दिल्ली को सुंदर, सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए BJP सरकार ने कसी कमर, तैयार किया दिल्ली मास्टरप्लान-2047
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत-2047 के विजन के अनुसार, दिल्ली को समावेशी, सुरक्षित, टिकाऊ और वैश्विक स्तर की प्रतिस्पर्धी राजधानी बनाने के उद्देश्य से दिल्ली मास्टर प्लान- 2047 तैयार किया गया है. दिल्ली सरकार की मानें तो इस मास्टर प्लान में पुराने विकसित क्षेत्रों के पुनर्विकास के साथ-साथ नए क्षेत्रों में प्लानंड विस्तार पर जोर दिया गया है.
Explainer: 952 रनों का वो ऐतिहासिक अभिशाप, जिसने कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम को टेस्ट क्रिकेट से किया दूर, जानें इनसाइड स्टोरी
Explainer: कोलंबो का आर. प्रेमदासा इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम सिर्फ एक मैदान नहीं, बल्कि श्रीलंकाई क्रिकेट का धड़कता हुआ दिल है. साल 1996 में वर्ल्ड कप चैंपियन बनने के बाद श्रीलंका में क्रिकेट को लेकर जो दीवानगी शुरू हुई, उसका गवाह यह मैदान रहा है. इस मैदान ने सनथ जयसूर्या के तूफानी छक्के, मुथैया मुरलीधरन की फिरकी का जादू, लसिथ मलिंगा की यॉर्कर, कुमार संगकारा और महिला जयवर्धने की क्लासिक बल्लेबाजी देखी है. लेकिन इस सुनहरे इतिहास और वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद पिछले दो दशकों से यह मैदान टेस्ट क्रिकेट के नक्शे से लगभग गायब है. जहां गॉल, सिंहली स्पोर्ट्स क्लब और पल्लेकेले में लगातार टेस्ट मैच आयोजित होते हैं, वहीं प्रेमदासा स्टेडियम को सिर्फ वनडे और टी-20 मैचों की मेजबानी तक सीमित कर दिया गया है. इतिहास के पन्नों को पलटें, तो इस मैदान पर टेस्ट क्रिकेट का सबसे बड़ा स्कोर 952/6 रहा, जो श्रीलंका ने भारत के खिलाफ बनाया था. कहा जाता है कि यह रन इस मैदान के लिए एक अभिशाप की तरह रहे, लेकिन यह पूरा सच नहीं है. आखिर क्यों एक ऐतिहासिक टेस्ट रिकॉर्ड्स वाले मैदान को टेस्ट क्रिकेट के लिए 'अनफिट' मान लिया गया? चलिए इस आर्टिकल में जानने की कोशिश करते हैं.
पिच की प्रकृति, 'फ्लैट डेक' और गेंदबाजों के लिए कब्रिस्तान
प्रेमदासा स्टेडियम के टेस्ट क्रिकेट से दूर होने की सबसे पहली और तकनीकी वजह यहां की पिच का मिजाज रहा. प्रेमदासा की पिचें पारंपरिक रूप से बेहद धीमी, सपाट और बल्लेबाजों के लिए स्वर्ग मानी जाती रही हैं. साल 1997 में भारत और श्रीलंका के बीच खेला गया वह टेस्ट मैच आज भी उस दौर के क्रिकेट फैंस को अच्छी तरह याद होगा, जब श्रीलंका ने एक पारी में 6 विकेट पर 952 रन बना दिए थे. वह मैच ड्रॉ रहा था और पांचों दिन गेंदबाजों की बेरहमी से पिटाई हुई. इसके अलावा टेस्ट क्रिकेट की लोकप्रियता इस बात पर टिकी होती है कि मैच का कोई नतीजा निकले, लेकिन प्रेमदासा की मिट्टी और पिच की बनावट ऐसी है कि यहां 5 दिनों तक मैच खिंचने के बाद भी अधिकांश मुकाबले उबाऊ और ड्रॉ पर खत्म होते थे. आधुनिक क्रिकेट में कोई भी बोर्ड ऐसे उबाऊ टेस्ट मैचों की मेजबानी नहीं करना चाहेगा जो दर्शकों को कतई पसंद न आएं.
श्रीलंका क्रिकेट की रोटेशन नीति और SSC का दबदबा
कोलंबो शहर में ही श्रीलंका के पास एक और बेहद ऐतिहासिक मैदान सिंहली स्पोर्ट्स क्लब मौजूद है. इसके अलावा कोलंबो में ही पी. सारा ओवल भी है. श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड ने हमेशा सिंहली स्पोर्ट्स क्लब को अपने मुख्य टेस्ट सेंटर के रूप में प्राथमिकता दी है. SSC की पिच में गति, उछाल और स्पिनर्स के लिए टर्न सब कुछ मौजूद होता है, जिसके कारण मैच का नतीजा 4 या 5 दिनों में निकल आता है. वहीं श्रीलंका क्रिकेट ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत मैदानों को अलग-अलग कर दिया. उन्होंने तय किया कि कोलंबो में टेस्ट मैचों की मेजबानी 'SSC' या फिर 'पी. सारा ओवल' को दी जाएगी, जबकि आर. प्रेमदासा स्टेडियम पूरी तरह से सीमित ओवरों के खेल के लिए सुरक्षित रखा जाएगा.
फ्लडलाइट्स और लिमिटेड ओवरों का व्यावसायिक ढांचा
कोलंबो का आर. प्रेमदासा स्टेडियम श्रीलंका का पहला ऐसा मैदान था जहां वर्ल्ड-क्लास फ्लडलाइट्स लगाई गई थीं. डे-नाइट मैचों के लिए यह मैदान श्रीलंका के लिए सबसे आधुनिक वेन्यू बनकर उभरा. वहीं वनडे और टी-20 मैचों से मिलने वाला गेट रेवेन्यू (टिकट बिक्री) और ब्रॉडकास्टिंग राइट्स का पैसा टेस्ट मैच के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है. चूंकि प्रेमदासा की क्षमता लगभग 35,000 दर्शकों की है, इसलिए श्रीलंका क्रिकेट को यहां डे-नाइट वनडे या टी-20 मैचों से भारी मुनाफा होता है. टेस्ट मैचों में 5 दिनों तक स्टेडियम को भरना, खासकर उपमहाद्वीप में एक बड़ी चुनौती है. अगर प्रेमदासा जैसे बड़े स्टेडियम में टेस्ट मैच के दौरान स्टैंड्स खाली रहें, तो श्रीलंका क्रिकेट को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. इसलिए इसे बिजनेस के हिसाब से सिर्फ सीमित ओवरों के मैचों के लिए रिजर्व कर दिया गया.
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