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वैभव सूर्यवंशी ने सेमीफाइनल मैच में तोड़ा 57 साल पुराना रिकॉर्ड, इस मामले में बन गए नंबर-1 बल्लेबाज

Vaibhav Sooryavanshi Record: स्टार युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी मैदान पर उतरें और रिकॉर्ड न बनाएं... ऐसा भला हो सकता है. अब दलीप ट्रॉफी 2026 के सेमीफाइनल मैच में सेंट्रल जोन के खिलाफ 15 साल के इस युवा खिलाड़ी ने ताबड़तोड़ अंदाज में बल्लेबाजी करते हुए इतिहास रच दिया है. सेंट्रल जोन के खिलाफ अर्धशतक लगाते ही वैभव  दलीप ट्रॉफी में फिफ्टी लगाने वाले सबसे युवा खिलाड़ी बन गए हैं.

वैभव सूर्यवंशी ने 15 साल की उम्र में तोड़ा 57 साल पुराना रिकॉर्ड

15 साल के वैभव सूर्यवंशी ने दलीप ट्रॉफी 2026 के सेमीफाइनल मैच में शानदार बल्लेबाजी करते हुए 57 साल पुराना रिकॉर्ड धराशाही कर दिया है. वैभव दलीप ट्रॉफी के इतिहास में अब अर्धशतक लगाने वाले सबसे युवा बल्लेबाज बन गए हैं. 
वैभव ने 15 साल 157 दिन की उम्र में ये कारनामा किया. इससे पहले ये रिकॉर्ड लक्ष्मण सिंह के नाम था, जिन्होंने 1969 में 16 साल 23 दिन की उम्र में अर्धशतक जमाया था. यानी वैभव ने 57 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है.

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Explainer: BJP-SAD गठबंधन पर अटका पेंच? सीटों से लेकर CM फेस तक..., दोनों के सामने क्या चुनौतियां?

BJP-SAD Alliance: पंजाब की सियासत में एक बार फिर हलचल है. इस बार चर्चा का विषय है क्या भाजपा और शिरोमणि अकाली दल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर एक मंच पर आएंगे? दरअसल, पिछले कुछ हफ्तों से दोनों दलों के बीच नजदीकियां बढ़ती दिखाई दे रही हैं. मगर जिस मुद्दे पर बात हर बार अटक जाती है वह है सीटों का बंटवारा. आइए समझते हैं कि आखिर पूरा माजरा क्या है?

BJP-SAD दोनों दल फिर पास क्यों आ रहे हैं? 

पंजाब के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अकाली दल के प्रधान सुखबीर सिंह बादल ने हाल ही में दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी. इसके बाद अब उनकी एक और अहम बैठक भाजपा के पंजाब चुनाव प्रभारी सीआर पाटिल के साथ हुई है. जानकारी के मुताबिक यह मुलाकात काफी लंबी बताई जा रही है और इसे गठबंधन की दिशा में एक ठोस कदम माना जा रहा है. यहां बता दें कि पाटिल को हाल ही में पंजाब की चुनावी जिम्मेदारी सौंपी गई है और उनके आने के बाद से ही गठबंधन को लेकर सरगर्मी तेज हुई है.

20 साल साथ रहने के बाद BJP-SAD क्यों हुए थे अलग?

गौरतलब है कि अकाली दल और भाजपा करीब दो दशकों तक साथ रहे हैं. चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक 2007 से 2017 तक पंजाब में दोनों ने मिलकर सरकार भी चलाई थी. एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 में दोनों में उस समय मतभेद हुए जब केंद्र की बीजेपी सरकार ने तीन कृषि कानून पेश किए और इसके विरोध में अकाली दल ने एनडीए का साथ छोड़ दिया  बता दें तब से अकाली दल राज्य में लगातार कमजोर होती जा रही है और पंजाब में भाजपा ने अकेले दम पर अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश भी की है.

सीटों के बंटवारे पर पेंच क्यों फंसा है?

पंजाब मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य में दोनों पार्टियों के बीच पुराने गठबंधन में अकाली दल बड़े भाई की भूमिका में रहता था. विधानसभा की 117 में से भाजपा को महज 23 सीटें मिलती थीं, जबकि बाकी सीटों पर अकाली दल चुनाव लड़ता था. वहीं, लोकसभा की बात करें तो 13 सीटों में से भी भाजपा के हिस्से सिर्फ 3 सीटें आती थीं. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले चुनाव लड़ते हुए कई विधानसभा क्षेत्रों में अच्छी बढ़त हासिल की थी खासकर शहरी इलाकों में वह पार्टी का जनाधार बढ़ा है. इसी आधार पर पार्टी अब गठबंधन में ज्यादा सीटों और बड़े भाई की भूमिका की मांग कर रही है. उधर, दूसरी तरफ अकाली दल के लिए जिसकी पकड़ अब तक ग्रामीण और पंथक वोटरों पर मानी जाती रही है इतनी बड़ी छूट देना आसान नहीं है. पिछले विधानसभा चुनावों के बाद अब उसे अपनी साख बचाना मुश्किल हो रहा है.

बीजेपी ने नहीं खोले पत्ते, दोनों पार्टियों द्वारा बिझाई जा रही बिसात....

खबरों की मानें तो अकाली दल ने कुछ ग्रामीण सीटों पर अपने नेताओं को अभी से तैयारी न करने का इशारा दिया है जिसे संभावित सीट-बंटवारा फॉर्मूले से जोड़कर देखा जा रहा है. हालांकि भाजपा की ओर से आधिकारिक रुख अब भी यही है कि पार्टी सभी 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष अपने पंजाब दौरे में यह बात दोहरा भी चुके हैं.

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मुख्यमंत्री पद और नेतृत्व का सवाल 

पंजाब सूत्रों के मुताबिक BJP-SAD के बीच विधानसभा चुनाव 2027 में सीटों के अलावा एक और पेचीदा मसला है. वह है गठबंधन होने की सूरत में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री पद किसके पास रहेगा? सूत्रों के मुताबिक इस पर भी दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही है, लेकिन अभी कोई स्पष्ट फॉर्मूला सामने नहीं आया है. भाजपा अब खुद को पंजाब में सिर्फ जूनियर पार्टनर के तौर पर देखे जाने से बचना चाहती है जबकि अकाली दल के लिए नेतृत्व की भूमिका छोड़ना पार्टी की पहचान से जुड़ा सवाल बन गया है.

अकाली दल के भीतर बगावत भी बड़ी चुनौती

अकाली दल के सामने सिर्फ भाजपा से डील ही नहीं अपनी ही पार्टी के भीतर की टूट भी एक बड़ी चुनौती है. 2017 की करारी हार के बाद कुछ वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़कर अपने अलग गुट बना लिए थे. इन नेताओं ने हार का ठीकरा बादल परिवार पर फोड़ा था. अगर भाजपा के साथ गठबंधन होता है तो इन बागी नेताओं के साथ रिश्ता कैसा रहेगा यह भी अभी साफ नहीं है।

दोनों तरफ के कार्यकर्ता असमंजस में

गठबंधन की खबरों के बीच सबसे ज्यादा उलझन जमीनी कार्यकर्ताओं में देखी जा रही है. अकाली दल के कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे कि पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी या भाजपा के साथ जबकि भाजपा का बार-बार यह दोहराना कि वह सभी सीटों पर लड़ने की तैयारी में है. पार्टी के अंदर से ही यह आवाज उठ रही है कि गठबंधन की लगातार चर्चा से संगठन का अपना नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है. वहीं, अकाली दल के कुछ नेताओं ने खुलकर कहा है कि पंजाब के लोग दोनों पुराने सहयोगियों को फिर साथ देखना चाहते हैं और उन्होंने इस दौरान कांग्रेस पर भी निशाना साधा.

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सत्तारूढ़ AAP का पलटवार

इस पूरी कवायद पर मुख्यमंत्री भगवंत मान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने आरोप लगाया कि अकाली दल का नेतृत्व पंजाब को लूटने के लिए भाजपा के साथ हाथ मिलाने को बेताब है और पार्टी गठबंधन के लिए मानो गिड़गिड़ा रही है. जाहिर है अगर यह गठबंधन सिरे चढ़ता है तो सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों के लिए यह एक नई चुनौती बनकर उभर सकता है.जबकि आप और कांग्रेस दोनों पार्टियों के नेताओं ने पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अपनी-अपनी स्थिति को बेहद मजबूत बताया है.

FAQ

Q: भाजपा और अकाली दल ने गठबंधन कब तोड़ा था?
A: 2020 में केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में शिरोमणि अकाली दल ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) से नाता तोड़ लिया था.

Q: पुराने गठबंधन में सीटों का बंटवारा कैसा था?
A: विधानसभा की 117 सीटों में से भाजपा को करीब 23 सीटें मिलती थीं, बाकी पर अकाली दल चुनाव लड़ता था. लोकसभा की 13 सीटों में भाजपा के पास सिर्फ तीन सीटें होती थीं.

Q: क्या दोनों दलों ने आधिकारिक तौर पर गठबंधन का ऐलान कर दिया है?
A: नहीं, अभी तक किसी भी पार्टी की ओर से औपचारिक पुष्टि नहीं हुई है. बातचीत जारी होने की खबरें हैं, लेकिन अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर है.

Q: भाजपा ज्यादा सीटें क्यों मांग रही है?
A: 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ते हुए भाजपा ने कई विधानसभा क्षेत्रों, खासकर शहरी इलाकों में मजबूत बढ़त हासिल की थी. इसी बढ़े हुए जनाधार के आधार पर पार्टी अब बड़े भाई की भूमिका और अधिक सीटों की मांग कर रही है.

Q: यह गठबंधन कब तक तय हो सकता है?
A: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में होने हैं. ऐसे में उम्मीद है कि सीट-बंटवारे और नेतृत्व से जुड़े मसलों पर अगले कुछ महीनों में स्थिति साफ हो जाएगी.

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