पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जरा सी राहत क्या दी, पाकिस्तान की सरकार और सेना पूरी तरह हिल गई। दरअसल, पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार और सेना प्रमुख असीम मुनीर को पता है कि इमरान खान की ताकत बढ़ी और वह सत्ता में लौटे तो मुनीर की खैर नहीं होगी। इसलिए पाकिस्तान सरकार ने एकाएक फैसला लेते हुए मुनीर की ताकत में बड़ा इजाफा कर दिया और एक तरह से उन्हें अघोषित तानाशाह घोषित कर दिया। इससे यह भी संकेत मिल रहे हैं कि मुनीर को लग रहा है कि शहबाज शरीफ अब ज्यादा कुछ नहीं कर पाएंगे इसलिए वह धीरे-धीरे औपचारिक रूप से सारा नियंत्रण अपने हाथ में लेते जा रहे हैं।
हम आपको बता दें कि पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने गुरुवार को Defence Forces of Pakistan Act, 2026 और National Command Authority Act, 2010 में संशोधन को मंजूरी दे दी। इन कानूनों के बाद फील्ड मार्शल असीम मुनीर, जो सेना प्रमुख होने के साथ-साथ पाकिस्तान के पहले Chief of Defence Forces (CDF) भी हैं, उनको सेना, नौसेना और वायुसेना के संचालन तथा सैन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के कॅरियर पर फैसला करने के असाधारण अधिकार मिल गए हैं।
नए कानून के तहत असीम मुनीर किसी भी सैन्यकर्मी को रिटायर कर सकते हैं, सेवा से मुक्त कर सकते हैं, उसका इस्तीफा स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं, उसे सेवा में बनाए रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उसकी सेवानिवृत्ति की उम्र या सेवा अवधि की सीमा में भी ढील दे सकते हैं। यानी पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था में किसका कॅरियर आगे बढ़ेगा और किसका खत्म होगा, इस पर मुनीर का प्रभाव बेहद व्यापक हो गया है।
यह बदलाव केवल अधिकारियों की नियुक्ति और सेवानिवृत्ति तक सीमित नहीं है। नए ढांचे के तहत CDF को पाकिस्तान की तीनों सेनाओं यानि आर्मी, नेवी और एयर फोर्स से जुड़े संयुक्त, रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में समन्वय, निगरानी और संचालन का अधिकार दिया गया है। पाकिस्तान की सैन्य संरचना को अब एकीकृत कमान के तहत लाने की कोशिश की जा रही है, जिसके शीर्ष पर स्वयं असीम मुनीर बैठ गए हैं।
दरअसल, यह पूरी कवायद पिछले वर्ष किए गए 27वें संवैधानिक संशोधन से शुरू हुई थी। इस संशोधन ने पाकिस्तान के लंबे समय से चले आ रहे Chairman, Joint Chiefs of Staff Committee के पद को समाप्त कर दिया और उसकी जगह Chief of Defence Forces का पद बनाया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि CDF का पद सेना प्रमुख के पास ही रहेगा। यानी असीम मुनीर के हाथ में पहले से मौजूद पाकिस्तानी सेना की कमान के साथ अब तीनों सेनाओं की संयुक्त रणनीतिक व्यवस्था का भी नियंत्रण आ गया है।
नए कानून के तहत Defence Forces Headquarters को पाकिस्तान की सशस्त्र सेनाओं का केंद्रीय मुख्यालय बनाया गया है। यही ढांचा राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और सैन्य मामलों में प्रधानमंत्री का प्रमुख सैन्य सलाहकार भी होगा। पहले यह भूमिका Joint Chiefs of Staff Committee के प्रमुख से जुड़ी थी, लेकिन अब यह केंद्र सीधे CDF के नेतृत्व में आ गया है। इससे शहबाज शरीफ सरकार के सामने एक ऐसी सैन्य शक्ति उभर रही है, जो न केवल ऑपरेशन नियंत्रित करती है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के निर्माण में भी केंद्रीय भूमिका निभाती है।
इसके साथ ही मामला पाकिस्तान की परमाणु और रणनीतिक कमान तक भी पहुंचता है। 27वें संवैधानिक संशोधन के बाद Commander of National Strategic Command का नया पद बनाया गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जुलाई में लेफ्टिनेंट जनरल आमेर रजा को चार सितारा जनरल बनाकर इस पद पर नियुक्त किया। लेकिन इस नियुक्ति में भी CDF की भूमिका महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति CDF की सिफारिश पर कर सकते हैं और नियुक्ति अथवा कार्यकाल विस्तार को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
सबसे दिलचस्प और विवादास्पद पहलू यह है कि इन कानूनों को प्रभावी करने की तारीखें भी पीछे की रखी गई हैं। Defence Forces Act को 13 नवंबर 2025 से और National Command Authority में संशोधनों को 27 नवंबर से प्रभावी माना गया है, जबकि संसद ने इन्हें 20 अगस्त 2026 को मंजूरी दी। यानी पाकिस्तान की सत्ता व्यवस्था में सैन्य पुनर्गठन को पहले से लागू मानते हुए बाद में कानूनी जामा पहनाया गया।
विपक्ष ने भी इस तरीके पर सवाल उठाए। बिल नेशनल असेंबली के तय एजेंडे में नहीं थे और विपक्ष के वॉकआउट तथा सहयोगी दल PPP की आपत्तियों के बीच इन्हें पेश किया गया। हालांकि बिलावल भुट्टो जरदारी की ओर से प्रक्रिया पर सवाल उठाने के बावजूद अंततः उनकी पार्टी ने विधेयकों के पक्ष में मतदान किया।
देखा जाये तो पाकिस्तान की असलियत यही है कि निर्वाचित सरकारें वास्तविक सत्ता का केवल चेहरा होती हैं और असली नियंत्रण सेना के पास रहता है। लेकिन असीम मुनीर को मिले नए कानूनी अधिकार इस व्यवस्था को एक नए स्तर पर ले जाते दिख रहे हैं। अब उनके पास सेना की कमान, तीनों सेनाओं के संयुक्त संचालन पर प्रभाव, अधिकारियों और कर्मियों के भविष्य पर व्यापक अधिकार, प्रधानमंत्री के प्रमुख सैन्य सलाहकार की भूमिका और रणनीतिक कमान के पुनर्गठन में निर्णायक स्थान है।
बहरहाल, ऐसे समय में जब इमरान खान की राजनीतिक ताकत को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान के बीच चिंता दिखाई दे रही है, तब असीम मुनीर की शक्तियों का यह अभूतपूर्व विस्तार सिर्फ प्रशासनिक सुधार नहीं माना जा सकता। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान में शहबाज शरीफ की सरकार अब वास्तविक सत्ता केंद्र है, या फिर यह नई कानूनी संरचना उस व्यवस्था को औपचारिक रूप दे रही है जिसमें अंतिम नियंत्रण धीरे-धीरे फील्ड मार्शल असीम मुनीर के हाथों में सिमटता जा रहा है?
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खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव की आग में एक बार फिर भारतीय नाविक झुलसते नजर आ रहे हैं। इस बेहद रणनीतिक और संवेदनशील समुद्री रास्ते पर मर्चेंट शिप्स (व्यापारिक जहाजों) को निशाना बनाए जाने से भारतीय नाविकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया है। ईरान के साथ चल रहे तनाव के बीच, समुद्र में काम करने वाले भारतीय नाविकों के लिए खतरा एक बार फिर तब सामने आया जब 'फॉरवर्ड सीमेन यूनियन ऑफ इंडिया' (FSUI) ने एक वीडियो जारी किया। इसमें 22 क्रू सदस्यों (जिनमें 21 भारतीय थे) वाले जहाज के साथ 22 अप्रैल को होर्मुज जलडमरूमध्य में हुई "तनावपूर्ण झड़प" को दिखाया गया है।
यूनियन ने 'X' पर एक पोस्ट में कहा कि जहाज पर ईरान के 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) की नावों का दबाव था। FSUI के अनुसार, वीडियो में कई छोटी नावें जहाज को घेरे हुए दिख रही हैं, एक RPG दागा जा रहा है और क्रू सदस्य जहाज के अंदर छिपने की कोशिश कर रहे हैं।
यूनियन ने कहा, "ये समुद्री लुटेरे नहीं थे। ये IRGC की नौसेना बल थे।" उन्होंने तर्क दिया कि संघर्ष वाले इलाके में काम करने वाले आम नागरिकों (क्रू) की सुरक्षा के लिए केवल सलाह और सुरक्षा दिशानिर्देश ही काफी नहीं हैं।
यह घटना समुद्री टकरावों की बढ़ती घटनाओं में से एक है, जो ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से हो रही हैं। इनमें भारतीय नाविक बार-बार खतरे में पड़ रहे हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य में टकराव के बीच फंसे भारतीय
22 अप्रैल को ईरान ने कहा कि उसकी सेना ने होर्मुज जलडमरूमध्य में दो कमर्शियल जहाजों को कब्जे में ले लिया है। भारत के 'पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय' ने बताया कि उस दिन ईरानी सेना द्वारा जिन तीन विदेशी झंडे वाले जहाजों पर गोलीबारी की गई थी, उनमें से दो पर 22 भारतीय नाविक सवार थे। साथ ही, ईरानी हिरासत में लिए गए एक जहाज के क्रू में कम से कम एक भारतीय नाविक शामिल था। सरकार ने कहा कि सभी नाविक सुरक्षित हैं।
अप्रैल की घटनाओं के बाद भी खतरा बना रहा। जून में, होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी सेना द्वारा भारतीय क्रू वाले कमर्शियल जहाजों पर हमला किए जाने से तीन भारतीय नाविक मारे गए थे। इसके बाद भारत ने वाशिंगटन से जहाजों पर हमले रोकने का आग्रह किया और हमलों को लेकर एक अमेरिकी अधिकारी को तलब किया। जुलाई तक, रिपोर्टों से पता चला कि स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) और उसके आसपास जहाजों पर अमेरिकी और ईरानी हमलों में मारे गए भारतीय नाविकों की संख्या बढ़कर आठ हो गई थी। बताया गया है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से भारतीय नाविकों वाले कम से कम 10 नागरिक जहाजों को निशाना बनाया गया।
संघर्ष के बीच फंसे नाविक
भारतीय क्रू (चालक दल) को लंबे समय तक अनिश्चितता का सामना करना पड़ा है, भले ही उनके जहाजों पर सीधे हमला नहीं हुआ हो। हाल ही में एक भारतीय टैंकर कैप्टन ने बताया कि कैसे वे 23 क्रू सदस्यों और 1,10,000 टन तेल के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य में 75 दिनों तक फंसे रहे। उन्होंने सिर के ऊपर से मिसाइलें गुजरने के बीच संघर्ष के माहौल में रहने के मानसिक तनाव का भी जिक्र किया।
समुद्री संकट ने इस अहम समुद्री रास्ते से होने वाली शिपिंग को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, हाल ही में एक शनिवार को केवल पांच कमोडिटी जहाज इस जलडमरूमध्य से गुजरे, जबकि अगले रविवार को एक भी जहाज नहीं गुजरा; जबकि युद्ध से पहले यहां हर दिन 130 से अधिक जहाज गुजरते थे।
इसका मानवीय असर भी काफी बड़ा रहा है; बताया जाता है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से 20,000 से अधिक नाविक खाड़ी क्षेत्र में फंसे हुए हैं। संकट में फंसे जहाजों पर मौजूद क्रू सदस्यों ने अपनी स्थिति को "जेल में होने" जैसा बताया है।
नाविकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं
यह संकट भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां बड़ी संख्या में लोग समुद्री कामकाज से जुड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय रूटों पर चलने वाले मर्चेंट जहाजों के क्रू में भारतीय नागरिकों की बड़ी हिस्सेदारी है। ऐसे में, दुनिया के सबसे अहम समुद्री 'चोकपॉइंट' (संकरे और महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते) में किसी भी तरह की रुकावट देश के लिए मानवीय सुरक्षा का सीधा मुद्दा बन जाती है।
FSUI का तर्क है कि बार-बार होने वाली ये घटनाएं दिखाती हैं कि केवल नेविगेशनल सलाह और स्वैच्छिक सुरक्षा उपायों पर निर्भर रहने की सीमाएं हैं। यूनियन ने संघर्ष प्रभावित इलाकों से गुजरने वाले भारतीय नाविकों और कमर्शियल जहाजों की सुरक्षा के लिए नौसेना की पक्की मौजूदगी की मांग की है।
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