मनोज मुंतशिर बोले- श्रीकृष्ण थे दुनिया के पहले साइकोलॉजिस्ट:भगवद्गीता हर दुख का इलाज; राधा-कृष्ण के एक ना होने का कारण बताया
गीतकार और लेखक मनोज मुंतशिर का नाट्य शो ‘राधा से रणभूमि तक’ आज 22 और 23 अगस्त को इंदौर के लता मंगेशकर ऑडिटोरियम में मंचित होने जा रहा है। नीलम मुंतशिर और विक्रम मेहरा ने इस शो का निर्माण किया है। पुनीत जे। पाठक के निर्देशन में बने इस शो में श्रीकृष्ण की अनकही यात्रा को जीवंत किया गया है। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में मनोज मुंतशिर ने श्रीकृष्ण के मनोविज्ञान, 50 से अधिक किताबों के अध्ययन से जुड़ी 2 साल की लेखन यात्रा, राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम और आज की जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी के लिए श्रीकृष्ण के संदेशों पर खुलकर बात की। सवाल: ‘राधा से रणभूमि तक’ पहुंचते-पहुंचते कृष्ण में सबसे बड़ा बदलाव क्या पाते हैं? जवाब:कृष्ण में कुछ बदला ही नहीं। कृष्ण सदैव से ही पूर्ण थे प्रेम में भी, नीति में भी, युद्ध में भी और दर्शन में भी। जो पूर्ण हो वो बदलेगा कैसे? सवाल: दर्शक यह शो क्यों देखें? जवाब: हमारा शो किसी रेस में नहीं है। हम किसी से अच्छा या बेहतर बनने की कोशिश नहीं कर रहे। हम बस कृष्ण की एक ऐसी यात्रा आपके सामने रखना चाहते हैं, जो आपने इससे पहले किसी मंच, सिनेमा या टेलीविजन पर नहीं देखी होगी। शो में कुछ ऐसे पल हैं, जिनपर मैंने दर्शकों की हिचकियां सुनी हैं, उनका रोना सुना है, वहीं अनेक ऐसे पल भी हैं जहां लोग सीट्स से उठकर नाचते हैं। राधा-कृष्ण की अंतिम मुलाकात, गांधारी का श्राप, कृष्ण की मृत्यु, द्रौपदी का चीरहरण और जिस तरह हम गीता सार प्रस्तुत कर पाए। ये सभी क्षण अविस्मरणीय बन के उभरे हैं। और सबसे बड़ी बात, यह पूरे परिवार के लिए एक मनोरंजक और भावनात्मक अनुभव है। बच्चे इसे युद्ध के भव्य दृश्यों के लिए देख सकते हैं, बड़े इसके संगीत और वैभव के लिए और बुजुर्ग गीता सार के दौरान भावुक हुए बिना शायद रह ही नहीं पाएंगे। इस शो को लिखने के लिए मैंने 50 से अधिक किताबें पढ़ीं। श्रीमद्भागवत और हरिवंश पुराण सहित अनेक शास्त्रों और कृष्ण पर लिखे गए ग्रंथों का अध्ययन किया और दो साल से अधिक की लेखन यात्रा के बाद इसे आकार दिया। मैं आपसे सिर्फ एक बार यह शो देखने का आग्रह करता हूं। उसके बाद दर्शक खुद इसे सात-आठ बार देखने वापस आते हैं। मुंबई में हमें कई ऐसे लोग मिले जो लगातार आठवीं बार शो देखने आए थे। हमारे निर्माता श्री विक्रम मेहरा और नीलम मुंतशिर और निर्देशक पुनीत जे। पाठक ने मिलकर ऐसा शो तैयार किया है, जिसपर मुझे आकाश भर गर्व है। सवाल: प्ले के नाम में ही एक पूरी यात्रा है। आपके लिए कृष्ण क्या हैं प्रेमी, रणनीतिकार, दार्शनिक या योद्धा? जवाब: मेरे कृष्ण पूर्ण परमेश्वर हैं। वो मनुष्य योनि में जन्मे, इसलिए प्रेमी भी हैं, सखा भी, गुरु भी, बेटे भी और पिता भी। लेकिन मेरे लिए कृष्ण सबसे बड़े दार्शनिक योद्धा हैं, जो कहते हैं कि “वो शांति निंदनीय है जो युद्ध से घबराये और वो युद्ध वंदनीय है जो शांति के लिए लड़ा जाए”। सवाल: इस कहानी में आपकी सबसे बड़ी अनकही बात क्या है? जवाब:एक ऐसा प्रश्न है जो मुझे हमेशा व्यथित करता रहा। जब कृष्ण अपने अंतिम क्षणों में मृत्यु के सामने थे, तब उनके मन में क्या चल रहा था? भगवान क्या सोच रहे थे? हमने उसी अनकहे क्षण को समझने और महसूस करने की कोशिश की है। सवाल: कृष्ण की यात्रा में आपको सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाली घटना कौन-सी है? जवाब: कोई एक हो तो बताऊं। लेकिन दो बातें मुझे विशेष तौर पर प्रभावित करती हैं, युद्ध और शांति के बीच वो संतुलन जो कृष्ण बना पाये। आज की दुनिया यही संतुलन बना पाने में असफल हो रही है। और दूसरी बात, सफलता को सुख समझने की हमारी भूल। कृष्ण की जीवन यात्रा से आप समझेंगे की सफलता और सुख में अंतर है। एक बार कृष्ण की और लौटिए, सारे उत्तर मिल जाएंगे। सवाल: राधा और कृष्ण कभी एक क्यों नहीं हो पाए? जवाब: राधा और कृष्ण एक कैसे होते, जब दो थे ही नहीं! कृष्ण कभी राधा से दूर गए ही नहीं। वे सर से पांव तक स्वयं राधा बन गए थे। आज भी अगर आपको कृष्ण को बुलाना हो, तो राधा रानी का नाम लेना पड़ता है। ‘राधे-राधे बोले, चले आएंगे बिहारी।’ सवाल:कृष्ण का सबसे बड़ा हथियार क्या था बुद्धि, नीति या मनोविज्ञान? जवाब:कृष्ण का सबसे बड़ी सुपरपावर था मनोविज्ञान। कृष्ण दुनिया के सबसे पहले मनोवैज्ञानिक चिकित्सक थे। पश्चिम का ये दावा एकदम आधारहीन है कि मनोविज्ञान के जनक सिग्मंड फ्रायड थे। फ्रायड से 5000 पहले मनोविज्ञान का सबसे बड़ा शास्त्र अवतरित हो चुका था जिसे हम श्रीमद्भगवद्गीता कहते हैं। 700 श्लोकों का एक कैप्सूल है भगवद्गीता, जो संसार के हर दुख की दवा है। गीता को सहजता से समझना है तो एक बार राधा से रणभूमि तक देखिए, गीता का इस से भावुक रूप शायद आपने अब तक नहीं देखा होगा। सवाल:अगर कृष्ण स्वयं आपसे पूछें ‘मेरी कहानी लिखते समय मुझे कितना समझा?’ तो आप क्या कहेंगे? जवाब:मैं कृष्ण को समझने का दावा बिल्कुल नहीं करता। एक ही दावा है मेरा और वो अभिमान की हद तक है। मैं कृष्ण में विश्वास करता हूं, मैंने उनके हाथ पकड़ लिए हैं, वो जहां चाहे ले जाएं। मैं अपने सभी श्रोताओं और दर्शकों से एक ही आग्रह करता हूं। कृष्ण का हाथ पकड़ के चलिए, जीवन में कभी किसी के पांव पकड़ने की नौबत नहीं आएगी। सवाल:लेखक के तौर पर क्या डर लगा कि कहीं आस्था आड़े न आ जाए या कल्पना मर्यादा न लांघ जाए? जवाब: मैंने पहले खुद को कृष्ण के बारे में जितना संभव हो सका, उतना भरा और उसके बाद लिखना शुरू किया। 50 से अधिक किताबें पढ़ीं, कृष्ण पर लिखे गए ग्रंथ पढ़े, गीता पढ़ी और पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ इस यात्रा में उतरा। और जब हमारे साथ श्रीनाथजी का आशीर्वाद हो, तो फिर चिंता किस बात की? हमने पूरे देश में लगभग 30 हाउसफुल शो किए हैं और हर जगह से सिर्फ प्रशंसा ही सुनने को मिली। यह कृष्ण जी की ही कृपा है। अब 22 और 23 अगस्त को इंदौर के लता मंगेशकर ऑडिटोरियम में चार शो हैं। माँ अहिल्याबाई होलकर की यशस्वी संतानों से, अपने इंदौर के साथियों से मैं हाथ जोड़ के निवेदन कर रहा हूँ, एक बार आइए और कृष्ण को नए सिरे से अनुभव कीजिए। सवाल: राधा-कृष्ण की कहानी का कोई ऐसा पहलू है, जिसे सिनेमा ने अभी तक पूरी तरह नहीं छुआ? जवाब:मुझे लगता है कि हमारा पूरा शो ही ऐसा है। जिस तरह से हमने कृष्ण की कहानी को प्रस्तुत किया है, जिस दृष्टिकोण और जिस भाव के साथ इसे मंच पर उतारा है, वैसा प्रस्तुतीकरण इस देश में आज तक किसी माध्यम पर नहीं हुआ है। सवाल: इसी साल आई ‘कृष्णावतारम’ के प्रेजेंटेशन पर क्या कहेंगे, जिसे खूब सराहना मिली? जवाब:बिल्कुल, वह बहुत अच्छी फिल्म है। जनता ने उसे सराहा है और यही सबसे बड़ा अप्रूवल है। मैंने फ़िल्म अभी नहीं देखी है, लेकिन मेरे कई दोस्तों ने फ़िल्म देखी और इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। सवाल:आज की पीढ़ी रिश्तों, करियर और संघर्ष के बीच उलझी है। उन्हें कृष्ण से क्या सीखना चाहिए? जवाब:मैं Gen-Z से सिर्फ इतना कहना चाहूंगा— संघर्ष तो जीवन में होगा ही, लेकिन विश्वास रखिए, जिसने संघर्ष दिए हैं वही सफलता भी देगा। “नारायण तेरे साथ न होते, तो जग छूट गया होता कागज की नैया जैसा तू कब का डूब गया होता। कोई धरातल होगा जिसपर तेरे पाँव टिके होंगे। युद्ध लिखे है यदि जीवन में तो केशव भी लिखे होंगे।”
नीरज चोपड़ा लुसाने डायमंड लीग में दूसरे स्थान पर रहे:88.05 मीटर भाला फेंका, श्रीलंकाई रुमेश पथिरागे ने खिताब जीता
भारत के स्टार जेवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा लुसाने डायमंड लीग में दूसरे स्थान पर रहे। उन्होंने दूसरे प्रयास में 88.05 मीटर भाला फेंका। 28 साल के नीरज ने दूसरे प्रयास में पिछले एक साल का सबसे बेहतर थ्रो फेंका। यह उनके इस सीजन का भी सबसे अच्छा थ्रो रहा। लेकिन, वे श्रीलंका के रुमेश पथिराजे से सिर्फ 9 सेंटीमीटर पीछे रहे। पथिरागे ने 88.14 मीटर के साथ खिताब जीता। ग्रेनेडा के एंडरसन पीटर्स 86.69 मीटर के साथ तीसरे स्थान पर रहे। पथिरागे ने पिछले महीने ग्लासगो में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भी गोल्ड जीता था और नीरज को सिल्वर मेडल से संतोष करना पड़ा था। पथिराजे ने तीसरे राउंड में बढ़त बनाई 23 साल के रुमेश पथिराजे ने तीसरे राउंड में 88.14 मीटर का थ्रो किया। इस प्रदर्शन के साथ उन्होंने नीरज को पीछे छोड़कर पहला स्थान हासिल किया और खिताब जीता। पथिराजे इस सीजन लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। लुसान में उन्होंने नौ खिलाड़ियों के स्टार खिलाड़ियों से सजे मुकाबले में पहला स्थान हासिल किया। नीरज का डायमंड लीग में दूसरा बेस्ट थ्रो नीरज का 88.05 मीटर का थ्रो जून 2025 में पेरिस डायमंड लीग जीतने के दौरान किए गए 88.16 मीटर के प्रदर्शन के बाद सबसे अच्छा रहा। हालांकि, वे ज्यूरिख में आयोजित डायमंड लीग फाइनल में दूसरे स्थान रहे थे। ------------------------------------------- जेवलिन थ्रो से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… जेवलिन थ्रोअर शिवपाल सिंह पर 10 साल का बैन; दूसरी बार डोपिंग टेस्ट में फेल भारत के जेवलिन थ्रोअर और टोक्यो ओलिंपियन शिवपाल सिंह पर 10 साल का बैन लगाया गया है। वे दूसरी बार डोपिंग का दोषी पाए गए है। पढ़ें पूरी खबर
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