पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक इमरान खान को शुक्रवार तड़के इस्लामाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल 'शिफा इंटरनेशनल' ले जाया गया, लेकिन कुछ ही घंटों बाद उन्हें दोबारा रावलपिंडी की अदियाला जेल वापस भेज दिया गया। 73 वर्षीय पूर्व क्रिकेटर की सेहत को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही थी, जिसके बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल लाया गया था। यह घटनाक्रम तब हुआ जब पाकिस्तानी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) दायर की। इसमें कोर्ट से उस आदेश पर फिर से विचार करने का आग्रह किया गया था, जिसके तहत उन्हें इलाज के लिए प्राइवेट अस्पताल भेजने को कहा गया था।
क्रिकेटर से राजनेता बने 73 वर्षीय इमरान खान, जो पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक हैं, को अदियाला जेल से शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले जाया गया था। PTI के प्रवक्ता ज़ुल्फ़ी बुखारी ने AFP से बात करते हुए इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया गया है।"
खान, जो 2018 से 2022 तक प्रधानमंत्री रहे, अपनी सरकार और पाकिस्तानी सेना के बीच तनाव के दौरान अविश्वास प्रस्ताव के बाद सत्ता से हटा दिए गए थे। बाद में, भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी पाए जाने पर उन्हें और उनकी पत्नी बुशरा बीबी को 17 साल की जेल की सज़ा सुनाई गई थी।
2023 से खान अदियाला जेल में हैं और उनकी सेहत को लेकर बार-बार चिंता जताई जाती रही है। उनकी पार्टी का आरोप है कि उन पर लगाए गए आरोप झूठे और राजनीतिक रूप से प्रेरित हैं। पार्टी का कहना है कि उनकी सेहत खराब है।
कई अपुष्ट खबरों में यह भी दावा किया गया था कि जेल में खान की मौत हो गई है, लेकिन शुक्रवार के घटनाक्रम ने उनके समर्थकों को राहत दी है। बाद में वे उनके समर्थन में नारे लगाने के लिए शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल के बाहर जमा हुए।
खान की पार्टी PTI के समर्थक 52 वर्षीय बिलाल ने PTI से कहा, "मिस्टर खान के साथ हमारा प्यार और जुड़ाव बना रहेगा।"
इस बीच, पाकिस्तानी सरकार ने देश की शीर्ष अदालत में एक रिव्यू पिटीशन दायर की है। सरकार का कहना है कि कोर्ट को उस आदेश में बदलाव करना चाहिए जो मंगलवार को जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री को इलाज के लिए प्राइवेट अस्पताल भेजने के लिए दिया गया था।
राजनीतिक मामलों में प्रधानमंत्री के सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने कहा है कि खान को दी गई राहत कानून के मुताबिक नहीं है। समाचार एजेंसी PTI ने उनके हवाले से कहा, "सरकार ने फिर से एक रिव्यू पिटीशन दायर की है।" हालांकि, PTI ने, जिसने बार-बार खान की जान को खतरा होने का दावा किया है, कहा है कि सरकार को अपनी रिव्यू पिटीशन वापस लेनी चाहिए। PTI के सेक्रेटरी जनरल सलमान अकरम राजा ने कहा, "18 अगस्त के SC के आदेश का पालन न करने का कोई बहाना नहीं हो सकता। इमरान खान साहब को तुरंत शिफा इंटरनेशनल हॉस्पिटल में शिफ्ट किया जाना चाहिए।"
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पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जरा सी राहत क्या दी, पाकिस्तान की सरकार और सेना पूरी तरह हिल गई। दरअसल, पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख असीम मुनीर को पता है कि इमरान खान की ताकत बढ़ी और वह सत्ता में लौटे तो मुनीर की खैर नहीं होगी। इसलिए पाकिस्तान सरकार ने एकाएक फैसला लेते हुए मुनीर की ताकत में बड़ा इजाफा कर दिया और एक तरह से उन्हें अघोषित तानाशाह घोषित कर दिया। इससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि मुनीर को लग रहा है कि शहबाज शरीफ अब ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे इसलिए वह धीरे-धीरे औपचारिक रूप से सारा नियंत्रण अपने हाथ में लेते जा रहे हैं।
हम आपको बता दें कि पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने गुरुवार को Defence Forces of Pakistan Act, 2026 और National Command Authority Act, 2010 में संशोधन को मंजूरी दे दी। इन कानूनों के बाद फील्ड मार्शल असीम मुनीर, जो सेना प्रमुख होने के साथ-साथ पाकिस्तान के पहले Chief of Defence Forces (CDF) भी हैं, उनको सेना, नौसेना और वायुसेना के संचालन तथा सैन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के कॅरियर पर फैसला करने के असाधारण अधिकार मिल गए हैं।
नए कानून के तहत असीम मुनीर किसी भी सैन्यकर्मी को रिटायर कर सकते हैं, सेवा से मुक्त कर सकते हैं, उसका इस्तीफा स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं, उसे सेवा में बनाए रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उसकी सेवानिवृत्ति की उम्र या सेवा अवधि की सीमा में भी ढील दे सकते हैं। यानी पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था में किसका कॅरियर आगे बढ़ेगा और किसका खत्म होगा, इस पर मुनीर का प्रभाव बेहद व्यापक हो गया है।
यह बदलाव केवल अधिकारियों की नियुक्ति और सेवानिवृत्ति तक सीमित नहीं है। नए ढांचे के तहत CDF को पाकिस्तान की तीनों सेनाओं यानि आर्मी, नेवी और एयर फोर्स से जुड़े संयुक्त, रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में समन्वय, निगरानी और संचालन का अधिकार दिया गया है। पाकिस्तान की सैन्य संरचना को अब एकीकृत कमान के तहत लाने की कोशिश की जा रही है, जिसके शीर्ष पर स्वयं असीम मुनीर बैठ गए हैं।
दरअसल, यह पूरी कवायद पिछले वर्ष किए गए 27वें संवैधानिक संशोधन से शुरू हुई थी। इस संशोधन ने पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे Chairman, Joint Chiefs of Staff Committee के पद को समाप्त कर दिया और उसकी जगह Chief of Defence Forces का पद बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि CDF का पद सेना प्रमुख के पास ही रहेगा। यानी असीम मुनीर के हाथ में पहले से मौजूद पाकिस्तानी सेना की कमान के साथ अब तीनों सेनाओं की संयुक्त रणनीतिक व्यवस्था का भी नियंत्रण आ गया है।
नए कानून के तहत Defence Forces Headquarters को पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं का केंद्रीय मुख्यालय बनाया गया है। यही ढांचा राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और सैन्य मामलों में प्रधानमंत्री का प्रमुख सैन्य सलाहकार भी होगा। पहले यह भूमिका Joint Chiefs of Staff Committee के प्रमुख से जुड़ी थी, लेकिन अब यह केंद्र सीधे CDF के नेतृत्व में आ गया है। इससे शहबाज शरीफ सरकार के सामने एक ऐसी सैन्य शक्ति उभर रही है, जो न केवल ऑपरेशन नियंत्रित करती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के निर्माण में भी केंद्रीय भूमिका निभाती है।
इसके साथ ही मामला पाकिस्तान की परमाणु और रणनीतिक कमान तक भी पहुंचता है। 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद Commander of National Strategic Command का नया पद बनाया गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जुलाई में लेफ्टिनेंट जनरल आमेर रजा को चार सितारा जनरल बनाकर इस पद पर नियुक्त किया। लेकिन इस नियुक्ति में भी CDF की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति CDF की सिफारिश पर कर सकते हैं और नियुक्ति अथवा कार्यकाल विस्तार को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
सबसे दिलचस्प और विवादास्पद पहलू यह है कि इन कानूनों को प्रभावी करने की तारीखें भी पीछे की रखी गई हैं। Defence Forces Act को 13 नवंबर 2025 से और National Command Authority में संशोधनों को 27 नवंबर से प्रभावी माना गया है, जबकि संसद ने इन्हें 20 अगस्त 2026 को मंजूरी दी। यानी पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सैन्य पुनर्गठन को पहले से लागू मानते हुए बाद में कानूनी जामा पहनाया गया।
विपक्ष ने भी इस तरीके पर सवाल उठाए। बिल नेशनल असेंबली के तय एजेंडे में नहीं थे और विपक्ष के वॉकआउट तथा सहयोगी दल PPP की आपत्तियों के बीच इन्हें पेश किया गया। हालांकि बिलावल भुट्टो जरदारी की ओर से प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बावजूद अंततः उनकी पार्टी ने विधेयकों के पक्ष में मतदान किया।
देखा जाये तो पाकिस्तान की असलियत यही है कि निर्वाचित सरकारें वास्तविक सत्ता का केवल चेहरा होती हैं और असली नियंत्रण सेना के पास रहता है। लेकिन असीम मुनीर को मिले नए कानूनी अधिकार इस व्यवस्था को एक नए स्तर पर ले जाते दिख रहे हैं। अब उनके पास सेना की कमान, तीनों सेनाओं के संयुक्त संचालन पर प्रभाव, अधिकारियों और कर्मियों के भविष्य पर व्यापक अधिकार, प्रधानमंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार की भूमिका और रणनीतिक कमान के पुनर्गठन में निर्णायक स्थान है।
बहरहाल, ऐसे समय में जब इमरान खान की राजनीतिक ताकत को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान के बीच चिंता दिखाई दे रही है, तब असीम मुनीर की शक्तियों का यह अभूतपूर्व विस्तार सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं माना जा सकता। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान में शहबाज शरीफ की सरकार अब वास्तविक सत्ता केंद्र है, या फिर यह नई कानूनी संरचना उस व्यवस्था को औपचारिक रूप दे रही है जिसमें अंतिम नियंत्रण धीरे-धीरे फील्ड मार्शल असीम मुनीर के हाथों में सिमटता जा रहा है?
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