालकर एक बार फिर से फेंट लें. 

स्टेप.7- केसर मिलाएं. इसके लिए आप केसर को थोड़े से गंगाजल में भिगोकर रख सकते हैं. इसके बाद माखन में डालकर मिक्स कर दें. केसर मिलाने से माखन का रंग सुनहरा हो जाएगा और उसमें एक सुगंध भी आने लगेगी.

स्टेप.8- माखन तैयार है. इसमें तुलसी के पत्ते डाल दें.

स्टेप.9- अब भोग लगाने के लिए आपको एक छोटी सी मटकी लेनी है. उस मटकी में माखन भरें. ऊपर से केसर और तुलसी के पत्ते रखें. इसके बाद बाल-गोपाल को भोग चढ़ाएं.

आपका शुद्ध और ताजा मलाईदार माखन-मिश्री तैयार है. भगवान जी को भोग लगाने के पश्चात ही इसे स्वयं ग्रहण करें.

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‘तालानगरी’ के नाम से मिली पहचान? जानें अलीगढ़ जिले का चुनावी इतिहास

UP Elections 2027: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलीगढ़ जिले की अपनी खास अहमियत है. इसे एक तरफ जहां ‘तालानगरी’ के नाम से पहचान मिली है, वहीं दूसरी तरफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के कारण यह देश की शिक्षा और राजनीति के नक्शे पर भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है. जिले का राजनीतिक प्रभाव केवल अलीगढ़ शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी ग्रामीण और कस्बाई विधानसभा सीटें भी पश्चिमी यूपी के चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती हैं. 

7 विधानसभा सीटों का खेल

वर्तमान विधानसभा व्यवस्था के अनुसार अलीगढ़ जिले में 7 विधानसभा सीटें हैं. इनमें खैर, बरौली, अतरौली, छर्रा, कोल, अलीगढ़ और इगलास प्रमुख रूप से शामिल हैं. जिला प्रशासन की सूची में भी इन सातों सीटों को क्रमशः 71 से 77 तक दर्ज किया गया है. 

अलीगढ़ लोकसभा क्षेत्र में जिले की पांच विधानसभा सीटें खैर, बरौली, अतरौली, छर्रा और कोल आती हैं, जबकि अलीगढ़ और इगलास क्रमशः अन्य संसदीय क्षेत्रों का हिस्सा हैं. यही वजह है कि जिले का चुनावी गणित विधानसभा और लोकसभा दोनों स्तर पर महत्वपूर्ण हो जाता है.

अलीगढ़ क्यों है यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण?

अलीगढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित ऐसा जिला है जहां शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का मिश्रण देखने को मिलता है. यहां जाट, ठाकुर, ब्राह्मण, दलित, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं की मौजूदगी चुनावी समीकरणों को बहुआयामी बनाती है.

जिले की पहचान शिक्षा, ताला उद्योग, कृषि और व्यापार से भी जुड़ी है. जिला प्रशासन के मुताबिक अलीगढ़ का क्षेत्रफल करीब 3,650 वर्ग किलोमीटर है और यह अलीगढ़ मंडल का मुख्यालय भी है.

अलीगढ़ का ऐतिहासिक नाम कोल या कोइल रहा है. जिला प्रशासन के इतिहास पृष्ठ के मुताबिक 18वीं सदी से पहले अलीगढ़ को मुख्य रूप से कोल/कोइल के नाम से जाना जाता था.

अलीगढ़ की आबादी कितनी है?

अलीगढ़ जिले की जनसंख्या के लिए नवीनतम पूर्ण आधिकारिक जनगणना आंकड़े 2011 Census के हैं. जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार उस समय अलीगढ़ की कुल आबादी 36,73,889 थी. इसमें 19,51,996 पुरुष और 17,21,893 महिलाएं थीं.

अलीगढ़ की आबादी

श्रेणी    -      आबादी

कुल आबादी -   36,73,889
पुरुष  -  19,51,996
महिलाएं  -  17,21,893
लिंगानुपात -   करीब 882 महिलाएं/1000 पुरुष
0-6 वर्ष की आबादी -   5,74,509
ग्रामीण आबादी -   24,56,698
शहरी आबादी -   12,17,191

2011 के आंकड़ों के मुताबिक जिले की करीब 66.87% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और करीब 33.13% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती थी.

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 2026 की वास्तविक आधिकारिक जनगणना-आधारित आबादी उपलब्ध नहीं है. इसलिए चुनावी विश्लेषण में 2011 Census को आधार बनाना अधिक विश्वसनीय है, जबकि वर्तमान आबादी के अनुमान को अलग से पेश किया जाना चाहिए.

अलीगढ़ की धार्मिक आबादी कितनी है?

अलीगढ़ जिले में हिंदू आबादी बहुसंख्यक है, जबकि मुस्लिम समुदाय जिले का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह है. 2011 Census के आधार पर धार्मिक संरचना इस प्रकार है.

 

Photograph: (Photo-AI)

 

इन आंकड़ों से साफ है कि जिले में हिंदू आबादी करीब चार-पांचवें हिस्से के बराबर है, जबकि मुस्लिम आबादी लगभग पांचवां हिस्सा है. हालांकि विधानसभा स्तर पर धार्मिक और सामाजिक संरचना जिले के औसत से काफी अलग हो सकती है, इसलिए पूरे जिले के आंकड़े को किसी एक सीट का सटीक वोट बैंक मानना उचित नहीं होगा.

अलीगढ़ की शिक्षा दर कितनी है?

2011 Census के अनुसार अलीगढ़ जिले की कुल साक्षरता दर 69.61% बताई जाती है. पुरुष साक्षरता करीब 80.24%, जबकि महिला साक्षरता करीब 57.48% है.

 

Photograph: (Photo - AI)

 

इस आंकड़े से पता चलता है कि जिले में पुरुष और महिला साक्षरता के बीच बड़ा अंतर मौजूद था. चुनावी दृष्टि से शिक्षा का स्तर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रोजगार, शहरीकरण, सरकारी योजनाओं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों की प्राथमिकता को प्रभावित कर सकता है.

नोट: कुछ द्वितीयक स्रोत अलीगढ़ की साक्षरता के लिए अलग आंकड़े देते हैं, खासकर ग्रामीण-शहरी या अलग Census tables के आधार पर. ऊपर दिया गया 69.61%, पुरुष 80.24% और महिला 57.48% जिला-स्तरीय 2011 आंकड़ों पर आधारित है.

 

Photograph: (Photo -AI)

उत्तर प्रदेश विधानसभा की मौजूदा सदस्य सूची में भी खैर से सुरेंद्र दिलेर तथा अलीगढ़, कोल, अतरौली, छर्रा और बरौली से भाजपा के विधायक दर्ज हैं.

अलीगढ़ विधानसभा सीटों का चुनावी इतिहास

अलीगढ़ की राजनीति में पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का दबदबा तेजी से बढ़ा है. 2017 में भाजपा ने जिले की सभी सात विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी.

2022 में भी भाजपा ने सातों सीटें अपने नाम कीं। यानी लगातार दो विधानसभा चुनावों में जिले की 7/7 सीटें भाजपा के खाते में गईं.

लेकिन इससे पहले 2012 का चुनाव पूरी तरह अलग तस्वीर दिखाता है. उस समय सातों सीटों में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर था और सपा, रालोद तथा अन्य दलों ने कई सीटों पर जीत दर्ज की थी.

Photograph: (Photo - AI)

2022 में कैसे चला भाजपा का सिक्का?

2022 में अलीगढ़ जिले की सातों विधानसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. खास बात यह रही कि कुछ सीटों पर जीत का अंतर बहुत बड़ा था, जबकि कोल सीट पर मुकाबला काफी करीबी रहा.

कोल में भाजपा के अनिल पाराशर को 1,08,067 वोट मिले, जबकि सपा के शाज इशाक को 1,03,039 वोट मिले। जीत का अंतर सिर्फ 5,028 वोट रहा.

वहीं अलीगढ़ सदर सीट पर भाजपा की मुक्ता राजा ने सपा के जफर आलम को 12,786 वोटों से हराया. इगलास में भाजपा के राजकुमार सहयोगी ने रालोद के बीरपाल सिंह दिवाकर को 59,163 वोटों से मात दी.

बरौली में भाजपा के जयवीर सिंह की जीत का अंतर 90,645 वोट रहा, जबकि अतरौली में संदीप कुमार सिंह ने सपा के वीरेश यादव को 39,324 वोटों से हराया. छर्रा में रवींद्र पाल सिंह की जीत का अंतर 24,327 वोट रहा.

खैर सीट ने बदला समीकरण

अलीगढ़ जिले की खैर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. 2022 में भाजपा के अनूप प्रधान वाल्मीकि यहां से विधायक बने थे. बाद में उनके लोकसभा चुनाव लड़ने के कारण सीट खाली हुई और 2024 में उपचुनाव कराया गया.

उपचुनाव में भाजपा ने सुरेंद्र दिलेर को मैदान में उतारा. उन्होंने सपा की चारू कैन को 38,393 वोटों से हराकर सीट भाजपा के पास बरकरार रखी. चुनाव में सुरेंद्र दिलेर को 1,00,181 और चारू कैन को 61,788 वोट मिले. इस जीत ने अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों में भाजपा के मौजूदा प्रभाव को और मजबूत किया. 

कोल सीट क्यों है खास?

अलीगढ़ की कोल विधानसभा सीट को जिले की महत्वपूर्ण शहरी सीटों में गिना जाता है. 2012 में यहां सपा के जमी़र उल्लाह खान ने जीत दर्ज की थी. 2017 में भाजपा के अनिल पाराशर ने बड़ी जीत हासिल की और 2022 में भी उन्होंने सीट बरकरार रखी. लेकिन 2022 में भाजपा और सपा के बीच अंतर केवल 5,028 वोट रहा. यही कारण है कि अलीगढ़ के आगामी विधानसभा चुनाव में कोल सीट पर मुकाबले को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है.

अतरौली और कल्याण सिंह की विरासत

अतरौली विधानसभा सीट का नाम भाजपा के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत से भी जुड़ा रहा है. 1974 में कल्याण सिंह ने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर अतरौली से जीत दर्ज की थी.

आज भी अतरौली भाजपा की मजबूत सीटों में गिनी जाती है. 2017 और 2022 दोनों चुनावों में यहां से संदीप कुमार सिंह ने जीत दर्ज की. 2022 में उन्होंने सपा के वीरेश यादव को 39,324 वोटों से हराया.

2027 के लिहाज से अलीगढ़ का सियासी महत्व

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की दृष्टि से अलीगढ़ को पश्चिमी यूपी के अहम जिलों में शामिल किया जा सकता है. इसकी सात विधानसभा सीटों का गणित किसी भी दल के लिए महत्वपूर्ण है.

2012 में जहां जिले में भाजपा का प्रभाव सीमित दिखाई दिया, वहीं 2017 और 2022 में भाजपा ने सभी सात सीटों पर कब्जा किया. 2024 के खैर उपचुनाव में भी भाजपा ने सीट बरकरार रखी.

हालांकि आगामी चुनाव में पुराने नतीजे अपने आप दोहरेंगे, ऐसा मानना सही नहीं होगा. बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, विकास, शिक्षा, रोजगार, किसानों से जुड़े मुद्दे और स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता जैसे सवाल चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं.

अलीगढ़ का चुनावी इतिहास बताता है कि यह जिला स्थिर राजनीतिक वोट बैंक से ज्यादा बदलते चुनावी समीकरणों वाला क्षेत्र रहा है. 2012 में सपा और रालोद का प्रभाव दिखा, जबकि 2017 और 2022 में भाजपा ने जिले की सभी सात सीटों पर जीत हासिल कर अपना मजबूत आधार बनाया.

जिले की करीब 36.74 लाख की 2011 आबादी, लगभग 20% मुस्लिम आबादी, ग्रामीण-शहरी मिश्रण और सात विधानसभा सीटें इसे पश्चिमी यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण बनाती हैं. खासकर कोल जैसी करीबी सीट, अतरौली की राजनीतिक विरासत, खैर का जातीय-सामाजिक समीकरण और अलीगढ़ शहर की शहरी राजनीति आगामी विधानसभा चुनाव की तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

इसलिए यूपी चुनाव के बड़े मुकाबले को समझने के लिए अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों के नतीजों और स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा.

स्रोत: जिला अलीगढ़ प्रशासन, Census 2011, निर्वाचन संबंधी उपलब्ध आंकड़े और 2012/2017/2022 के विधानसभा परिणाम.

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