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‘तालानगरी’ के नाम से मिली पहचान? जानें अलीगढ़ जिले का चुनावी इतिहास

UP Elections 2027: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलीगढ़ जिले की अपनी खास अहमियत है. इसे एक तरफ जहां ‘तालानगरी’ के नाम से पहचान मिली है, वहीं दूसरी तरफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के कारण यह देश की शिक्षा और राजनीति के नक्शे पर भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है. जिले का राजनीतिक प्रभाव केवल अलीगढ़ शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी ग्रामीण और कस्बाई विधानसभा सीटें भी पश्चिमी यूपी के चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती हैं. 

7 विधानसभा सीटों का खेल

वर्तमान विधानसभा व्यवस्था के अनुसार अलीगढ़ जिले में 7 विधानसभा सीटें हैं. इनमें खैर, बरौली, अतरौली, छर्रा, कोल, अलीगढ़ और इगलास प्रमुख रूप से शामिल हैं. जिला प्रशासन की सूची में भी इन सातों सीटों को क्रमशः 71 से 77 तक दर्ज किया गया है. 

अलीगढ़ लोकसभा क्षेत्र में जिले की पांच विधानसभा सीटें खैर, बरौली, अतरौली, छर्रा और कोल आती हैं, जबकि अलीगढ़ और इगलास क्रमशः अन्य संसदीय क्षेत्रों का हिस्सा हैं. यही वजह है कि जिले का चुनावी गणित विधानसभा और लोकसभा दोनों स्तर पर महत्वपूर्ण हो जाता है.

अलीगढ़ क्यों है यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण?

अलीगढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्थित ऐसा जिला है जहां शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का मिश्रण देखने को मिलता है. यहां जाट, ठाकुर, ब्राह्मण, दलित, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम मतदाताओं की मौजूदगी चुनावी समीकरणों को बहुआयामी बनाती है.

जिले की पहचान शिक्षा, ताला उद्योग, कृषि और व्यापार से भी जुड़ी है. जिला प्रशासन के मुताबिक अलीगढ़ का क्षेत्रफल करीब 3,650 वर्ग किलोमीटर है और यह अलीगढ़ मंडल का मुख्यालय भी है.

अलीगढ़ का ऐतिहासिक नाम कोल या कोइल रहा है. जिला प्रशासन के इतिहास पृष्ठ के मुताबिक 18वीं सदी से पहले अलीगढ़ को मुख्य रूप से कोल/कोइल के नाम से जाना जाता था.

अलीगढ़ की आबादी कितनी है?

अलीगढ़ जिले की जनसंख्या के लिए नवीनतम पूर्ण आधिकारिक जनगणना आंकड़े 2011 Census के हैं. जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार उस समय अलीगढ़ की कुल आबादी 36,73,889 थी. इसमें 19,51,996 पुरुष और 17,21,893 महिलाएं थीं.

अलीगढ़ की आबादी

श्रेणी    -      आबादी

कुल आबादी -   36,73,889
पुरुष  -  19,51,996
महिलाएं  -  17,21,893
लिंगानुपात -   करीब 882 महिलाएं/1000 पुरुष
0-6 वर्ष की आबादी -   5,74,509
ग्रामीण आबादी -   24,56,698
शहरी आबादी -   12,17,191

2011 के आंकड़ों के मुताबिक जिले की करीब 66.87% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में और करीब 33.13% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती थी.

यहां एक महत्वपूर्ण बात यह है कि 2026 की वास्तविक आधिकारिक जनगणना-आधारित आबादी उपलब्ध नहीं है. इसलिए चुनावी विश्लेषण में 2011 Census को आधार बनाना अधिक विश्वसनीय है, जबकि वर्तमान आबादी के अनुमान को अलग से पेश किया जाना चाहिए.

अलीगढ़ की धार्मिक आबादी कितनी है?

अलीगढ़ जिले में हिंदू आबादी बहुसंख्यक है, जबकि मुस्लिम समुदाय जिले का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह है. 2011 Census के आधार पर धार्मिक संरचना इस प्रकार है.

 

Photograph: (Photo-AI)

 

इन आंकड़ों से साफ है कि जिले में हिंदू आबादी करीब चार-पांचवें हिस्से के बराबर है, जबकि मुस्लिम आबादी लगभग पांचवां हिस्सा है. हालांकि विधानसभा स्तर पर धार्मिक और सामाजिक संरचना जिले के औसत से काफी अलग हो सकती है, इसलिए पूरे जिले के आंकड़े को किसी एक सीट का सटीक वोट बैंक मानना उचित नहीं होगा.

अलीगढ़ की शिक्षा दर कितनी है?

2011 Census के अनुसार अलीगढ़ जिले की कुल साक्षरता दर 69.61% बताई जाती है. पुरुष साक्षरता करीब 80.24%, जबकि महिला साक्षरता करीब 57.48% है.

 

Photograph: (Photo - AI)

 

इस आंकड़े से पता चलता है कि जिले में पुरुष और महिला साक्षरता के बीच बड़ा अंतर मौजूद था. चुनावी दृष्टि से शिक्षा का स्तर महत्वपूर्ण है क्योंकि यह रोजगार, शहरीकरण, सरकारी योजनाओं और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों की प्राथमिकता को प्रभावित कर सकता है.

नोट: कुछ द्वितीयक स्रोत अलीगढ़ की साक्षरता के लिए अलग आंकड़े देते हैं, खासकर ग्रामीण-शहरी या अलग Census tables के आधार पर. ऊपर दिया गया 69.61%, पुरुष 80.24% और महिला 57.48% जिला-स्तरीय 2011 आंकड़ों पर आधारित है.

 

Photograph: (Photo -AI)

उत्तर प्रदेश विधानसभा की मौजूदा सदस्य सूची में भी खैर से सुरेंद्र दिलेर तथा अलीगढ़, कोल, अतरौली, छर्रा और बरौली से भाजपा के विधायक दर्ज हैं.

अलीगढ़ विधानसभा सीटों का चुनावी इतिहास

अलीगढ़ की राजनीति में पिछले कुछ चुनावों में भाजपा का दबदबा तेजी से बढ़ा है. 2017 में भाजपा ने जिले की सभी सात विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी.

2022 में भी भाजपा ने सातों सीटें अपने नाम कीं। यानी लगातार दो विधानसभा चुनावों में जिले की 7/7 सीटें भाजपा के खाते में गईं.

लेकिन इससे पहले 2012 का चुनाव पूरी तरह अलग तस्वीर दिखाता है. उस समय सातों सीटों में भाजपा का प्रदर्शन कमजोर था और सपा, रालोद तथा अन्य दलों ने कई सीटों पर जीत दर्ज की थी.

Photograph: (Photo - AI)

2022 में कैसे चला भाजपा का सिक्का?

2022 में अलीगढ़ जिले की सातों विधानसभा सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की. खास बात यह रही कि कुछ सीटों पर जीत का अंतर बहुत बड़ा था, जबकि कोल सीट पर मुकाबला काफी करीबी रहा.

कोल में भाजपा के अनिल पाराशर को 1,08,067 वोट मिले, जबकि सपा के शाज इशाक को 1,03,039 वोट मिले। जीत का अंतर सिर्फ 5,028 वोट रहा.

वहीं अलीगढ़ सदर सीट पर भाजपा की मुक्ता राजा ने सपा के जफर आलम को 12,786 वोटों से हराया. इगलास में भाजपा के राजकुमार सहयोगी ने रालोद के बीरपाल सिंह दिवाकर को 59,163 वोटों से मात दी.

बरौली में भाजपा के जयवीर सिंह की जीत का अंतर 90,645 वोट रहा, जबकि अतरौली में संदीप कुमार सिंह ने सपा के वीरेश यादव को 39,324 वोटों से हराया. छर्रा में रवींद्र पाल सिंह की जीत का अंतर 24,327 वोट रहा.

खैर सीट ने बदला समीकरण

अलीगढ़ जिले की खैर विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. 2022 में भाजपा के अनूप प्रधान वाल्मीकि यहां से विधायक बने थे. बाद में उनके लोकसभा चुनाव लड़ने के कारण सीट खाली हुई और 2024 में उपचुनाव कराया गया.

उपचुनाव में भाजपा ने सुरेंद्र दिलेर को मैदान में उतारा. उन्होंने सपा की चारू कैन को 38,393 वोटों से हराकर सीट भाजपा के पास बरकरार रखी. चुनाव में सुरेंद्र दिलेर को 1,00,181 और चारू कैन को 61,788 वोट मिले. इस जीत ने अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों में भाजपा के मौजूदा प्रभाव को और मजबूत किया. 

कोल सीट क्यों है खास?

अलीगढ़ की कोल विधानसभा सीट को जिले की महत्वपूर्ण शहरी सीटों में गिना जाता है. 2012 में यहां सपा के जमी़र उल्लाह खान ने जीत दर्ज की थी. 2017 में भाजपा के अनिल पाराशर ने बड़ी जीत हासिल की और 2022 में भी उन्होंने सीट बरकरार रखी. लेकिन 2022 में भाजपा और सपा के बीच अंतर केवल 5,028 वोट रहा. यही कारण है कि अलीगढ़ के आगामी विधानसभा चुनाव में कोल सीट पर मुकाबले को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है.

अतरौली और कल्याण सिंह की विरासत

अतरौली विधानसभा सीट का नाम भाजपा के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की राजनीतिक विरासत से भी जुड़ा रहा है. 1974 में कल्याण सिंह ने भारतीय जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर अतरौली से जीत दर्ज की थी.

आज भी अतरौली भाजपा की मजबूत सीटों में गिनी जाती है. 2017 और 2022 दोनों चुनावों में यहां से संदीप कुमार सिंह ने जीत दर्ज की. 2022 में उन्होंने सपा के वीरेश यादव को 39,324 वोटों से हराया.

2027 के लिहाज से अलीगढ़ का सियासी महत्व

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की दृष्टि से अलीगढ़ को पश्चिमी यूपी के अहम जिलों में शामिल किया जा सकता है. इसकी सात विधानसभा सीटों का गणित किसी भी दल के लिए महत्वपूर्ण है.

2012 में जहां जिले में भाजपा का प्रभाव सीमित दिखाई दिया, वहीं 2017 और 2022 में भाजपा ने सभी सात सीटों पर कब्जा किया. 2024 के खैर उपचुनाव में भी भाजपा ने सीट बरकरार रखी.

हालांकि आगामी चुनाव में पुराने नतीजे अपने आप दोहरेंगे, ऐसा मानना सही नहीं होगा. बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, विकास, शिक्षा, रोजगार, किसानों से जुड़े मुद्दे और स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता जैसे सवाल चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकते हैं.

अलीगढ़ का चुनावी इतिहास बताता है कि यह जिला स्थिर राजनीतिक वोट बैंक से ज्यादा बदलते चुनावी समीकरणों वाला क्षेत्र रहा है. 2012 में सपा और रालोद का प्रभाव दिखा, जबकि 2017 और 2022 में भाजपा ने जिले की सभी सात सीटों पर जीत हासिल कर अपना मजबूत आधार बनाया.

जिले की करीब 36.74 लाख की 2011 आबादी, लगभग 20% मुस्लिम आबादी, ग्रामीण-शहरी मिश्रण और सात विधानसभा सीटें इसे पश्चिमी यूपी की राजनीति में महत्वपूर्ण बनाती हैं. खासकर कोल जैसी करीबी सीट, अतरौली की राजनीतिक विरासत, खैर का जातीय-सामाजिक समीकरण और अलीगढ़ शहर की शहरी राजनीति आगामी विधानसभा चुनाव की तस्वीर तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं.

इसलिए यूपी चुनाव के बड़े मुकाबले को समझने के लिए अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों के नतीजों और स्थानीय सामाजिक समीकरणों पर नजर रखना बेहद जरूरी होगा.

स्रोत: जिला अलीगढ़ प्रशासन, Census 2011, निर्वाचन संबंधी उपलब्ध आंकड़े और 2012/2017/2022 के विधानसभा परिणाम.

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‘ईरान के साथ जारी युद्ध अमेरिका का संघर्ष युद्ध नहीं’, हजारों लोगों के मरने के बाद भी JD वेंस ने दिया अजीबो-गरीब बयान

अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष जारी है. दोनों देशों को युद्ध में प्रत्यक्ष रूप से शामिल हुए 6 महीने से अधिक हो गए हैं. अब तक 6 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध की वजह से न जाने कितने देश जल रहे हैं. इस युद्ध से वैैश्विक सप्लाई में भारी असर पड़ा है. इस बीच, अमेरिका के वाइस प्रेसिडेंट ने एक अजीब सा बयान दिया है. उनका कहना है कि ईरान के साथ जारी संघर्ष को युद्ध नहीं कहेंगे. खास बात है कि वेंस ने ऐसे वक्त पर यह बयान दिया है, जब ईरान और अमेरिका छह महीने से लगातार एक दूसरे के खिलाफ अटैक कर रहे हैं. बता दें, खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस संघर्ष को खत्म करना चाहते हैं क्योंकि इसकी वजह से उनकी सरकार को काफी परेशानी हो रही है.   

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मैं इसे युद्ध नहीं कहूंगा- वेंस 

दरअसल, गुरुवार को वेंस ने व्हाइट हाउस में एक प्रेस ब्रीफिंग को संबोधित किया था. इसमें उसने गुरुवार को सवाल किया गया कि क्या नवंबर में होने वाले अमेरिका के मध्यावधि चुनाव तक युद्ध खत्म हो जाएगा. इस पर वेंस ने कहा कि मैं इसे युद्ध नहीं बोलूंगा. अभी गोली थोड़ी चल रही है. वेंस ने कहा कि मैं मानता हूं कि कुछ जगहों पर स्थिति खराब हुई है लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका- इस्राइल और ईरान युद्ध शुरू होने के बाद बड़े स्तर की सैन्य लड़ाई शुरू हुई थी लेकिन वह सिर्फ कुछ सप्ताह तक ही चली थी. 

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शादी पर हमले की जांच कर रहा अमेरिका

इस बीच, ईरान ने गुरुवार को भी अमेरिका के खिलाफ हमले किए. ईरान ने कहा कि उसने कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया. ईरान ने यह हमला एक शादी समारोह में हुए हमले का बदला लेने के लिए किया. ईरान ने शादी पर हुए हमले के लिए अमेरिका को जिम्मेदार माना. वहीं, जेडी वेेंस ने कहा कि अमेरिका शादी पर हुए हमलों की जांच कर रहा है. 

वेंस ने कहा कि मुझे पता है कि हम इसकी जांच कर रहे हैं. हालांकि, मैं यह जरूर बोलूंगा कि ईरान का सरकारी मीडिया अब तक इस संघर्ष में हुए घटनाओं के बारे में भरोसेमंद जानकारी देने वाला नहीं रहा. मुझे इस वजह से इस दावे पर बहुत अधिक शक है.

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मंगलवार को अमेरिका ने शादी समारोह पर कर दिया था अटैक

बता दें, ईरान के रेड क्रिसेंट संगठन ने बताया था कि ईरान के तटीय शहर कुहैस्तक में मंगलवार देर रात एक शादी समारोह पर हुए मिसाइल पर हमला किया था. इसमें एक बच्चे सहित चार लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं, 50 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं.

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