Explainer: पीएम मोदी के विदेश दौरों में कैसे दिख रही भारत की कूटनीति, वैश्विक संकटों के बीच दुनिया मान रही हमारा लोहा
Explainer: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति का अहम चेहरा बन चुके हैं. इन यात्राओं को केवल द्विपक्षीय मुलाकातों या राजनयिक शिष्टाचार तक सीमित करके देखना आसान नहीं है. इनके पीछे व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, निवेश और वैश्विक रणनीतिक संतुलन से जुड़ी व्यापक सोच दिखाई देती है. बदलती विश्व व्यवस्था, अमेरिका की व्यापार नीति, रूस के साथ संबंधों और पश्चिम एशिया के तनाव के बीच भारत अपनी विदेश नीति को लगातार अधिक व्यावहारिक और बहुस्तरीय बनाने की कोशिश कर रहा है.
विदेश नीति में आया बड़ा बदलाव
भारत लंबे समय से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को विदेश नीति का महत्वपूर्ण आधार मानता रहा है. लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में इस नीति का स्वरूप और ज्यादा स्पष्ट नजर आ रहा है. भारत किसी एक ताकत या एक बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है.
अमेरिका के साथ रिश्ते भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ ही फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे, यूरोपीय संघ और अन्य साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों में अलग-अलग क्षेत्रों की प्राथमिकताएं एक साथ दिखाई देती हैं.
अमेरिका से रिश्तों के बीच भारत का संतुलन
अमेरिका और भारत के संबंधों में पिछले कुछ समय में व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों को लेकर तनाव देखने को मिला है. रूस से भारत के ऊर्जा संबंध भी अमेरिकी नीति के लिए चिंता का विषय रहे हैं.
ऐसे माहौल में भारत ने किसी एक धड़े के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की रणनीति अपनाई है. यही भारत की पारंपरिक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का आधुनिक रूप भी माना जा सकता है.
भारत अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीक में सहयोग जारी रखते हुए रूस के साथ ऊर्जा संबंध बनाए रखता है और यूरोप तथा एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ नए आर्थिक अवसर तलाशता है.
पीएम मोदी के विदेश दौरे सिर्फ फोटो-ऑप नहीं
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की एक खास बात यह है कि इनमें राजनीतिक मुलाकातों के साथ आर्थिक एजेंडा भी प्रमुखता से शामिल रहता है. रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा सुरक्षा, जहाज निर्माण और निवेश जैसे मुद्दे अब विदेश नीति की बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं.
इसका मकसद स्पष्ट है भारत के लिए पूंजी, तकनीक, बाजार और रणनीतिक सहयोग के नए रास्ते खोलना.
यानी विदेश नीति अब केवल सीमाओं और सुरक्षा तक सीमित नहीं है. यह सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और रोजगार से जुड़ती दिखाई दे रही है.
यूरोप के साथ बढ़ता आर्थिक जुड़ाव
भारत और यूरोपीय देशों के संबंधों में भी आर्थिक आयाम लगातार मजबूत हुआ है. जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों के साथ भारत रक्षा, तकनीक, एआई और उद्योग के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक संबंधों को विस्तार देने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है. भारत के लिए यूरोप बड़ा बाजार है, जबकि यूरोपीय देशों के लिए भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और विशाल उपभोक्ता बाजार वाला देश है. इसलिए दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ाना आने वाले वर्षों में विदेश नीति की बड़ी प्राथमिकता बन सकता है.
रक्षा तकनीक पर खास फोकस
बदलती वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों के बीच भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर भी जोर दे रहा है. प्रधानमंत्री के विदेश दौरों में रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन और सैन्य सहयोग से जुड़े समझौते अहम स्थान रखते हैं.
फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोग भारत को आधुनिक तकनीक तक पहुंच दिलाने के साथ घरेलू रक्षा उत्पादन को भी बढ़ावा दे सकता है.
भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश बनने के बजाय तकनीक हासिल करने, संयुक्त उत्पादन करने और भविष्य में रक्षा उपकरणों का निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है.
ऊर्जा सुरक्षा बनी विदेश नीति का बड़ा मुद्दा
भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है. रूस से तेल खरीद को लेकर पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता दी है.
भारत की कोशिश है कि ऊर्जा के लिए किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता न हो. रूस के अलावा पश्चिम एशिया, अमेरिका और अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ संबंध बनाए रखना इसी सोच का हिस्सा है.
वैश्विक युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के बीच सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
एआई और तकनीक में नई साझेदारियां
विदेश नीति का एक नया क्षेत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अत्याधुनिक तकनीक बन चुका है. भारत अब एआई को केवल डिजिटल क्षेत्र का विषय नहीं मानता, बल्कि इसे आर्थिक विकास, शिक्षा, रक्षा और प्रशासन से जोड़कर देख रहा है.
फ्रांस सहित कई तकनीकी रूप से मजबूत देशों के साथ भारत का सहयोग इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाली है.
भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के पास बड़ा डिजिटल बाजार और विशाल तकनीकी प्रतिभा मौजूद है.
युवाओं और रोजगार पर भी विदेश नीति का असर
प्रधानमंत्री के विदेश दौरों का एक महत्वपूर्ण पहलू युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाना भी है. विकसित देशों के साथ समझौतों में छात्रों, कुशल पेशेवरों और श्रमिकों की आवाजाही को आसान बनाने पर जोर दिया जा रहा है.
ऐसे समझौते भारतीय युवाओं के लिए विदेशों में पढ़ाई और रोजगार के अवसर बढ़ा सकते हैं. दूसरी तरफ इससे भारत को वैश्विक प्रतिभा नेटवर्क का हिस्सा बनने में मदद मिलती है. यानी विदेश नीति का असर अब सीधे युवा वर्ग के भविष्य से भी जुड़ रहा है.
जहाज निर्माण से लेकर क्रिटिकल मिनरल्स तक
भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षा अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़ रही है. जहाज निर्माण, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों में वैश्विक साझेदारी पर जोर दिया जा रहा है.
जहाज निर्माण को ही देखें तो भारत का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है. दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ सहयोग इस दिशा में तकनीक और विशेषज्ञता हासिल करने में मददगार हो सकता है.
क्रिटिकल मिनरल्स भी भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं. इनकी जरूरत इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा उपकरण और हरित ऊर्जा तकनीक में होती है.
भारत की पुरानी नीति का नया संस्करण
विशेषज्ञों की नजर में भारत की मौजूदा विदेश नीति पूरी तरह नई नहीं है. इसके मूल में वही रणनीतिक स्वायत्तता है, जिसके तहत भारत अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध रखता आया है.
अंतर सिर्फ इतना है कि अब इसका आर्थिक पक्ष काफी मजबूत हो गया है. भारत एक तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और एशिया के अन्य देशों के साथ भी संपर्क बनाए हुए है. यही संतुलन भारत को किसी एक वैश्विक शक्ति के दबाव से बचाने में मदद करता है.
क्यों महत्वपूर्ण हैं पीएम मोदी के विदेश दौरे?
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं को अगर केवल देशों की संख्या या नेताओं से मुलाकात के आधार पर देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. इन यात्राओं का असली महत्व उन समझौतों और रणनीतिक अवसरों में है, जो भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं.
व्यापार के नए बाजार, रक्षा तकनीक, ऊर्जा स्रोत, निवेश, एआई, रोजगार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला—इन सभी मोर्चों पर भारत अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
बदलती दुनिया में भारत की बढ़ती भूमिका
आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां पुराने गठबंधन और आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव और वैश्विक व्यापार में बढ़ता संरक्षणवाद देशों को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर रहा है.
ऐसे समय में भारत की कोशिश किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग साझेदारियों को आगे बढ़ाने की है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे इसी रणनीति का सार्वजनिक चेहरा हैं. भारत अब केवल वैश्विक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में अपनी जगह मजबूत करना चाहता है.
आने वाले वर्षों में भारत की कूटनीति की असली परीक्षा यही होगी कि इन विदेश यात्राओं और समझौतों को कितनी तेजी से निवेश, तकनीक, रोजगार, सुरक्षा और आर्थिक विकास के ठोस परिणामों में बदला जाता है. अगर यह रणनीति सफल होती है, तो प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक फैसलों में निर्णायक भूमिका निभाने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है.
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Explainer: 19 विकेट...एक मैच..., टेस्ट क्रिकेट का वो 'अजेय' रिकॉर्ड, जब जिम लेकर की उंगलियों पर नाचने लगी थी ऑस्ट्रेलियाई टीम
Test Records: आज के क्रिकेट की बात करें तो यह पूरी तरह से बदल चुका है. अब क्रिकेट पर टी20 हावी हो चुका है और टेस्ट क्रिकेट 3 या 4 दिन में ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि आज बल्लेबाजों पर टी20 का खुमार चढ़ा हुआ है. इसी के कारण वे टेस्ट क्रिकेट में भी पहली ही गेंद से आक्रामक बल्लेबाजी करते हैं और मैच को जल्दी खत्म करते हैं. आज के आधुनिक क्रिकेट में बल्लेबाज पहली गेंद से डिफेंस करना नहीं सोचते हैं, बल्कि वे बड़े-बड़े शॉट्स लगाने और रिवर्स स्वीप या रैंप शॉट खेलने से भी नहीं हिचकते हैं. आज के टेस्ट क्रिकेट में कोई गेंदबाज दोनों पारियों में मिलाकर 10 विकेट भी लेता है, तो उसे एक बड़ी और शानदार गेंदबाजी कहा जाता है; लेकिन क्रिकेट इतिहास के पन्नों में एक ऐसा जादुई रिकॉर्ड दर्ज है, जिसे तोड़ना लगभग नामुमकिन है. या यूं कहें तो विशेषज्ञों ने इसके टूटने की संभावना को सिर्फ 0.01% ही रखा है. टेस्ट क्रिकेट इतिहास की यह वो कहानी है, जब एक गेंदबाज ने अपनी उंगलियों के जादू से वर्ल्ड क्रिकेट को हैरान कर दिया था. हम बात कर रहे हैं इंग्लैंड के ऑफ-स्पिनर जिम लेकर की, जिन्होंने एक टेस्ट मैच में 19 विकेट लेने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था, जो आज भी कायम है. तो आइए, इस आर्टिकल में जानते हैं कि उन्होंने यह ऐतिहासिक रिकॉर्ड कब और किसके खिलाफ बनाया था.
जिम लेकर ने एक टेस्ट मैच में वो कारनामा किया, जिसे करना आज के क्रिकेट में नामुमकिन सा है. उन्होंने एक टेस्ट मैच में कुल 19 विकेट लेकर वो अटूट वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था, जिसे आज की तारीख में तोड़ना किसी चमत्कार से कम नहीं है. 70 साल बाद भी क्रिकेट जगत का सबसे अकल्पनीय रिकॉर्ड माना जाता है.
26 जुलाई 1956 को शुरू हुआ इंग्लैंड-ऑस्ट्रेलिया को वो ऐतिहासिक टेस्ट मैच
इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच यह मुकाबला मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान पर खेला जा रहा था. यह सीरीज का चौथा टेस्ट मैच था, जो दोनों टीमों के लिए काफी अहम था; क्योंकि सीरीज 1-1 की बराबरी पर थी. इस चौथे टेस्ट मैच में इंग्लैंड ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का फैसला किया. पीटर मे के शानदार शतक (101 रन) और डेविड शेफर्ड के 113 रनों की बदौलत इंग्लैंड ने अपनी पहली पारी में 452 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया. उस समय ऑस्ट्रेलियाई टीम में रिची बेनो, नील हार्वे और कीथ मिलर जैसे दिग्गज बल्लेबाज शामिल थे. ऐसे में इंग्लैंड के कप्तान पीटर मे को एक ऐसे गेंदबाज की जरुरत थी, जो ऑस्ट्रेलिया की इस खतरनाक बल्लेबाजी को ध्वस्त कर सके और रनों की गति पर अंकुश लगा सके. इंग्लैंड के लिए वो गेंदबाज जिम लेकर साबित हुए.
जिम लेकर वो चमत्कारी स्पेल जब फ्रीज ऑस्ट्रेलियाई टीम को गई नहस-नहस
जिम लेकर ने जब गेंद थामी, तो ऑस्ट्रेलियाई दिग्गज बल्लेबाजों को अंदाजा भी नहीं था कि कुछ ही घंटों में उनके साथ मैनचेस्टर के ओल्ड ट्रैफर्ड मैदान पर क्या होने वाला है. खुद इंग्लैंड की टीम ने भी नहीं सोचा होगा कि जिम लेकर वर्ल्ड क्रिकेट में एक नया इतिहास रचने जा रहे हैं. जब ऑस्ट्रेलियाई टीम बल्लेबाजी करने उतरी, तो पिच पर स्पिनरों को मदद मिलनी शुरू हो चुकी थी. जिम लेकर ने इसका पूरा फायदा उठाया. उन्होंने अपनी सटीक लाइन-लेंथ और फ्लाइट से कुछ ही घंटों में ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया. एक समय ऑस्ट्रेलिया का स्कोर बिना किसी नुकसान के 48 रन था, लेकिन इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने अपने आखिरी 10 विकेट सिर्फ 36 रन बनाने में ही गंवा दिए.
ऑस्ट्रेलिया के आखिरी 8 विकेट तो सिर्फ 22 रनों के अंदर और महज 35 मिनट के खेल में ही गिर गए थे. जिम लेकर ने पहली पारी में 16.4 ओवर में सिर्फ 37 रन देकर 9 विकेट चटकाए और ऑस्ट्रेलिया की पूरी टीम को महज 84 रनों पर समेट दिया. ऑस्ट्रेलिया के एकमात्र बल्लेबाज जिम बर्क का विकेट इंग्लैंड के दूसरे स्पिनर टोनी लॉक ने लिया था, जबकि बाकी के सभी 9 विकेट लेकर जिम लेकर ने कंगारू बल्लेबाजों को रुला दिया था. इस तरह इंग्लैंड ने ऑस्ट्रेलिया को फॉलोऑन खेलने के लिए मजबूर कर दिया.
जिम लेकर ने 19 विकेट लेकर ऑस्ट्रेलिया को रुलाया
फॉलोऑन खेलने उतरी ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी भी बेहद खराब रही, लेकिन नील हार्वे और कॉलिन काउड्री ने कुछ संघर्ष करने की कोशिश की; मगर जिम लेकर ने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों को रनों के लिए रुला दिया. जिम लेकर ने दूसरी पारी में और भी खतरनाक गेंदबाजी की. उन्होंने दूसरी पारी में 51.2 ओवर की मैराथन गेंदबाजी की और 53 रन देकर ऑस्ट्रेलिया के सभी 10 विकेट अपने नाम किए. वह टेस्ट इतिहास में एक पारी में सभी 10 विकेट लेने वाले दुनिया के पहले गेंदबाज बने. ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी 205 रनों पर सिमट गई और इंग्लैंड ने यह मैच एक पारी और 170 रनों से जीत लिया.
पिच का विवाद और जिम लेकर लेकर की महानता
इस मैच के बाद पिच को लेकर काफी चर्चाएं हुईं. ऑस्ट्रेलियाई मीडिया और विशेषज्ञों का मानना था कि ओल्ड ट्रैफर्ड की पिच को जानबूझकर स्पिनरों के मददगार बनाया गया था, जिसे 'टर्निंग डस्टबाउल' कहा गया. लेकिन इसी पिच पर इंग्लैंड के दूसरे महान स्पिनर टोनी लॉक भी गेंदबाजी कर रहे थे. लॉक ने पूरे मैच में 69 ओवर फेंके, लेकिन उन्हें सिर्फ 1 विकेट मिला. यह साबित करता है कि पिच भले ही मददगार थी, लेकिन 19 विकेट लेना जिम लेकर की महान गेंदबाजी का नतीजा था.
इस रिकॉर्ड का महत्व और आधुनिक क्रिकेट में मायने
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में जिम लेकर के बाद सिर्फ 2 ही गेंदबाज एक पारी में 10 विकेट लेने का कारनामा दोहरा पाए हैं. भारत के अनिल कुंबले ने साल 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ एक पारी में 10 विकेट लेने का कारनामा किया था, जबकि न्यूजीलैंड के एजाज पटेल ने साल 2021 में भारत के खिलाफ यह कमाल किया था. लेकिन टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में दोनों पारियों को मिलाकर आज भी 19 विकेट लेने का ऐतिहासिक कारनामा कोई दूसरा गेंदबाज नहीं कर पाया है. एक टेस्ट मैच में 19 विकेट लेने का रिकॉर्ड आज भी सिर्फ जिम लेकर के नाम ही दर्ज है. क्रिकेट विशेषज्ञों की माने तो इस रिकॉर्ड की टूटने की संभावना सिर्फ 0.01% है.
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