एआई का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है और इसके साथ रोजगार पर असर को लेकर बहस भी तेज हो रही है। इसी बीच भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कर व्यवस्था में बदलाव का एक सुझाव दिया है। उनका कहना है कि कंपनियों द्वारा एआई के इस्तेमाल पर कर लगाया जा सकता है और कर्मचारियों को दोबारा प्रशिक्षण देने वाली कंपनियों को कर में राहत दी जानी चाहिए।
रघुराम राजन ने 14 अगस्त को प्रकाशित प्रोजेक्ट सिंडिकेट के एक लेख में कहा कि एआई के कारण कुछ नौकरियों पर असर पड़ना तय है, हालांकि इसका समय, पैमाना और अलग-अलग क्षेत्रों पर प्रभाव अभी पूरी तरह साफ नहीं है। उन्होंने इसे भारत के लिए किसी प्रस्तावित सरकारी योजना के तौर पर नहीं रखा है, बल्कि व्यापक नीति विचार के रूप में सामने रखा है।
राजन का तर्क है कि मौजूदा कर व्यवस्था कई बार कंपनियों के लिए कर्मचारियों की तुलना में मशीनों को अपनाना आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद बना देती है। उन्होंने अमेरिका का उदाहरण देते हुए कहा कि कंपनियां कर्मचारियों के लिए सामाजिक सुरक्षा से जुड़े योगदान करती हैं, जबकि एआई के इस्तेमाल पर इस तरह का कोई समान बोझ नहीं है।
इसी असंतुलन को कम करने के लिए राजन ने कंपनियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एआई टोकन पर कर लगाने का सुझाव दिया है। एआई टोकन उन छोटी इकाइयों को कहा जाता है, जिन्हें एआई आधारित प्रणालियां जानकारी को समझने और संसाधित करने के दौरान इस्तेमाल करती हैं। कंपनियों के लिए इन टोकन की संख्या एआई सेवाओं के इस्तेमाल और भुगतान का एक आधार भी होती है।
राजन ने सुझाव दिया कि शुरुआत में इस कर की दर कम रखी जा सकती है और सरकारों के अनुभव बढ़ने के साथ इसमें धीरे-धीरे बदलाव किया जा सकता है। उनका मानना है कि कर इतना अधिक नहीं होना चाहिए कि कंपनियां एआई अपनाने से ही पीछे हट जाएं। घरेलू कंपनियों को किए जाने वाले भुगतान पर नजर रखना अपेक्षाकृत आसान होगा, लेकिन विदेशी एआई सेवा प्रदाताओं को भी इस व्यवस्था में शामिल करना जरूरी होगा।
इसके साथ राजन ने कर्मचारियों को दोबारा प्रशिक्षण देने वाली कंपनियों के लिए कर छूट की बात कही है। उनका सुझाव है कि प्रशिक्षण के बाद कर्मचारी जितने समय तक रोजगार में बना रहता है, उसके आधार पर कंपनी को धीरे-धीरे इस छूट का लाभ दिया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर प्रशिक्षण संबंधी छूट का एक-तिहाई हिस्सा हर साल उपलब्ध कराया जा सकता है।
गौरतलब है कि एआई के इस्तेमाल की रफ्तार फिलहाल कुछ अनुमानों से धीमी दिखाई दे रही है। राजन के मुताबिक कंपनियों को मौजूदा कामकाज में एआई को शामिल करने में कठिनाई हो रही है और लागत को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका के जनगणना ब्यूरो के दिसंबर 2025 से मई 2026 के बीच जुटाए आंकड़ों के अनुसार, वहां कुल कारोबारों में एआई का इस्तेमाल 17 से 20 प्रतिशत के बीच था। 250 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों में यह आंकड़ा करीब 37 प्रतिशत था।
हालांकि राजन ने चेतावनी दी है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने पर कंपनियां एआई को तेजी से अपनाने लग सकती हैं, जिससे रोजगार पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एआई का प्रभाव केवल नकारात्मक नहीं होगा। इससे कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ सकती है, एआई के संचालन से जुड़ी नई नौकरियां बन सकती हैं और प्रोग्रामिंग तथा लेखा जैसे काम आसान होने से नए कारोबार शुरू करने की लागत घट सकती है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, राजन का जोर इस बात पर है कि एआई से होने वाले बदलाव का पूरा बोझ कर्मचारियों पर न पड़े। कंपनियों को कर्मचारियों को नए कौशल सिखाने, उन्हें लंबे समय तक रोजगार में बनाए रखने और बदलती जरूरतों के लिए तैयार करने में भूमिका निभानी होगी। उनका मानना है कि जो कंपनियां अपने कर्मचारियों के साथ बेहतर तरीके से बदलाव का प्रबंधन करेंगी, वे भविष्य में ज्यादा कुशल लोगों को आकर्षित करने में भी सफल रहेंगी।
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कैंसर के इलाज को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से ऐसी व्यवस्था विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें मरीज की अपनी बीमारी के हिसाब से प्रतिरक्षा तंत्र को कैंसर कोशिकाओं की पहचान करना सिखाया जा सके। अब इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। मॉडर्ना और मर्क ने 19 अगस्त 2026 को बताया कि उनके व्यक्तिगत एमआरएनए आधारित कैंसर उपचार इंटिसमेरान ऑटोजीन ने मेलेनोमा के मरीजों पर तीसरे चरण के परीक्षण में सकारात्मक परिणाम दिए हैं।
यह उपचार वी940 या एमआरएनए-4157 के नाम से भी जाना जाता है। परीक्षण में उन मरीजों को शामिल किया गया था, जिनका उच्च जोखिम वाला मेलेनोमा ऑपरेशन के जरिए पूरी तरह निकाल दिया गया था। कुल 1,137 मरीजों पर किए गए परीक्षण में इस उपचार को पेम्ब्रोलिजुमैब के साथ दिया गया और इसकी तुलना केवल पेम्ब्रोलिजुमैब लेने वाले मरीजों से की गई।
मौजूद जानकारी के अनुसार, व्यक्तिगत टीके और पेम्ब्रोलिजुमैब के संयोजन ने कैंसर की दोबारा वापसी से मुक्त रहने की अवधि के मुख्य लक्ष्य को हासिल किया। इसके अलावा शरीर के दूसरे हिस्सों में कैंसर फैलने से मुक्त रहने की अवधि से जुड़े महत्वपूर्ण दूसरे लक्ष्य में भी सकारात्मक परिणाम मिले। कंपनियों के मुताबिक दोनों सुधार आंकड़ों की दृष्टि से महत्वपूर्ण और मरीजों के लिए उपयोगी रहे हैं।
तो आखिर यह व्यक्तिगत कैंसर टीका काम कैसे करता है? इसकी शुरुआत मरीज के ट्यूमर से होती है। ऑपरेशन के बाद कैंसर के ऊतक की आनुवंशिक जांच की जाती है। इसमें ऐसी आनुवंशिक गड़बड़ियां खोजी जाती हैं जो कैंसर कोशिकाओं में मौजूद होती हैं, लेकिन सामान्य कोशिकाओं में नहीं। इन बदलावों से बनने वाले असामान्य प्रोटीन या उनके हिस्सों को नवप्रतिजन कहा जाता है।
इन्हीं नवप्रतिजनों को कैंसर कोशिकाओं की पहचान के लिए एक तरह के संकेत के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। मरीज के ट्यूमर के आधार पर अलग से तैयार किया गया एमआरएनए टीका शरीर की कोशिकाओं को इन संकेतों से जुड़ी जानकारी देता है। इसका उद्देश्य प्रतिरक्षा तंत्र की टी कोशिकाओं को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने के लिए तैयार करना है।
इस उपचार में पेम्ब्रोलिजुमैब को भी शामिल किया गया है। यह प्रतिरक्षा तंत्र पर लगे एक तरह के अवरोध को हटाने का काम करता है, जिससे टी कोशिकाओं को कैंसर पर हमला करने में मदद मिलती है। आसान शब्दों में कहें तो टीका प्रतिरक्षा तंत्र को यह बताने की कोशिश करता है कि किस चीज को निशाना बनाना है, जबकि पेम्ब्रोलिजुमैब उस हमले में मौजूद रुकावट को कम करता है।
गौरतलब है कि इस तकनीक की उम्मीद पहली बार नहीं जगी है। इससे पहले 157 मरीजों पर हुए दूसरे चरण के परीक्षण में भी सकारात्मक संकेत मिले थे। 2026 में सामने आए पांच साल के आंकड़ों के मुताबिक व्यक्तिगत टीके और पेम्ब्रोलिजुमैब के संयोजन से अकेले पेम्ब्रोलिजुमैब की तुलना में कैंसर की वापसी या मृत्यु का जोखिम 49 प्रतिशत और दूर तक फैलने या मृत्यु का जोखिम 59 प्रतिशत कम हुआ था।
तीसरे चरण का परीक्षण इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें पहले की तुलना में कहीं अधिक मरीज शामिल किए गए हैं। हालांकि अभी कंपनियों ने केवल शुरुआती परिणाम जारी किए हैं। मरीजों के लंबे समय तक जीवित रहने जैसे कुछ महत्वपूर्ण परिणामों पर निगरानी जारी है और विस्तृत आंकड़े बाद में चिकित्सा सम्मेलन में पेश किए जाएंगे।
बता दें कि मेलेनोमा एक गंभीर त्वचा कैंसर है। इसमें कई आनुवंशिक बदलाव पाए जा सकते हैं, जिससे प्रतिरक्षा तंत्र के लिए पहचान योग्य लक्ष्य मिलने की संभावना बढ़ती है। वर्ष 2022 में दुनिया भर में करीब 3.30 लाख नए मेलेनोमा मामलों और लगभग 60 हजार मौतों का अनुमान लगाया गया था।
इस तकनीक का परीक्षण फेफड़े, गुर्दे और मूत्राशय के कैंसर समेत अन्य बीमारियों में भी चल रहा है। हालांकि मेलेनोमा में सकारात्मक परिणाम आने का मतलब यह नहीं है कि यही उपचार हर तरह के कैंसर में समान रूप से प्रभावी होगा। अलग-अलग कैंसर की प्रकृति, आनुवंशिक बदलाव और प्रतिरक्षा तंत्र से बच निकलने की क्षमता अलग होती है।
सबसे अहम बात यह है कि इंटिसमेरान ऑटोजीन अभी आम मरीजों के लिए उपलब्ध नहीं है। सकारात्मक तीसरे चरण के परिणाम के बाद भी नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया बाकी है। इसके अलावा हर मरीज के ट्यूमर के हिसाब से अलग टीका तैयार करने में समय, लागत, गुणवत्ता और पहुंच जैसी चुनौतियां भी सामने रहेंगी।
फिलहाल इन नतीजों ने व्यक्तिगत कैंसर उपचार की दिशा में एक अहम कदम जरूर बढ़ाया है। यह सिर्फ एमआरएनए तकनीक का इस्तेमाल नहीं है, बल्कि मरीज के अपने ट्यूमर की आनुवंशिक जानकारी के आधार पर प्रतिरक्षा तंत्र को निशाना तय करने की कोशिश है। आने वाले वर्षों में विस्तृत आंकड़े और अन्य कैंसरों पर होने वाले परीक्षण यह तय करेंगे कि यह तकनीक कैंसर उपचार में कितनी बड़ी भूमिका निभा सकती है और उम्मीदों को वास्तविक इलाज में बदलने में कितनी सफल रहती है।
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