आज का पंचांग 22 अगस्त 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, राहुकाल, चौघड़िया, सूर्योदय-सूर्यास्त
आज की तिथि क्या है?: आज श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है, जो रात 11:00 बजे तक रहेगी। इसके बाद एकादशी तिथि शुरू हो जाएगी। यहां जानें ज्योतिषाचार्य डॉक्टर मनीष गौतम जी महाराज से आज के दिन का पंचांग, सूर्य, चंद्रमा की स्थिति और शुभ-अशुभ समय।
- वार: शनिवार
- नक्षत्र: ज्येष्ठा, दोपहर 02:41 बजे तक
- योग: विष्कंभ, 03:13 बजे तक
- करण: तैतिल, 12:48 बजे तक; इसके बाद गर, 2:00 बजे तक
शुभ मुहूर्त
- अभिजीत मुहूर्त: 11:54 AM-12:46 PM
- ब्रह्म मुहूर्त: लगभग 04:19 AM-05:07 AM
- अमृत काल: लगभग 07:25 AM-08:55 AM
- विजय मुहूर्त: लगभग 02:48 PM-03:40 PM
अशुभ समय
- राहुकाल: 09:07 AM-10:44 AM
- यमगण्ड: 01:56 PM-03:33 PM
- गुलिक काल: 05:55 AM-07:31 AM
- दुर्मुहूर्त: लगभग 07:35 AM-08:27 AM और 08:53 AM-09:45 AM
सूर्योदय और चंद्र समय
- सूर्योदय: 05:55 AM
- सूर्यास्त: 06:45 PM
- चंद्रोदय: 02:55 PM
- चंद्रास्त: 12:13 AM, 23 अगस्त
- चंद्र राशि: वृश्चिक
आज के व्रत
22 अगस्त को कोई प्रमुख सार्वदेशिक एकादशी या बड़ा व्रत नहीं है। श्रावण शुक्ल दशमी होने के कारण भगवान शिव की पूजा, जलाभिषेक और मंत्र-जप करना शुभ माना जाता है। अगले दिन 23 अगस्त को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत है।
आज का पर्व
आज 22 अगस्त को कोई प्रमुख अखिल भारतीय हिंदू पर्व नहीं है। श्रावण मास के कारण शिव-पूजन और सात्त्विक धार्मिक साधना के लिए दिन विशेष माना जा सकता है।
आज का धार्मिक महत्व
श्रावण शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि भगवान शिव की आराधना के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनिवार होने के कारण आज शनि देव की पूजा, पीपल के वृक्ष की सेवा तथा जरूरतमंदों को दान करने की धार्मिक परंपरा भी प्रचलित है। ज्येष्ठा नक्षत्र और वृश्चिक राशि में चंद्रमा होने से आज पूजा-पाठ, ध्यान, मंत्र-जप और आत्मचिंतन जैसे कार्य किए जा सकते हैं। शुभ कार्य के लिए मुहूर्त देखते समय राहुकाल, यमगण्ड और दुर्मुहूर्त से बचना उचित माना जाता है।
आज राहुकाल कब है?: आज राहुकाल सुबह 09:07 बजे से 10:44 बजे तक रहेगा। इस अवधि में शुभ कार्य शुरू करने से बचने की परंपरा है।
पूजा में कलश स्थापना क्यों मानी जाती है सबसे पहली रस्म? जानें इसका धार्मिक महत्व और सही विधि
Kalash sthapna mahatva: हिंदू धर्म में किसी भी पूजा-पाठ, हवन, गृह प्रवेश या मांगलिक कार्य की शुरुआत कलश स्थापना से करने की परंपरा अत्यंत प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि कलश स्थापना के बिना कोई भी धार्मिक अनुष्ठान अधूरा माना जाता है। यही कारण है कि नवरात्रि, गृह प्रवेश और विवाह जैसे बड़े आयोजनों में सबसे पहले कलश स्थापित करने की रस्म निभाई जाती है।
कलश को क्यों माना जाता है पवित्र?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, कलश को समस्त देवी-देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। मान्यता है कि कलश के मुख में भगवान विष्णु, कंठ में भगवान शिव और मूल भाग में भगवान ब्रह्मा का वास होता है। इसके अलावा कलश के भीतर भरे जल को समुद्र और नदियों का प्रतीक माना जाता है, जिस वजह से इसे संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया है।
कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश की उत्पत्ति हुई थी, इसी वजह से कलश को अमरता और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है।
कलश स्थापना में इस्तेमाल होती है यह सामग्री
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, कलश स्थापना के लिए तांबे, पीतल या मिट्टी के कलश का इस्तेमाल किया जाता है। कलश में शुद्ध जल भरकर उसमें आम या अशोक के पत्ते रखे जाते हैं, और कलश के ऊपर नारियल रखने की भी परंपरा है। इसके अलावा कलश में सुपारी, सिक्का और अक्षत डालना भी शुभ माना जाता है।
कलश स्थापना का सही समय और विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कलश स्थापना हमेशा शुभ मुहूर्त में और पूजा स्थान के उत्तर-पूर्व दिशा यानी ईशान कोण में करनी चाहिए। मान्यता है कि कलश स्थापित करने से पहले उस स्थान को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है, और फिर स्वस्तिक बनाकर उस पर कलश रखा जाता है। कलश स्थापना के समय "ॐ वरुणाय नमः" मंत्र का जाप करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है।
कलश स्थापना का धार्मिक महत्व
मान्यता है कि कलश स्थापना करने से पूजा स्थान पर देवी-देवताओं का आह्वान होता है और वहां का वातावरण पूरी तरह पवित्र हो जाता है। इसके अलावा यह भी कहा जाता है कि कलश स्थापना से घर में सुख-समृद्धि, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। यही कारण है कि नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना को सबसे महत्वपूर्ण रस्मों में गिना जाता है।
कलश विसर्जन से जुड़े नियम
धार्मिक परंपराओं में यह भी बताया गया है कि पूजा या अनुष्ठान संपन्न होने के बाद कलश के जल को पूरे घर में छिड़कना शुभ माना जाता है, क्योंकि इसे पवित्र और ऊर्जावान माना जाता है। कलश में रखे नारियल और अन्य सामग्री का इस्तेमाल भी प्रसाद के रूप में किया जाता है।
आज भी हर बड़े अनुष्ठान में होती है कलश स्थापना
समय के साथ भले ही पूजा-पाठ के तौर-तरीकों में कुछ बदलाव आया हो, लेकिन कलश स्थापना की यह परंपरा आज भी उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। चाहे घर की छोटी पूजा हो या मंदिर का बड़ा आयोजन, कलश स्थापना के बिना किसी भी धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत आज भी अधूरी मानी जाती है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है। किसी भी उपाय या धार्मिक कर्मकांड को अपनाने से पहले संबंधित विषय के विद्वान से सलाह अवश्य लें।
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