Responsive Scrollable Menu

Samsung Galaxy S26 Ultra की कीमत में ₹15,000 की भारी गिरावट, Raksha Bandhan Offer पर पाएं बंपर डिस्काउंट

क्या आप भी काफी समय स्मार्टफोन लेने का प्लान बना रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए है। यदि आप Samsung Galaxy S26 Ultra खरीदने की सोच रहे है, इससे अच्छा कोई मौका नहीं हो सकता है। दरअसल, कंपनी ने भारत में अपने फ्लैगशिप स्मार्टफोन के दो वेरिएंट की कीमत कम कर दी है। 
रक्षाबंधन त्योहार को लेकर कंपनी ने 15,000 रुपये की कटौती की है। वहीं, Flipkart पर उपब्ध बैंक ऑफर से ग्राहक और ज्यादा बचत कर सकते हैं।

Samsung Galaxy S26 Ultra की नई कीमत
इस बीच, सैमसंग ने Galaxy S26 Ultra के 12GB रैम के साथ 256GB और 512GB स्टोरेज वेरिएंट की कीमत में बदलाव किया है।

12GB+256GB मॉडल अब 1,24,999 रुपये में उपलब्ध है। वहीं, 12GB+ 512 GB वेरिएंट की कीमत घटकर 1,44,999 रुपये हो गई है। यानी दोनों मॉडल की कीमत पर सीधे 15,000 की कटौती की गई है।
 
Flipkart पर पाएं एडिशनल डिस्काउंट
Galaxy S26 Ultra खरीदने वालों को फ्लिपकार्ट पर कीमत में कटौती के अलावा बैंक ऑफर का भी लाभ देखने को मिलेगा। फ्लिपकार्ट एक्सिस बैंक और फ्लिपकार्ट एसबीआई क्रेडिट कार्ड से भुगतना करने पर 4000 रुपये का इंस्टेंट कैशबैंक दिया जाएगा।
वहीं, ग्राहक 15,000 रुपये की कीमत कटौती के साथ इस 4,000 रुपये कैशबैक का भी फायदा उठाने पर भी ग्राहक को फोन पर कुल 19,000 रुपये तक की बचत देखने को मिलेगी। इस हिसाब से 256GB मॉडल की प्रभावी कीमत 1,20,999 रुपये तक आ सकती है। लेकिन बैंक ऑफर की शर्तें लागू हो सकती हैं।

Galaxy S26 Ultra के दमदार फीचर्स
Galaxy S26 Ultra में प्रीमियम हार्डवेयर के साथ कई नए फीचर्स दिए है। फोन में 6.9 इंच का Dynamic AMOLED 2X डिस्प्ले है, जो 120Hz तक रिफ्रेश रेट सपोर्ट करता है। इस फोन की खास फीचर यही है कि नया Privacy Display फीचर भी शामिल है। इसकी मदद से स्क्रीन पर दिखाई देने वाली निजी जानकारी को आसापास बैठे लोगों की नजर से बचाने की मदद मिलती है।
इस फोन में 200MP का मेन कैमरा सेंसर दिया गया है। प्रीमियम डिजाइन, हाई-रिफ्रेश-रेट डिस्प्ले, दमदार प्रोसेसर और एडवांस कैमरा सिस्टम के कारण यह सैमसंग के सबसे महंगे फ्लैगशिप स्मार्ट में उपलब्ध है।

Continue reading on the app

हिमालय की 221 झीलें ला सकती हैं नैपाल जैसी तबाही:491 साल में 254 बार फट चुकीं; उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियर सबसे बड़ा खतरा

नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई अचानक बाढ़ ने एक बार फिर हिमालय में ग्लेशियरों से जुड़े खतरे की ओर ध्यान खींचा है। इसी बीच देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत 3 संस्थानों का नया अध्ययन सामने आया है। इसमें पूरे हिमालय रीजन में 221 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिनके फटने पर अचानक बाढ़ यानी GLOF का गंभीर खतरा हो सकता है। अध्ययन में कोसी, यारलुंग जांगबो, मानस और ऊपरी सिंधु नदी घाटियों को सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में रखा गया है। भारत में भी जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम की कई नदी घाटियां खतरे की जद में हैं। वहीं उत्तराखंड में खतरा सिर्फ ग्लेशियल झीलों से नहीं, बल्कि खड़ी ढलानों पर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियरों से भी है। अलकनंदा बेसिन में हुए एक दूसरे अध्ययन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं। इनके टूटने पर बर्फ के साथ चट्टान और मलबा तेजी से नीचे आ सकता है, जिससे बद्रीनाथ-माणा समेत निचले इलाकों को खतरा हो सकता है। 1990 के बाद बनीं 1,052 नई ग्लेशियल झीलें रिसर्च के मुताबिक हिमालय में अभी करीब 8,357 से 9,280 ग्लेशियल झीलें हैं। इनमें 1990 के बाद 1,052 नई झीलें बनी हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं, जिससे ऊंचाई वाले इलाकों में पानी जमा होने की नई जगहें बन रही हैं। इससे पुरानी झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। सिर्फ झीलों की संख्या ही नहीं बढ़ी है। अलग-अलग अध्ययनों में इनके क्षेत्रफल में 17%, 20%, 26% और 30% तक वृद्धि दर्ज की गई है। कुछ आकलनों में यह बढ़ोतरी 76% तक बताई गई है। सबसे तेज बढ़ोतरी 2010 से 2020 के बीच देखी गई। 4,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई वाले इलाकों में झीलों के क्षेत्रफल में वृद्धि सबसे ज्यादा रही। कोसी घाटी में 1,125 झीलें, इनमें 47 सबसे संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की संख्या के मामले में कोसी नदी घाटी सबसे आगे है। इसके अरुण क्षेत्र में 1,125 झीलें दर्ज की गई हैं। इसके बाद यारलुंग जांगबो में 773, मानस की दांगमे चू घाटी में 715 और ऊपरी सिंधु घाटी में 619 झीलें हैं। पूरे हिमालय में चिन्हित 221 महत्वपूर्ण झीलों में भी कोसी घाटी की 47 झीलें शामिल हैं, जो सबसे ज्यादा हैं। इसके बाद यारलुंग जांगबो और तीस्ता में 22-22, मानस में 21 और चिंगहाई-तिब्बती क्षेत्र में 15 महत्वपूर्ण झीलें हैं। भारत में चिनाब, झेलम, तीस्ता और व्यास ज्यादा संवेदनशील अध्ययन में जम्मू-कश्मीर की चिनाब और झेलम, हिमाचल प्रदेश की चिनाब और व्यास तथा सिक्किम की तीस्ता नदी घाटी को विशेष चिंता वाले क्षेत्र माना गया है। यहां खतरा सिर्फ झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ तक सीमित नहीं है। संभावित बाढ़ के रास्ते में सड़कें, पुल, आबादी और जलविद्युत परियोजनाएं भी हैं। यानी अचानक आने वाला पानी सिर्फ नदी के बहाव को नहीं बढ़ाएगा, बल्कि रास्ते में मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर को भी नुकसान पहुंचा सकता है। 491 साल में 254 बार फटीं ग्लेशियल झीलें रिसर्चर्स ने 1533 से 2024 तक यानी करीब 491 साल में हुई ग्लेशियल झील फटने की घटनाओं का रिकॉर्ड देखा। इस दौरान 254 GLOF घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें से 184 घटनाएं यानी 72.4% ऐसे इलाकों में हुईं, जिन्हें अध्ययन में ज्यादा या बेहद ज्यादा खतरे वाला माना गया था। इसके उलट कम खतरे वाले क्षेत्रों में सिर्फ 0.39% घटनाएं दर्ज हुईं। इन घटनाओं का सबसे ज्यादा संबंध पूर्वी और मध्य हिमालय के इलाकों से मिला। यहां ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ महत्वपूर्ण ग्लेशियल झीलों की संख्या भी ज्यादा है। उत्तराखंड के लिए क्यों अहम है यह अध्ययन? उत्तराखंड में खतरा सिर्फ ग्लेशियल झीलों से नहीं है। एक दूसरे अध्ययन में अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं। हैंगिंग ग्लेशियर ऐसे ग्लेशियर हैं जो बहुत ऊंची और खड़ी ढलानों पर टिके होते हैं। इनके नीचे गहरी घाटी या सीधी ढलान हो सकती है। अगर इनका कोई बड़ा हिस्सा टूटता है तो बर्फ के साथ पत्थर और मलबा भी तेज गति से नीचे आ सकता है। अलकनंदा बेसिन में कुल 848 ग्लेशियर हैं, जिनमें 219 को हैंगिंग ग्लेशियर माना गया है। इनका कुल क्षेत्रफल करीब 71.7 वर्ग किमी है। इनमें करीब 2.39 घन किमी बर्फ है, जिसमें करीब 0.74 घन किमी अस्थिर बर्फ मानी गई है। विष्णुगंगा में सबसे ज्यादा 69 हैंगिंग ग्लेशियर अलकनंदा की सहायक नदियों में विष्णुगंगा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 69 हैंगिंग ग्लेशियर मिले हैं। यह कुल संख्या का करीब 32% है। इनका क्षेत्रफल 28.21 वर्ग किमी है। गिरथीगंगा में संख्या कम है, लेकिन वहां मौजूद ग्लेशियरों में अस्थिर बर्फ का हिस्सा करीब 80% तक है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अस्थिर बर्फ का करीब 68% हिस्सा 0.1 से 0.5 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले ग्लेशियरों में है। यानी खतरा सिर्फ बड़े ग्लेशियरों से ही नहीं है, छोटे ग्लेशियर भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। बद्रीनाथ में 51 मीटर तक पहुंच सकती है बर्फ-मलबे की लहर रिसर्चर्स ने 25 ग्लेशियरों के आधार पर यह मॉडल तैयार किया कि अगर उनका पूरा अस्थिर हिस्सा एक साथ टूटकर नीचे आए तो स्थिति कैसी हो सकती है। यह सबसे खराब स्थिति का मॉडल है, आपदा की भविष्यवाणी नहीं। मॉडल के मुताबिक- बर्फ-मलबे का बहाव पहुंच सकता है। हनुमान चट्टी के सामने घाटी के ऊपरी हिस्से में यह ऊंचाई 118 मीटर तक मॉडल की गई है। बद्रीनाथ-माणा से सिर्फ 1.4 किमी ऊपर तीन ग्लेशियर बद्रीनाथ-माणा क्षेत्र के ऊपर तीन ग्लेशियरों की खास तौर पर पहचान की गई है। इनमें सबसे नजदीकी ग्लेशियर बस्तियों से करीब 1.4 किमी ऊपर है। तीनों में कुल अस्थिर बर्फ करीब 0.012 घन किमी है। इन ग्लेशियरों में कई दरारें भी देखी गई हैं। मॉडल के मुताबिक बद्रीनाथ, माणा, हनुमान चट्टी और घांघरिया संभावित असर वाले क्षेत्रों में आते हैं। नीलकंठ बेस कैंप की ओर जाने वाला क्षेत्र भी संभावित प्रभाव क्षेत्र में है। इसका मतलब यह नहीं है कि यहां आपदा आनी तय है। मॉडल सिर्फ यह बताता है कि बड़ी मात्रा में बर्फ टूटने की स्थिति में कौन से इलाके प्रभावित हो सकते हैं। खतरा बढ़ रहा है, लेकिन उसी रास्ते में निर्माण भी बढ़ा अध्ययन की एक और चिंता यह है कि जिन इलाकों में प्राकृतिक खतरा मौजूद है, वहां इंसानी गतिविधियां भी बढ़ रही हैं। 2000 से 2030 के बीच पूरे अलकनंदा बेसिन में निर्मित क्षेत्र में करीब 120% बढ़ोतरी का अनुमान है। आबादी में करीब 17% बढ़ोतरी का अनुमान है। संभावित बर्फीले बहाव के रास्ते वाले सैंपल क्षेत्र में निर्मित क्षेत्र 2000 के 8,025 वर्ग मीटर से बढ़कर 2030 में 1,51,800 वर्ग मीटर होने का अनुमान है। संभावित प्रभावित आबादी 380 से बढ़कर 8,540 हो सकती है। खतरे को पहले पहचानना ही सबसे बड़ा बचाव वैज्ञानिकों के मुताबिक सभी 219 हैंगिंग ग्लेशियरों को एक जैसा खतरनाक मानने की जरूरत नहीं है। पहले उन ग्लेशियरों की पहचान जरूरी है जहां खतरा ज्यादा है। इसके बाद उनकी लगातार निगरानी की जानी चाहिए। इसके लिए सैटेलाइट तस्वीरों के साथ जमीन पर लगे रडार, कैमरे, बर्फ के अंदर होने वाली हलचल की निगरानी और डॉप्लर रडार जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। खतरे के संकेत समय रहते मिलें तो सड़क बंद करने और लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। ------------------- यह भी पढ़ें भास्कर एक्सक्लूसिव : उत्तराखंड में 11% कम हुई बर्फ, तेजी से फैले शहर:जहां कंक्रीट वहां ज्यादा गर्मी, पानी-खेती से पर्यटन तक बढ़ी चुनौती उत्तराखंड को बर्फीली चोटियों, घने जंगलों और नदियों के राज्य के रूप में देखा जाता है, लेकिन पिछले 30 साल में इसकी जमीन की तस्वीर तेजी से बदली है। 1992 से 2022 के बीच बर्फ का क्षेत्र घटा, प्राकृतिक वनस्पति कम हुई और निर्मित क्षेत्र करीब 13 गुना बढ़ गया। इसी दौरान बारिश और तापमान के पैटर्न में भी बदलाव दिखाई दिया। (पढ़ें पूरी खबर)

Continue reading on the app

  Sports

Shubman Gill ने श्रीलंका के खिलाफ फॉलोऑन देने के फैसले का बचाव किया

भारतीय कप्तान शुभमन गिल ने कहा कि श्रीलंका के खिलाफ दूसरे टेस्ट में फॉलोऑन देने का फैसला ‘उल्टा’ नहीं पड़ा क्योंकि यह फैसला स्थानीय मौसम और टीम के हित को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। पहली पारी में श्रीलंका को 290 रन पर आउट करने के बाद भारत ने मेजबान टीम को दोबारा बल्लेबाजी के लिए बुलाने का फैसला किया। श्रीलंका फॉलोऑन बचाने के लिए जरूरी स्कोर से 13 रन पीछे रह गया था।

चौथे दिन का खेल खत्म होने तक भारत ने श्रीलंका का स्कोर छह विकेट पर 229 रन कर दिया था, इसलिए फैसला सही नजर आ रहा था। लेकिन मेजबान टीम ने पांचवें और आखिरी दिन पूरा दिन बल्लेबाजी करते हुए मैच ड्रॉ करा लिया। गिल ने बृहस्पतिवार को मैच के बाद प्रेस कांफ्रेंस में कहा, ‘‘मैं यह नहीं कहूंगा कि फॉलोऑन का फैसला उल्टा पड़ गया।

हम यह भी सोच रहे थे कि चौथे या पांचवें दिन मौसम कैसा रहेगा और बारिश की संभावना होगी या नहीं। हम उस जोखिम को लेना चाहते थे। ’’ उन्होंने कहा, ‘‘सवाल यह था कि क्या हमें चौथे दिन दोबारा बल्लेबाजी करनी चाहिए और 200 रन बनाकर उन्हें करीब 400 रन का लक्ष्य देना चाहिए, या फिर फॉलोऑन देना चाहिए?

इसे भी पढ़ें: ऋषभ पंत बने WTC के 'रन किंग', शुभमन गिल को पछाड़कर रचा इतिहास!

यही फैसला हमारे सामने था। ’’ गिल के मुताबिक, उस समय टीम की स्थिति और जरूरतों के हिसाब से फॉलोऑन देना उचित फैसला था। उन्होंने कहा, ‘‘अगर हमने फॉलोऑन नहीं दिया होता और बारिश हो जाती, तो आप पूछ सकते थे कि हमने फॉलोऑन क्यों नहीं दिया।

लेकिन आपको उस स्थिति में सर्वश्रेष्ठ संभव फैसला लेना होता है। इसलिए मुझे नहीं लगता कि फॉलोऑन का फैसला उल्टा पड़ा। ’’ गिल ने श्रीलंकाई बल्लेबाजों को भी उनके प्रदर्शन का श्रेय दिया।

इसे भी पढ़ें: Shubman Gill ने रचा इतिहास, Kapil Dev को पछाड़कर बने 3000 Test Runs बनाने वाले चौथे सबसे युवा भारतीय

उन्होंने कहा, ‘‘वे सचमुच बढ़िया खेले। कुछ चीजें हमारे पक्ष में नहीं गईं। भारत में या किसी भी टर्निंग पिच पर आमतौर पर बल्लेबाजों के आउट होने के तीन प्रमुख तरीके होते हैं, पीछे या स्लिप में कैच लपका जाना, पगबाधा और बोल्ड करना।

इस मैच में कई पगबाधा की अपीलें भारत के पक्ष में नहीं गईं जिसके कारण टीम को अपनी रणनीति बदलनी पड़ी। ’’ पर क्या यह ड्रॉ हार जैसा महसूस हो रहा है क्योंकि भारत ने पहले से चौथे दिन तक दबदबा बनाया था? भारत ने इस टेस्ट की अपनी एकमात्र पारी में 500 से ज्यादा रन बनाए थे।

इसके बाद श्रीलंका को पहली पारी में 290 रन पर आउट किया और दूसरी पारी में उसके शीर्ष क्रम के बल्लेबाजों को भी जल्दी पवेलियन भेज दिया। गिल ने कहा, ‘‘मैं यह नहीं कहूंगा कि यह हार जैसा महसूस हुआ। लेकिन निश्चित रूप से, जब आप पहली पारी में 500 रन बनाते हैं और दूसरी पारी में दो शुरुआती विकेट भी ले लेते हैं तो हमारे पास तीन दिनों में सिर्फ 18 विकेट लेने का काम रह जाता है।

इसे भी पढ़ें: IND vs SL: टीम इंडिया को बड़ा झटका, Kuldeep Yadav बाहर, सारांश जैन का 33 की उम्र में ऐतिहासिक Test Debut

आमतौर पर ऐसी स्थिति में आपको लगता है कि आप मैच जीत जाएंगे। ’’ उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए हम जिस स्थिति में थे, उसमें उन्होंने जिस तरह मैच ड्रॉ कराया, इसका श्रेय उन्हें जाता है। यह निश्चित रूप से निराशाजनक था।

हम जीत की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन हमें उनके जज्बे को भी श्रेय देना होगा। ’’ हालांकि दूसरा टेस्ट ड्रॉ रहा, लेकिन भारत ने सीरीज 1-0 से अपने नाम की।

Fri, 28 Aug 2026 09:22:26 +0530

  Videos
See all

Nepal Flood : कुदरत के कहर के बीच सिलेंडर की लूट! | Nepal Flash Flood | N18G | Top News | #tmktech #vivo #v29pro
2026-08-28T04:15:20+00:00

Weather Update : 8 राज्यों पर बारिश की चेतावनी! IMD ने जारी किया Heavy Rain Alert | Top News | #tmktech #vivo #v29pro
2026-08-28T04:30:13+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers