तिलक वर्मा ने उड़ाईं गेंदबाजों की धज्जियां, धमाकेदार अंदाज में दलीप ट्रॉफी के सेमीफाइनल में ठोका शतक
Tilak Varma Century : तिलक वर्मा ने दलीप ट्रॉफी 2026-27 के सेमीफाइनल में शतक ठोककर सभी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. साउथ जोन बनाम नॉर्थ जोन के बीच खेले जा रहे दूसरा सेमीफाइनल मुकाबले में तिलक के बल्ले से धमाकेदार अंदाज में शतक निकला है. इस पारी के दौरान तिलक वर्मा ने मैदान के चारों और शॉट लगाए और विरोधी गेंदबाजों की जमकर पिटाई कर डाली. उनकी इस पारी की बदौलत साउथ जोन की टीम पहली पारी में सम्मानजनक स्कोर तक पहुंच चुकी है.
तिलक वर्मा ने लगाई सेंचुरी
साउथ जोन की ओर से नॉर्थ जोन के खिलाफ तिलक वर्मा नंबर 4 पर बल्लेबाजी करने आए. उन्होंने एक कप्तानी पारी खेली और 129 बॉल में 100 रन बनाकर अपना शतक पूरा किया. तिलक ने अपनी इस पारी केदौरान कुल 4 चौके लगाए. ये बताता है कि उन्होंने इस पारी में कड़ी मेहनत की और आधे से ज्यादा रन विकेटों के बीच में दौड़ लगाकर बनाए. इस पारी के दौरान उनका स्ट्राइक रेट 47.11 का रहा है.
That moment when Tilak Varma got to his ???? ????
— BCCI Domestic (@BCCIdomestic) August 31, 2026
The South Zone captain leads from the front with a gritty century ????#DuleepTrophy pic.twitter.com/uSlM9xN6Vw
इससे पहले तिलक वर्मा ने अपना अर्धशतक 149 बॉल में पूरा किया. उन्होंने अपने 50 रन पूरे करने के दौरान अपनी इस पारी में कोई भी चौका नहीं लगाया. उन्होंने सभी 50 रन दौड़कर बनाए. दलीप ट्रॉफी 2026 के दूसरे सेमीफाइनल मैच के दूसरे दिन का खेल खत्म होने तक साउथ जोन ने तिलक वर्मा की पारी की बदौलत 94 ओवर में 9 विकेट पर 285 रन बना लिए हैं.
HUNDRED FOR CAPTAIN TILAK VERMA.????
— Tanuj (@ImTanujSingh) August 31, 2026
Tilak Varma smashed a brilliant Hundred in Semifinal Match of this Duleep Trophy in a tough situation for South Zone.
- What a magnificent Hundred by Captain Tilak Verma. ???? pic.twitter.com/WvQXzkePFF
साउथ जोन के कप्तान तिलक वर्मा दूसरे दिन का खेल समाप्त होने तक 225 बॉल में 7 चौकों की मदद से 106 रन बनाकर नाबाद बने हुए हैं. अब वो अपनी पारी को तीसरे दिन 106 रनों से आगे बढ़ाना चाहेंगे. इस मैच में तिलक ने शानदार कप्तानी भी दिखाई. उन्होंने नॉर्थ जोन की पहली पारी के दौरान शानदार कप्तानी की और विरोधी टीम को 195 रनों पर ढेर कर दिया.
तिलक की कप्तानी ने दिखाया कमाल
नॉर्थ जोन ने पहली पारी में 59.1 ओवर में 10 विकेट खोकर 195 रन बनाए. तिलक ने इस दौरान शानदार कप्तानी की और अपने गेंदबाज को लगातार रोटेट किया, जिसकी बदौलत टीम को नियमित अंतराल पर विकेट मिलते रहे. उनकी टीम के लिए विद्वाथ कवरप्पा ने सबसे ज्यादा 4 विकेट हासिल किए थे.
Gurnoor Brar with another top-of-off special ????
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वहीं नॉर्थ जोन के लिए सबसे ज्यादा रन कमरैन इकबाल ने बनाए. उन्होंने 182 बॉल में 10 चौके और 1 छक्के के साथ 76 रनों की पारी खेली. उनके अलावा कन्हैया वधावन 35 रनों का योगदान दिया. वहीं साउथ जोन के लिए तिलक वर्मा के अलावा अब तक नारायण जगदीशन ने 35 रनों की पारी खेली. वहीं श्रेयस गोपाल ने 169 बॉल में 11 चौकों की मदद से 87 रनों की अर्धशतकीय पारी खेली.
आपको बता दें कि, तिलक वर्मा भारतीय टी20 क्रिकेट टीम के उपकप्तान हैं. वो श्रेयस अय्यर के साथ मिलकर भारत की टी20 टीम को संभाल रहे हैं. उन्होंने भारत के लिए टी20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 59 मैचों की 56 पारियों में 1645 रन बनाए हैं. वो 2023 से लेकर अब तक 2 शतक और 9 अर्धशतक भी लगा चुके हैं.
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Explainer: पीएम मोदी के विदेश दौरों में कैसे दिख रही भारत की कूटनीति, वैश्विक संकटों के बीच दुनिया मान रही हमारा लोहा
Explainer: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे पिछले कुछ वर्षों में भारत की विदेश नीति का अहम चेहरा बन चुके हैं. इन यात्राओं को केवल द्विपक्षीय मुलाकातों या राजनयिक शिष्टाचार तक सीमित करके देखना आसान नहीं है. इनके पीछे व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, निवेश और वैश्विक रणनीतिक संतुलन से जुड़ी व्यापक सोच दिखाई देती है. बदलती विश्व व्यवस्था, अमेरिका की व्यापार नीति, रूस के साथ संबंधों और पश्चिम एशिया के तनाव के बीच भारत अपनी विदेश नीति को लगातार अधिक व्यावहारिक और बहुस्तरीय बनाने की कोशिश कर रहा है.
विदेश नीति में आया बड़ा बदलाव
भारत लंबे समय से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को विदेश नीति का महत्वपूर्ण आधार मानता रहा है. लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में इस नीति का स्वरूप और ज्यादा स्पष्ट नजर आ रहा है. भारत किसी एक ताकत या एक बाजार पर निर्भर रहने के बजाय अलग-अलग देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है.
अमेरिका के साथ रिश्ते भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ ही फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे, यूरोपीय संघ और अन्य साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरों में अलग-अलग क्षेत्रों की प्राथमिकताएं एक साथ दिखाई देती हैं.
अमेरिका से रिश्तों के बीच भारत का संतुलन
अमेरिका और भारत के संबंधों में पिछले कुछ समय में व्यापार और टैरिफ जैसे मुद्दों को लेकर तनाव देखने को मिला है. रूस से भारत के ऊर्जा संबंध भी अमेरिकी नीति के लिए चिंता का विषय रहे हैं.
ऐसे माहौल में भारत ने किसी एक धड़े के साथ पूरी तरह जुड़ने के बजाय अपने विकल्प खुले रखने की रणनीति अपनाई है. यही भारत की पारंपरिक ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ का आधुनिक रूप भी माना जा सकता है.
भारत अमेरिका के साथ रक्षा और तकनीक में सहयोग जारी रखते हुए रूस के साथ ऊर्जा संबंध बनाए रखता है और यूरोप तथा एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ नए आर्थिक अवसर तलाशता है.
पीएम मोदी के विदेश दौरे सिर्फ फोटो-ऑप नहीं
प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं की एक खास बात यह है कि इनमें राजनीतिक मुलाकातों के साथ आर्थिक एजेंडा भी प्रमुखता से शामिल रहता है. रक्षा तकनीक, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा सुरक्षा, जहाज निर्माण और निवेश जैसे मुद्दे अब विदेश नीति की बातचीत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं.
इसका मकसद स्पष्ट है भारत के लिए पूंजी, तकनीक, बाजार और रणनीतिक सहयोग के नए रास्ते खोलना.
यानी विदेश नीति अब केवल सीमाओं और सुरक्षा तक सीमित नहीं है. यह सीधे भारत की अर्थव्यवस्था और रोजगार से जुड़ती दिखाई दे रही है.
यूरोप के साथ बढ़ता आर्थिक जुड़ाव
भारत और यूरोपीय देशों के संबंधों में भी आर्थिक आयाम लगातार मजबूत हुआ है. जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों के साथ भारत रक्षा, तकनीक, एआई और उद्योग के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
यूरोपीय संघ के साथ व्यापारिक संबंधों को विस्तार देने की कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है. भारत के लिए यूरोप बड़ा बाजार है, जबकि यूरोपीय देशों के लिए भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और विशाल उपभोक्ता बाजार वाला देश है. इसलिए दोनों पक्षों के बीच व्यापार और निवेश बढ़ाना आने वाले वर्षों में विदेश नीति की बड़ी प्राथमिकता बन सकता है.
रक्षा तकनीक पर खास फोकस
बदलती वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों के बीच भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर भी जोर दे रहा है. प्रधानमंत्री के विदेश दौरों में रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन और सैन्य सहयोग से जुड़े समझौते अहम स्थान रखते हैं.
फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और अन्य देशों के साथ रक्षा सहयोग भारत को आधुनिक तकनीक तक पहुंच दिलाने के साथ घरेलू रक्षा उत्पादन को भी बढ़ावा दे सकता है.
भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश बनने के बजाय तकनीक हासिल करने, संयुक्त उत्पादन करने और भविष्य में रक्षा उपकरणों का निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है.
ऊर्जा सुरक्षा बनी विदेश नीति का बड़ा मुद्दा
भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण है. रूस से तेल खरीद को लेकर पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने अपने ऊर्जा हितों को प्राथमिकता दी है.
भारत की कोशिश है कि ऊर्जा के लिए किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता न हो. रूस के अलावा पश्चिम एशिया, अमेरिका और अन्य ऊर्जा उत्पादक देशों के साथ संबंध बनाए रखना इसी सोच का हिस्सा है.
वैश्विक युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के बीच सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति भारत की आर्थिक वृद्धि के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.
एआई और तकनीक में नई साझेदारियां
विदेश नीति का एक नया क्षेत्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अत्याधुनिक तकनीक बन चुका है. भारत अब एआई को केवल डिजिटल क्षेत्र का विषय नहीं मानता, बल्कि इसे आर्थिक विकास, शिक्षा, रक्षा और प्रशासन से जोड़कर देख रहा है.
फ्रांस सहित कई तकनीकी रूप से मजबूत देशों के साथ भारत का सहयोग इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में टेक्नोलॉजी डिप्लोमेसी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाली है.
भारत के लिए यह अवसर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के पास बड़ा डिजिटल बाजार और विशाल तकनीकी प्रतिभा मौजूद है.
युवाओं और रोजगार पर भी विदेश नीति का असर
प्रधानमंत्री के विदेश दौरों का एक महत्वपूर्ण पहलू युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाना भी है. विकसित देशों के साथ समझौतों में छात्रों, कुशल पेशेवरों और श्रमिकों की आवाजाही को आसान बनाने पर जोर दिया जा रहा है.
ऐसे समझौते भारतीय युवाओं के लिए विदेशों में पढ़ाई और रोजगार के अवसर बढ़ा सकते हैं. दूसरी तरफ इससे भारत को वैश्विक प्रतिभा नेटवर्क का हिस्सा बनने में मदद मिलती है. यानी विदेश नीति का असर अब सीधे युवा वर्ग के भविष्य से भी जुड़ रहा है.
जहाज निर्माण से लेकर क्रिटिकल मिनरल्स तक
भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षा अब पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़ रही है. जहाज निर्माण, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्रों में वैश्विक साझेदारी पर जोर दिया जा रहा है.
जहाज निर्माण को ही देखें तो भारत का लक्ष्य वैश्विक स्तर पर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना है. दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ सहयोग इस दिशा में तकनीक और विशेषज्ञता हासिल करने में मददगार हो सकता है.
क्रिटिकल मिनरल्स भी भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम हैं. इनकी जरूरत इलेक्ट्रॉनिक्स, बैटरी, रक्षा उपकरण और हरित ऊर्जा तकनीक में होती है.
भारत की पुरानी नीति का नया संस्करण
विशेषज्ञों की नजर में भारत की मौजूदा विदेश नीति पूरी तरह नई नहीं है. इसके मूल में वही रणनीतिक स्वायत्तता है, जिसके तहत भारत अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के साथ अपने हितों के अनुसार संबंध रखता आया है.
अंतर सिर्फ इतना है कि अब इसका आर्थिक पक्ष काफी मजबूत हो गया है. भारत एक तरफ अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ रूस और एशिया के अन्य देशों के साथ भी संपर्क बनाए हुए है. यही संतुलन भारत को किसी एक वैश्विक शक्ति के दबाव से बचाने में मदद करता है.
क्यों महत्वपूर्ण हैं पीएम मोदी के विदेश दौरे?
प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राओं को अगर केवल देशों की संख्या या नेताओं से मुलाकात के आधार पर देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी. इन यात्राओं का असली महत्व उन समझौतों और रणनीतिक अवसरों में है, जो भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं.
व्यापार के नए बाजार, रक्षा तकनीक, ऊर्जा स्रोत, निवेश, एआई, रोजगार और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला—इन सभी मोर्चों पर भारत अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है.
बदलती दुनिया में भारत की बढ़ती भूमिका
आज दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां पुराने गठबंधन और आर्थिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव और वैश्विक व्यापार में बढ़ता संरक्षणवाद देशों को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर कर रहा है.
ऐसे समय में भारत की कोशिश किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अलग-अलग साझेदारियों को आगे बढ़ाने की है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे इसी रणनीति का सार्वजनिक चेहरा हैं. भारत अब केवल वैश्विक घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली शक्ति के रूप में अपनी जगह मजबूत करना चाहता है.
आने वाले वर्षों में भारत की कूटनीति की असली परीक्षा यही होगी कि इन विदेश यात्राओं और समझौतों को कितनी तेजी से निवेश, तकनीक, रोजगार, सुरक्षा और आर्थिक विकास के ठोस परिणामों में बदला जाता है. अगर यह रणनीति सफल होती है, तो प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति भारत को केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक फैसलों में निर्णायक भूमिका निभाने वाली शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकती है.
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