‘2 दिन मौत को करीब से देखा, अब वहां प्रलय’:नेपाल से लौटे ओम बोले- जिस होटल में रुके, खाना खाया, वहां आज चारों तरफ मलबा
‘आधे रास्ते में ऊपर से पत्थर मेरे पास लुढ़कता आया। साथियों की सांसें थम गईं। वो तो महादेव की कृपा रही कि पत्थर त्रिशूली नदी में चला गया। पलभर में मैंने मौत की आवाज सुनी।’ नेपाल में रसुवागढ़ी में हुई भीषण तबाही के बाद इंदौर के ओम द्विवेदी ने अपनी आपबीती साझा की है। ओम हाल ही में कैलाश मानसरोवर यात्रा से लौटे हैं। हादसे से महज दो दिन पहले वह उसी रास्ते से गुजरे थे, जहां अब मलबा और पानी तबाही का मंजर दिखा रहा है। ओम ने बताया कि जिस रास्ते से उनका दल गुजरा था, जिस होटल में रात बिताई, जिस रेस्टोरेंट में खाना खाया और जिस इमिग्रेशन सेंटर पर जांच की प्रक्रिया पूरी कराई थी, हादसे के बाद वही जगहें मलबे और पानी में तब्दील हो गईं। हादसे की खबर सुनते ही उनके रोंगटे खड़े हो गए। पहले तस्वीरें देखिए… खतरा महसूस हुआ, लेकिन तबाही का अंदाजा नहीं था ओम ने कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान अपने साथियों के साथ खींची तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर साझा की हैं। इनमें दल के सदस्य यात्रा के दौरान अलग-अलग स्थानों पर नजर आ रहे हैं। ओम द्विवेदी के मुताबिक, 12 अगस्त को 20 भारतीय यात्रियों और 4 नेपाली सदस्यों का दल काठमांडू से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए रवाना हुआ था। शाम करीब 7 बजे दल रसुवागढ़ी पहुंचा। यहां नेपाली गाइड पेम्बा शेरपा ने यात्रियों को बताया कि आगे पहाड़ धंस रहे हैं और वाहनों का निकलना मुश्किल है। ओम ने बताया कि उस समय खतरा महसूस तो हुआ था, लेकिन स्थिति कितनी भयावह हो सकती है, इसका अंदाजा नहीं था। जगह-जगह से छोटे पत्थर गिर रहे थे और सड़क पर वाहनों की आवाजाही बंद थी। उन्होंने बताया कि यात्रियों को चिंता हुई, लेकिन यात्रा आगे बढ़ानी थी। दल गाड़ी से नीचे उतरा और पैदल उस हिस्से को पार कर बॉर्डर तक पहुंचा। अगले दिन दल ने नेपाल और चीन, दोनों तरफ इमिग्रेशन की प्रक्रिया पूरी की और तिब्बत की ओर रवाना हो गया। इसके बाद केरुंग और सागा होते हुए मानसरोवर पहुंचे। 52 किलोमीटर की परिक्रमा, 21 हजार फीट तक पहुंचे मानसरोवर पहुंचने के बाद दल ने स्नान और दर्शन किए। इसके बाद कैलाश की करीब 52 किलोमीटर लंबी परिक्रमा शुरू की। इस दौरान दल करीब साढ़े 21 हजार फीट की ऊंचाई तक पहुंचा। ओम ने बताया कि यात्रा के दौरान गौरीकुंड, राक्षस ताल और अष्टपद के दर्शन भी किए। उनके मुताबिक, 52 किलोमीटर की परिक्रमा हंसते-खेलते पूरी हो गई। हिमालय के शिखर पर करीब साढ़े 21 हजार फीट की ऊंचाई पर गौरीकुंड के दर्शन उनके लिए बेहद खास अनुभव था। लौटे तो वही रास्ता मौत का रास्ता बन चुका था ओम के मुताबिक, कैलाश की परिक्रमा पूरी करने के बाद दल केरुंग होते हुए वापस नेपाल के रसुवागढ़ी पहुंचा। यहां दो दिन पहले देखा इलाका अब पहचान में नहीं आ रहा था। जिस रास्ते पर जाते समय केवल छोटे-छोटे पत्थर गिरते दिखाई दिए थे। लौटते समय वहां बड़े-बड़े पहाड़ टूटकर गिर चुके थे। सड़क का एक हिस्सा नदी में समा चुका था और आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो गया था। गाइड पेम्बा शेरपा ने दल को चेतावनी दी कि इस इलाके में रुकना भी खतरे से खाली नहीं है। दो रास्ते थे- रुकें या जान जोखिम में डालकर निकलें ओम के मुताबिक, उस समय दल के सामने दो विकल्प थे। या तो जोखिम उठाकर खतरनाक इलाका पार किया जाए या वहीं रुककर हालात सामान्य होने का इंतजार किया जाए। पेम्बा ने यात्रियों से कहा कि या तो किसी तरह जान हथेली पर रखकर बाहर निकलें या फिर यहीं इंतजार करें। उन्हें डर था कि पहाड़ कभी भी गिर सकते हैं। अगर पूरा पहाड़ नीचे गिरा तो सभी लोग त्रिशूली नदी में जा सकते हैं। दल ने जोखिम उठाने का फैसला किया। यात्रियों ने खतरनाक रास्ते को पैदल पार किया और आगे खड़े वाहन तक पहुंचे। इसके बाद किसी तरह काठमांडू पहुंच सके। एक पत्थर ने पहले ही करा दिया था मौत का एहसास ओम के लिए रसुवागढ़ी का खतरा वापसी के समय ही सामने नहीं आया था। यात्रा के दौरान भी एक ऐसा पल आया, जिसे वह आज तक नहीं भूल पाए हैं। आधे रास्ते में ऊपर से एक बड़ा पत्थर उनकी तरफ लुढ़कता हुआ आया। उनके साथियों की सांसें थम गई थीं। ओम के मुताबिक, महादेव की कृपा रही कि वह पत्थर त्रिशूली नदी में चला गया। उनके लिए वह पल ऐसा था, जब उन्हें पहली बार लगा कि मौत कितनी करीब आ सकती है। ‘इसके महज दो दिन बाद उसी इलाके में हुई तबाही की खबर ने उस घटना को और भयावह बना दिया।’ ओम ने बताया कि हादसे की खबर उन्हें सुबह मिली। खबर सुनते ही उन्हें सबसे पहले वे जगहें याद आईं, जहां उनका दल ठहरा था और जिन जगहों से होकर गुजरा था। जिस होटल में वे रुके थे, जिस रेस्टोरेंट में खाना खाया था। जिस इमिग्रेशन सेंटर पर जांच कराई थी, वह पूरा इलाका अब पानी और मलबे में तब्दील हो चुका था। दो दिन पहले तक जहां यात्रियों की आवाजाही थी, स्थानीय लोग रोजमर्रा के काम में जुटे थे और दुकानों-रेस्टोरेंट में चहल-पहल थी, वहां अचानक आई तबाही ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। जिन नेपाली लोगों ने भोजन कराया, उनकी चिंता आज भी ओम कहते हैं कि हादसे की जानकारी मिलने के बाद उन्हें उन स्थानीय नेपाली लोगों की भी चिंता सताने लगी, जिन्होंने यात्रा के दौरान उनकी मदद की थी। यात्रा के दौरान जिन नेपाली लोगों ने उनका हालचाल पूछा, भोजन कराया और यात्रियों का सहयोग किया, उनकी याद उन्हें बार-बार आती रही। ओम का कहना है कि वे लोग तो किसी तरह सुरक्षित निकल आए, लेकिन वहां बहुत से लोग अपनी आस्था, विश्वास और सपने लेकर पहुंचे थे। कैलाश मानसरोवर की यह यात्रा अब ओम के लिए सिर्फ दर्शन और 52 किलोमीटर की परिक्रमा की याद नहीं रह गई है। रसुवागढ़ी में मौत को करीब से देखने और महज दो दिन बाद उसी रास्ते को जलप्रलय में बदलते देखने का अनुभव उनके जीवन की सबसे भयावह यादों में शामिल हो गया है।
HDFC Bank : पहले चेयरमैन ने कुर्सी छोड़ी और अब सीईओ भी लेने जा रहे रिटायरमेंट, एचडीएफसी बैंक में फिर मची हलचल
HDFC Bank MD-CEO: एचडीएफसी बैंक के एमडी और सीईओ ने अक्टूबर के बाद अपना कार्यकाल नहीं बढ़ाने का ऐलान कर दिया है. उन्होंने कहा है कि 26 अक्टूबर को उनका मौजूदा कार्यकाल समाप्त हो रहा है और इसके बाद वह दोबारा अपनी नियुक्ति का प्रयास नहीं करेंगे.
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