क्या दिल्ली में कोई भी, कहीं भी धरने पर बैठ सकता है? पहले PM हाउस, अब DCP ऑफिस के बाहर राहुल गांधी का धरना; जानिए नियम
क्या दिल्ली में कोई किसी भी सार्वजनिक जगह पर रैली, मार्च या धरने पर बैठक सकता है. राहुल गांधी के एक बार फिर धरने पर बैठने से ये सवाल उठे हैं. राहुल की इस बार धरने पर बैठने जगह है पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने का DCP ऑफिस. वह इससे पहले पीएम हाउस के पास धरने पर बैठे थे.
दिल्ली पुलिस प्रवक्ता के अनुसार राजधानी में धरना करने से पहले दिल्ली पुलिस से लिखित इजाजत लेना अनिवार्य है. बिना अनुमति का कोई भी प्रदर्शन गैर-कानूनी माना जाता है.
आवेदन कहां और कैसे देना होता है
- संबंधित इलाके के DCP या नई दिल्ली डिस्ट्रिक्ट पुलिस दफ्तर में आवेदन देना पड़ता है.
- आम तौर पर यह आवेदन प्रदर्शन की तय तारीख से करीब 7 से 10 दिन पहले देना होता है.
- फॉर्म दिल्ली पुलिस की वेबसाइट या स्थानीय थाने से मिल जाता है.
- आयोजकों को अपने वालंटियर्स की पूरी सूची भी पुलिस को सौंपनी होती है, ताकि भीड़ प्रबंधन आसान रहे.
आज क्या हुआ, राहुल गांधी कहां धरने पर बैठे?
जानकारी के मुताबिक शुक्रवार को राहुल गांधी पहले मंदिर मार्ग थाने पहुंचे. यहां उन्होंने बीते 20 जुलाई की छात्र-रैली में कथित तौर पर पैलेट गन से घायल हुए सहिल लोचव केस में शिकायत दर्ज कराने की कोशिश की. बता दें इस दौरान साहिल लोचव उनके साथ थे. उनकी शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज करने से इनकार कर दिया. फिर इसके बाद वे DCP सेंट्रल से मिलने पहुंचे. उनसे मुलाकात के बाद वह उनके कमरे से बाहर निकले और फिर अपने समर्थकों के साथ पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने के बाहर धरने पर बैठ गए. बता दें इससे पहले वह 21-22 जुलाई को वह बहन प्रियंका गांधी और कई विपक्षी नेता प्रधानमंत्री आवास के करीब जाकर धरने पर बैठ गए थे.
पुलिस ने दिया ये जवाब, उठे सवाल दिल्ली में धरना देने का कानूनी तरीका क्या है?
राहुल गांधी की मांग है पैलेट गन इस्तेमाल मामले में FIR दर्ज की जाए. वहीं, दिल्ली पुलिस का इस मामले में कहना है कि राहुल गांधी की शिकायत ले ली गई है. उनकी शिकायत क्राइम ब्रांच को सौंपी गई है. जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी. अब सवाल उठ रहे हैं कि दिल्ली में धरना देने का कानूनी तरीका क्या है?
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3 लाख से ज्यादा ‘लखपति दीदी’ बनीं उत्तराखंड की महिलाएं, CM धामी बोले- ये आत्मनिर्भरता की पहचान
Lakhpati Didi Uttarakhand: उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण को लेकर राज्य सरकार की योजनाओं और प्रयासों का असर अब ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दिखाई देने लगा है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि प्रदेश की मातृशक्ति आज पहले से अधिक सशक्त, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनकर राज्य के विकास में अहम भूमिका निभा रही है. उन्होंने कहा कि प्रदेश की जनता के एक वोट की ताकत से आज महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव आया है.
मुख्यमंत्री के मुताबिक, उत्तराखंड में 3 लाख से अधिक महिलाएं ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं. उन्होंने इसे सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि प्रदेश की महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास, मेहनत और आर्थिक मजबूती की पहचान बताया. उनका कहना है कि महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता से न केवल उनके परिवार मजबूत हो रहे हैं, बल्कि पूरे प्रदेश की अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिल रही है.
आर्थिक रूप से मजबूत हो रही महिलाएं
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में महिलाओं की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण रही है. खेती-बाड़ी से लेकर पशुपालन, स्वरोजगार और घरेलू जिम्मेदारियों तक महिलाएं परिवार की आर्थिक व्यवस्था में योगदान देती रही हैं. अब सरकारी योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उनके पारंपरिक काम को आय के स्थायी साधनों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
लखपति दीदी पहल के जरिए महिलाओं को स्वरोजगार और छोटे कारोबार के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं स्थानीय उत्पादों, कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य गतिविधियों के जरिए अपनी आमदनी बढ़ा रही हैं. इससे महिलाओं को घर की जरूरतों में योगदान देने के साथ-साथ अपने फैसले खुद लेने का आत्मविश्वास भी मिल रहा है.
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पहाड़ की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की बड़ी भूमिका
उत्तराखंड में बड़ी संख्या में परिवार ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में रहते हैं. ऐसे में स्थानीय स्तर पर रोजगार और आय के अवसर बढ़ाना राज्य के लिए अहम चुनौती है. महिला स्वयं सहायता समूह इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. छोटे स्तर पर शुरू किए गए कारोबार अब कई महिलाओं के लिए नियमित आमदनी का जरिया बन रहे हैं.
मुख्यमंत्री धामी का कहना है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना केवल परिवार की आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है. जब महिला के पास अपनी आमदनी होती है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह परिवार तथा समाज के महत्वपूर्ण फैसलों में भी अधिक मजबूती से अपनी बात रख पाती है.
एक वोट से बदलाव का संदेश
मुख्यमंत्री ने अपने बयान में लोकतांत्रिक भागीदारी को महिला सशक्तिकरण से जोड़ते हुए कहा कि यह बदलाव जनता के एक वोट की ताकत का परिणाम है. उनका संदेश है कि लोकतंत्र में मतदाताओं का फैसला सरकार की प्राथमिकताओं और नीतियों की दिशा तय करता है. उन्होंने कहा कि आज उत्तराखंड की मातृशक्ति आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है और प्रदेश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित कर रही है. 3 लाख से अधिक महिलाओं का लखपति दीदी बनना इस बदलाव का एक बड़ा उदाहरण है.
आत्मनिर्भरता से मजबूत होगा उत्तराखंड
महिलाओं की बढ़ती आर्थिक भागीदारी को उत्तराखंड के समग्र विकास से भी जोड़कर देखा जा रहा है. यदि गांवों में महिलाओं को रोजगार और स्वरोजगार के बेहतर अवसर मिलते हैं तो स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो सकती है. इससे पलायन की चुनौती से निपटने में भी मदद मिल सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ सकती हैं. महिलाओं की आय बढ़ने का सीधा असर परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवन स्तर पर भी पड़ सकता है. यही वजह है कि महिला स्वयं सहायता समूहों और स्वरोजगार से जुड़ी योजनाओं को ग्रामीण विकास की अहम कड़ी माना जा रहा है.
महिला सशक्तिकरण उत्तराखंड के विकास मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा
मुख्यमंत्री धामी के बयान से साफ है कि राज्य सरकार महिला सशक्तिकरण को उत्तराखंड के विकास मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रही है. 3 लाख से अधिक ‘लखपति दीदी’ का आंकड़ा इस दिशा में एक बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश किया जा रहा है. आने वाले समय में महिलाओं को और अधिक रोजगार, स्वरोजगार और बाजार से जोड़ने पर जोर दिया जाता है तो उत्तराखंड की मातृशक्ति प्रदेश की अर्थव्यवस्था को और मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.
आज उत्तराखंड की महिलाएं केवल परिवार की जिम्मेदारियां संभालने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उद्यमी, उत्पादक और आर्थिक निर्णय लेने वाली मजबूत भागीदार के रूप में भी अपनी पहचान बना रही हैं. यही बदलाव उत्तराखंड के आत्मनिर्भर और विकसित भविष्य की मजबूत नींव बन सकता है.
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