Explainer: 952 रनों का वो ऐतिहासिक अभिशाप, जिसने कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम को टेस्ट क्रिकेट से किया दूर, जानें इनसाइड स्टोरी
Explainer: कोलंबो का आर. प्रेमदासा इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि श्रीलंकाई क्रिकेट का धड़कता हुआ दिल है. साल 1996 में वर्ल्ड कप चैंपियन बनने के बाद श्रीलंका में क्रिकेट को लेकर जो दीवानगी शुरू हुई, उसका गवाह यह मैदान रहा है. इस मैदान ने सनथ जयसूर्या के तूफानी छक्के, मुथैया मुरलीधरन की फिरकी का जादू, लसिथ मलिंगा की यॉर्कर, कुमार संगकारा और महिला जयवर्धने की क्लासिक बल्लेबाजी देखी है. लेकिन इस सुनहरे इतिहास और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद पिछले दो दशकों से यह मैदान टेस्ट क्रिकेट के नक्शे से लगभग गायब है. जहां गॉल, सिंहली स्पोर्ट्स क्लब और पल्लेकेले में लगातार टेस्ट मैच आयोजित होते हैं, वहीं प्रेमदासा स्टेडियम को सिर्फ वनडे और टी-20 मैचों की मेजबानी तक सीमित कर दिया गया है. इतिहास के पन्नों को पलटें, तो इस मैदान पर टेस्ट क्रिकेट का सबसे बड़ा स्कोर 952/6 रहा, जो श्रीलंका ने भारत के खिलाफ बनाया था. कहा जाता है कि यह रन इस मैदान के लिए एक अभिशाप की तरह रहे, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. आखिर क्यों एक ऐतिहासिक टेस्ट रिकॉर्ड्स वाले मैदान को टेस्ट क्रिकेट के लिए 'अनफिट' मान लिया गया? चलिए इस आर्टिकल में जानने की कोशिश करते हैं.
पिच की प्रकृति, 'फ्लैट डेक' और गेंदबाजों के लिए कब्रिस्तान
प्रेमदासा स्टेडियम के टेस्ट क्रिकेट से दूर होने की सबसे पहली और तकनीकी वजह यहां की पिच का मिजाज रहा. प्रेमदासा की पिचें पारंपरिक रूप से बेहद धीमी, सपाट और बल्लेबाजों के लिए स्वर्ग मानी जाती रही हैं. साल 1997 में भारत और श्रीलंका के बीच खेला गया वह टेस्ट मैच आज भी उस दौर के क्रिकेट फैंस को अच्छी तरह याद होगा, जब श्रीलंका ने एक पारी में 6 विकेट पर 952 रन बना दिए थे. वह मैच ड्रॉ रहा था और पांचों दिन गेंदबाजों की बेरहमी से पिटाई हुई. इसके अलावा टेस्ट क्रिकेट की लोकप्रियता इस बात पर टिकी होती है कि मैच का कोई नतीजा निकले, लेकिन प्रेमदासा की मिट्टी और पिच की बनावट ऐसी है कि यहां 5 दिनों तक मैच खिंचने के बाद भी अधिकांश मुकाबले उबाऊ और ड्रॉ पर खत्म होते थे. आधुनिक क्रिकेट में कोई भी बोर्ड ऐसे उबाऊ टेस्ट मैचों की मेजबानी नहीं करना चाहेगा जो दर्शकों को कतई पसंद न आएं.
श्रीलंका क्रिकेट की रोटेशन नीति और SSC का दबदबा
कोलंबो शहर में ही श्रीलंका के पास एक और बेहद ऐतिहासिक मैदान सिंहली स्पोर्ट्स क्लब मौजूद है. इसके अलावा कोलंबो में ही पी. सारा ओवल भी है. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने हमेशा सिंहली स्पोर्ट्स क्लब को अपने मुख्य टेस्ट सेंटर के रूप में प्राथमिकता दी है. SSC की पिच में गति, उछाल और स्पिनर्स के लिए टर्न सब कुछ मौजूद होता है, जिसके कारण मैच का नतीजा 4 या 5 दिनों में निकल आता है. वहीं श्रीलंका क्रिकेट ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत मैदानों को अलग-अलग कर दिया. उन्होंने तय किया कि कोलंबो में टेस्ट मैचों की मेजबानी 'SSC' या फिर 'पी. सारा ओवल' को दी जाएगी, जबकि आर. प्रेमदासा स्टेडियम पूरी तरह से सीमित ओवरों के खेल के लिए सुरक्षित रखा जाएगा.
फ्लडलाइट्स और लिमिटेड ओवरों का व्यावसायिक ढांचा
कोलंबो का आर. प्रेमदासा स्टेडियम श्रीलंका का पहला ऐसा मैदान था जहां वर्ल्ड-क्लास फ्लडलाइट्स लगाई गई थीं. डे-नाइट मैचों के लिए यह मैदान श्रीलंका के लिए सबसे आधुनिक वेन्यू बनकर उभरा. वहीं वनडे और टी-20 मैचों से मिलने वाला गेट रेवेन्यू (टिकट बिक्री) और ब्रॉडकास्टिंग राइट्स का पैसा टेस्ट मैच के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है. चूंकि प्रेमदासा की क्षमता लगभग 35,000 दर्शकों की है, इसलिए श्रीलंका क्रिकेट को यहां डे-नाइट वनडे या टी-20 मैचों से भारी मुनाफा होता है. टेस्ट मैचों में 5 दिनों तक स्टेडियम को भरना, खासकर उपमहाद्वीप में एक बड़ी चुनौती है. अगर प्रेमदासा जैसे बड़े स्टेडियम में टेस्ट मैच के दौरान स्टैंड्स खाली रहें, तो श्रीलंका क्रिकेट को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. इसलिए इसे बिजनेस के हिसाब से सिर्फ सीमित ओवरों के मैचों के लिए रिजर्व कर दिया गया.
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CBSE के तीन-भाषा वाले नियम पर उठाये सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने "नेटिव" शब्द पर जताई आपत्ति
जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने "नेटिव" शब्द के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह औपनिवेशिक (colonial) दौर से आया है. जस्टिस बागची ने कहा, "अंग्रेज़ी को किस हद तक गैर-देशी (non-indigenous) भाषा माना जा सकता है? मुझे 'नेटिव' शब्द पर आपत्ति है क्योंकि यह औपनिवेशिक दौर से आया है. इसकी जगह 'इंडिजिनस' (indigenous/देशी) शब्द होना चाहिए. नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 बनाने वालों को 'नेटिव' शब्द के इस्तेमाल को लेकर सावधान रहना चाहिए था."
हमें इसकी संवैधानिक वैधता देखनी होगी
कोर्ट ने कहा कि उसे यह देखना होगा कि क्या भारत में अंग्रेज़ी को देशी या गैर-देशी भाषा माना जा सकता है. जस्टिस बागची ने आगे कहा, "अंग्रेज़ी को देशी कहा जाए या गैर-देशी, हमें इसकी संवैधानिक वैधता देखनी होगी." ये बातें CBSE के तीन-भाषा वाले नियम को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कहीं गईं. इस नीति के तहत, कक्षा 5 से 9 तक के छात्रों को दो भारतीय "देशी" (native) भाषाओं के साथ एक तीसरी भाषा भी पढ़नी होती है.
पर्याप्त योग्य शिक्षक हैं
याचिकाकर्ताओं ने इस नियम को लागू करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि कई स्कूलों में तय भाषाओं को पढ़ाने के लिए ज़रूरी संसाधन, जैसे कि पाठ्यपुस्तकें और योग्य शिक्षक, मौजूद नहीं हैं. कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या स्कूलों के पास इस नीति को लागू करने के लिए ज़रूरी प्रशासनिक और शिक्षण इंफ्रास्ट्रक्चर है. जस्टिस बागची ने केंद्र से पूछा कि क्या हमारे स्कूलों में संस्कृत जैसी देशी भाषाओं को पढ़ाने के लिए पर्याप्त योग्य शिक्षक हैं.
इस नीति पर फिर से विचार
जस्टिस बागची ने पूछा, "हमारे स्कूलों में कितने संस्कृत शिक्षक B.Ed. क्वालिफाइड हैं?" CJI सूर्यकांत ने भी कहा कि सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों और संदेहों को देखते हुए शायद इस नीति पर फिर से विचार करने और इसे बेहतर बनाने की जरूरत पड़ सकती है. CJI ने कहा, "इन संदेहों पर आप फिर से विचार कर सकते हैं. नीति को बेहतर कैसे बनाया जाए? आप एक एक्सपर्ट बॉडी हैं."
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