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मजबूत मार्जिन, पर कैश की कमी, Tempsens Instruments India IPO में क्या है खास?

Tempsens Instruments India IPO: टेम्पसेंस इंस्ट्रूमेंट्स इंडिया कैमिकल और ग्लास जैसे भारी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्रीज में इस्तेमाल होने वाले खास टेम्परेचर सेंसर, इंडस्ट्रियल हीटर और हाई-टेम्परेचर केबल बनाती है. कंपनी का ₹650 करोड़ का IPO ₹285- ₹300 प्रति शेयर के प्राइस बैंड के साथ आ रहा है. इसमें ₹95 करोड़ का फ्रेश इश्यू और मौजूदा शेयरहोल्डर्स द्वारा ₹555 करोड़ तक का ऑफर फॉर सेल शामिल है. प्राइस बैंड के ऊपरी स्तर पर IPO के बाद कंपनी का वैल्यूएशन लगभग ₹2,515 करोड़ है. 

कंपनी की ताकत और कमजोरियां क्या हैं?

इस बिजनेस के पक्ष में कई बातें हैं. जैसे जबरदस्त ग्रोथ, ज्यादा मार्जिन, मजबूत मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी और खास तरह के टेम्परेचर सेंसर के मामले में अग्रणी स्थिति. हालांकि Tempsens Instruments India IPO के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं. जैसे 210 दिन का वर्किंग कैपिटल साइकिल, कैपेसिटी का कम इस्तेमाल और बड़े प्रोजेक्ट ऑर्डर पर ज्यादा निर्भरता है. असली सावल यह है कि क्या Tempsens IPO के वैल्यूएशन को सही ठहराने के लिए ग्रोथ बनाए रखते हुए कैश कैपेसिटी में काफी सुधार कर सकती है. 

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Tempsens Instruments IPO GMP

ग्रे मार्केट प्रीमियम (GMP) मार्केट की मांग का एक अनौपचारिक इंडिकेटर है, जिसमें तेजी से उतार-चढ़ाव हो सकता है. यह न तो लिस्टिंग से होने वाले मुनाफे की गारंटी देता है और न ही IPO की सही वैल्यू बताता है. इन्वेस्टर्स को सिर्फ GMP पर निर्भर रहने के बजाय फंडामेंटल्स, वैल्यूएशन, फाइनेंशियल परफॉर्मेंस और रिस्क पर ध्यान देना चाहिए.

फैक्ट्री के भीतर बैठा हीट कंट्रोल एक्सपर्ट

Tempsens को एक स्पेशलिस्ट सप्लायर के तौर पर देखा जा सकता है, जो बड़ी फैक्ट्रियों को बहुत ज्यादा हीट एनर्जी को सुरक्षित रूप से संभालने में मदद करता है. इसके टेम्परेचर सेंसर ऐसी जगहों पर गर्मी मापते हैं जहां आम थर्मामीटर काम नहीं कर पाते. कुछ सेंसर प्रोसेस के सीधे संपर्क में आकर बहुत ज्यादा तापमान मापते हैं. जबकि नॉन-कॉन्टैक्ट सिस्टम जैसे थर्मल कैमरे पिघली हुई धातु को छुए बिना उसका तापमान मापते हैं. यह कंपनी इंडस्ट्रियल हीटर और भट्टियां भी बनाती है, जिनका इस्तेमाल मेटल ट्रीटमेंट और ग्लास प्रोसेसिंग जैसे कामों में होता है. इसकी खास केबल उन जगहों पर पावर और सिग्नल पहुंचाती हैं, जहां गर्मी या खतरनाक हालात की वजह से आम तार काम नहीं कर पाते. 

रेवेन्यू के दो इंजन

कंपनी का रेवेन्यू दो हिस्सों में बंटा है. बड़े प्रोजेक्ट्स और OEM ऑर्डर का FY26 के ऑपरेटिंग रेवेन्यू में 67.55% हिस्सा था, जबकि रिप्लेसमेंट ऑर्डर का हिस्सा 32.45% था. रिप्लेसमेंट का बिजनेस खास तौर पर फायदेमंंद है क्योंकि मुश्किल इंडस्ट्रियल हालात में इस्तेमाल होने वाले सेंसर को आमतौर पर हर 12 से 14 महीने में बदलना पड़ता है. Tempsens 15 फैसिलिटीज में मैन्युफैक्चरिंग करती है, जिनमें से 10 उदयपुर में हैं और 5 विदेश में. यह अपने खुद के ऑपरेशंस और 28 ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूटर्स के जरिए 80 से ज्यादा देशों में 3,800 से ज्यादा ग्राहकों को सर्विस देती है.

एक खास बात यह है कि कंपनी बैकवर्ड इंटीग्रेशन पर काम करती है, यानी यह मेटल एलॉय पिघलाने और वायर ड्रॉइंग जैसी कई अहम प्रोसेस खुद करती है. यह कुछ-कुछ ऐसा है जैसे कोई रेस्टोरेंट हर चीज बाहर से मंगाने के बजाय अपनी जरूरी सामग्री खुद अपनी रसोई में बनाए. इससे क्वालिटी, कॉस्ट और डिलीवरी पर ज्यादा नियंत्रण मिलता है.

इंडस्ट्री आउटलुक और ग्रोथ पोटेंशियल

इस इंडस्ट्री में मौके तो अच्छे हैं, लेकिन निवेशकों के लिए इंडस्ट्री की ग्रोथ और कंपनी की ग्रोथ के बीच फर्क समझना जरूरी है. भारत का टेम्परेचर सेंसर मार्केट FY26 में लगभग ₹1,880 करोड़ का होने का अनुमान है. और FY31 तक इसके ₹2,880 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है, जो लगभग 8.9% की CAGR दिखाता है. स्पेशलाइज्ड केबल रिप्लेसमेंट मार्केट काफी बड़ा है. FY26 में इसकी वैल्यू लगभग ₹12,800 करोड़ है और FY31 तक इसके ₹27,250 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिफिकेशन, EV बैटरी प्रोडक्शन और मेटल्स, पावर व पेट्रोकैमिकल्स जैसे सेक्टर्स में घरेलू क्षमता बढ़ाने की भारत की कोशिशें इस मांग को सहारा दे रही हैं. 

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Tempsens की मार्केट पोजिशन

टेम्पसेंस इस मार्केट के कुछ हिस्सों में अच्छी स्थिति में है. भारत के कॉन्टैक्ट टेम्परेचर सेंसर मार्केट में इसकी 10.5% हिस्सेदारी है और RHP के अनुसार, यह नॉन-कॉन्टैक्ट सेंसर जैसे कि पाइरोमीटर और ऑनलाइन थर्मल इमेजर बनाने वाली देश की एकमात्र घरेलू कंपनी है, जिसकी इस कैटेगरी में 21.3% मार्केट हिस्सेदारी है. इसकी मजबूत मैन्युफैक्चरिंग इंटीग्रेशन भी मार्केट में नई कंपनियों के आने के लिए एक बड़ी रुकावट पैदा करती है. कोई नया कॉम्पिटिटर आसानी से सालों के मैन्युफैक्चरिंग अनुभव, कस्टमर के साथ संबंधों और खास प्रोडक्शन क्षमताओं की नकल नहीं कर सकता. 

लेकिन एक अहम सीमा भी है. बढ़ता हुआ मार्केट अपने आप यह गारंटी नहीं देता कि Tempsens उस ग्रोथ को हासिल कर ही लेगी. इसकी दो फैसिलिटीज FY26 में सिर्फ 41-42% कैपेसिटी पर चलीं, जबकि इसकी 15 में से 10 मैन्युफैक्चरिंग फैसिलिटीज उदयपुर में केंद्रित हैं. बड़े प्रोजेक्ट ऑर्डर्स भी रेवेन्यू को ज्यादा साइक्लिकल बनाते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि Tempsens की एक बढ़ते हुए निच सेगमेंट में मजबूत पोजिशन है, लेकिन इस मौके को टिकाऊ ग्रोथ में बदलने की क्षमता काफी हद तक बेहतर कैपेसिटी यूटिलाइजेशन, कैश मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन पर निर्भर करती है.

Tempsens Instruments की खासियत क्या है?

टेम्पसेंस ने एक ऐसी खास जगह बनाई है जिसकी नकल करना मुश्किल है. यह भारत में कॉन्टैक्ट टेम्परेचर सेंसर बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है और नॉन-कॉन्टैक्ट सेंसर के मामले में भी इसकी स्थिति बहुत मजबूत है. इस सेगमेंट में इसे एकमात्र घरेलू निर्माता माना जाता है. यह बात इसलिए अहम है क्योंकि इंडस्ट्रियल कस्टमर टेम्परेचर कंट्रोल करने वाले जरूरी इक्विपमेंट को बदलने का रिस्क आसानी से नहीं लेते. एक खराब सेंसर प्रोडक्शन, प्रोडक्ट की क्वालिटी या प्लांट की सुरक्षा पर भी असर डाल सकते हैं. यह नए प्रतिस्पर्धियों के लिए एक अहम भरोसे की बैरियर बनाता है.

कंपनी ने यह भी दिखाया है कि वह किसी एक प्रोडक्ट या कस्टमर पर निर्भर रहे बिना भी आगे बढ़ सकती है. ऑपरेटिंग रेवेन्यू FY24 में ₹274.81 करोड़ से बढ़कर FY26 में ₹444.88 करोड़ हो गया. जबकि विदेशी बाजारों से होने वाला रेवेन्यू दोगुने से भी ज्यादा बढ़कर ₹125.82 करोड़ तक पहुंच गया. खास बात यह है कि कई बिजनेस सेगमेंट में खरीदारी करने वाले कस्टमर्स का FY26 के रेवेन्यू में लगभग 60% योगदान रहा. इससे पता चलता है कि Tempens एक ही क्लाइंट का सेंसर, हीटर और केबल जैसे कई तरह के प्रोडक्ट सप्लाी करके उनसे अपने रिश्ते मजबूत करने की क्षमता रखती है. 

आखिर में, इसकी मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी आर्थिक स्थिति भी मजबूत है. FY26 में EBITDA मार्जिन 24.83% और ROCE 21.61% रहा, जो दिखाता है कि कंपनी लगाई गई पूंजी के मुकाबले अच्छा ऑपरेटिंग प्रॉफिट कमाती है. कस्टमर कंसंट्रेशन में भी सुधार हुआ है. टॉप 10 क्लाइंट्स का FY26 के रेवेन्यू में योगदान सिर्फ 18.59% रहा.

ग्रोथ को सीमित कर सकते हैं ये जोखिम

सबसे बड़ी चिंता कैश की एफिशिएंसी से जुड़ी है. नेट वर्किंग कैपिटल डेज FY24 में 152 से बढ़कर FY26 में 210 हो गए. आसान शब्दों में कहें तो, कंपनी को अब इन्वेंट्री और ग्राहकों से मिलने वाले पेमेंट में फंसी रकम को कैश में बदलने के लिए काफी ज्यादा इंतजार करना पड़ता है. ट्रेड रिसीवेबल्स लगभग दोगुने हो गए ₹45.56 करोड़ से बढ़कर ₹85.74 करोड़. जबकि कलेक्शन का समय 61 दिन से बढ़कर 70 दिन हो गया. अकाउंटिंग मुनाफे में बढ़ोतरी के बावजूद, इससे विस्तार के लिए उपलब्ध कैश सीमित हो सकता है.

काम पूरा करने और रेवेन्यू के एक ही जगह पर केंद्रित होने से जुड़े जोखिम भी काफी अहम हैं. FY26 में कुल रेवेन्यू का लगभग दो-तिहाई हिस्सा बड़े प्रोजेक्ट्स और OEM ऑर्डर से आया. ये ऑर्डर एक जैसे नहीं होते, क्योंकि आर्थिक मंदी के समय इंडस्ट्रियल क्लाइंट्स कैपिटल खर्च टाल सकते हैं. इसके अलावा, 15 में से 10 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स उदयपुर में हैं, जिसका मतलब है कि इलाके में किसी बड़ी दिक्कत से घरेलू प्रोडक्शन का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित हो सकता है. कुछ यूनिट्स अपनी क्षमता के आधे से भी कम पर काम कर रही हैं.

तीसरी चिंता यह है कि अधिग्रहणों और विस्तार के बाद ग्रोथ थोड़ी जटिल हो गई है. कर्ज FY24 के 30.13 करोड़ रुपये से बढ़कर FY26 में 77.95 करोड़ रुपये हो गया, जबकि Marathon Heater के विलय के बाद बैलेंस शीट तेजी से बढ़ी. IPO से मिलने वाला 55 करोड़ रुपये का कर्ज चुकाना मददगार साबित होगा, लेकिन निवेशकों को यह देखना होगा कि कंपनी का बड़ा आकार वाकई बेहतर कैश जनरेशन में तब्दील होता है या नहीं. अगर बढ़ता हुआ पैसा वर्किंग कैपिटल में फंसा रह जाए, तो तेज रेवेन्यू ग्रोथ की उतनी अहमियत नहीं रह जाती.

क्या वैल्यूएशन में बची है गुंजाइश?

₹300 प्रति शेयर के भाव पर, IPO के बाद मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹2,515 करोड़ है. FY26 के रिपोर्टेड मुनाफे के आधार पर P/E रेशियो 35.39x है, जिसे कम वैल्यूएशन नहीं माना जा सकता. हालांकि, रिपोर्टेड मुनाफे पर खरीदी गई इनटैंजिबल एसेट्स से जुड़े लगभग ₹3.80 करोड़ के नॉन-कैश अमॉर्टाइजेशन का असर पड़ा है. इसे एडजस्ट करने पर, एडजस्टेड PAT ₹74.87 करोड़ है और एडजस्टेड P/E रेशियो लगभग 33.59x है. EV/EBITDA मल्टीपल लगभग 22.14x है, जो एक काम का मेट्रिक है क्योंकि EBITDA सीधे ऑपरेटिंग मुनाफे पर फोकस करता है. कंपनी के पास 77.95 करोड़ रुपये के कर्ज़ के मुकाबले करीब 86.78 करोड़ रुपये का कैश भी था, यानी नेट आधार पर यह लगभग कर्ज-मुक्त है.

ऐसी कोई लिस्टेड भारतीय कंपनी नहीं है जिससे Tempsens के तीनों बिजनेस सेगमेंट की सीधे तुलना की जा सके, इसलिए पारंपरिक रूप से पीयर्स के साथ तुलना अधूरी रह जाती है. फिर भी, कंपनी का मार्जिन बताए गए अनलिस्टेड या सब्सिडियरी साथियों के मुकाबले बेहतर दिखता है. इसका FY26 EBITDA मार्जिन 24.83% था, जो Thermo Cables के 16.73% और Wika India के 10.20% से काफी ज्यादा है. इस तरह प्रीमियम के लिए एक तार्किक आधार है जो खास प्रोडक्ट्स, ज्यादा मार्जिन, बैकवर्ड इंटीग्रेशन और नॉन-कॉन्टैक्ट सेंसर्स में मजबूत स्थिति की वजह से है.

लेकिन निवेशकों को दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 210 दिनों का नेट वर्किंग कैपिटल बताए गए पीयर लेवल्स से काफी ज्यादा है, और RoNW FY24 के 22.70% से घटकर FY26 में 13.55% रह गया, क्योंकि इक्विटी बेस तेजी से बढ़ा. सबसे अहम बात यह है कि कंसॉलिडेटेड प्रॉफिट 31.79% CAGR से बढ़ा, लेकिन डाइल्यूटेड EPS सिर्फ 8.06 रुपये से बढ़कर 8.33 रुपये हुआ, क्योंकि कॉर्पोरेट एक्शंस के बाद शेयर काउंट काफी बढ़ गया.

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डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए दी गई है और इसे निवेश की सलाह नहीं माना जाना चाहिए. किसी भी निवेश फैसले से पहले कृपया अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह लें.

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Explainer: आखिरकार क्रिकेट बोर्ड क्यों करते हैं खिलाड़ियों की NOC कैंसिल? जानिए अफगानिस्तान ने नूर अहमद को क्यों दी सजा

What is NOC in Cricket : क्रिकेट का खेल काफी पुराना है. आज दुनिया भर के लगभग आधे से ज्यादा देश क्रिकेट खेलते हैं. इनमें से लगभग 111 से अधिक देशों को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बोर्ड (ICC) के द्वारा मान्यता प्राप्त है. ऐसे में वो क्रिकेट आईसीसी के नियमों के मुताबिक खेलते हैं. ये सभी देश उन नियमों का पालन करते हैं, जो क्रिकेट की सबसे बड़ी निकाय आईसीसी के द्वारा बनाए गए हैं. 

क्रिकेट में हर देश का अपना एक क्रिकेट बोर्ड होता है, जो उस देश के द्वारा ही संचालित किया जाता है. जैसे कि भारत का क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई है, जो इंडिया में क्रिकेट से जुड़े हर फैसले लेता है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) टीम इंडिया के साथ-साथ घरेलू क्रिकेट में खेलने वाले खिलाड़ियों के हितों का भी ख्याल रखता है. 

क्रिकेट के सबसे बड़े नियमों में से एक एनओसी (NOC) का नियम है. अब आपको मन में सवाल आ रहा होगा कि, क्रिकेट तो बैट और बॉल का खेल है. इसमें गेंद और बल्ले के बीच जंग देखने के लिए मिलती है लेकिन क्रिकेट में एनओसी क्या है. ये क्या होता है. ये किस तरह काम करता है और इसका प्रभाव क्रिकेटर्स पर किस प्रकार पड़ता है. अगर आप भी ऐसा सोच रहे हैं तो आज हम आपको क्रिकेट में क्या होती है? 

इसके साथ ही खिलाड़ियों के लिए एनओसी क्रिकेट बोर्ड से पाना क्यों जरूरी होता है? एनओसी क्रिकेट बोर्ड क्रिकेटर्स को क्यों देता है? खिलाड़ियों की एनओसी बोर्ड द्वारा क्यों रद्द की जाती है? आज हम आपको इस सभी के बारे में बताने वाले हैं. इसके साथ ही अफगानिस्तान के क्रिकेटर नूर अहमद के साथ हुए ताजा मामले के बारे में भी बताने वाले हैं, जो एनओसी से ही जुड़ा हुआ है. 

क्रिकेट में क्या होती है एनओसी?

क्रिकेट में एनओसी (NOC) का मतलब नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (No Objection Certificate) होता है. इसे अनापत्ति प्रमाणपत्र हिंदी में कहा जाता है. ये पूरी तरह से आधिकारिक अनुमति पत्र होता है, जो क्रिकेट बोर्ड द्वारा अपने खिलाड़ियों को देश के अलावा किसी अन्य देश में जाकर खेलने के लिए दिया जाता है. इस एनओसी पत्र के द्वारा किसी खिलाड़ी को क्रिकेट बोर्ड या राज्य क्रिकेट संघ यह प्रमाणित करता है कि उसे किसी दूसरी टीम, राज्य या विदेशी टूर्नामेंट में खेलने पर कोई आपत्ति नहीं है. इस स्थिति में आईपीएल समते तमाम विदेशी लीगों में भी खिलाड़ियों को खेलने के लिए उनके बोर्ड के द्वारा एनओसी दी जाती है.

उदाहरण के लिए मान लीजिए कि, कोई खिलाड़ी भारत का है और वो इंग्लैंड की काउंटी क्रिकेट या किसी विदेशी टी20 लीग में खेलना चाहता है. तब उसका घरेलू क्रिकेट बोर्ड यह जांचता है कि खिलाड़ी को अनुमति दी जा सकती है या नहीं. वो खिलाड़ी बगैर एनओसी मिले वहां जाकर क्रिकेट नहीं खेल सकता है. एनओसी मिलने पर ही वो खिलाड़ी आधिकारिक रूप से उस प्रतियोगिता में खेल सकता है. 

क्रिकेट बोर्ड से एनओसी पाना क्यों जरूरी होता है?

आपको बता दें कि, एनओसी सिर्फ एक कागज नहीं है, बल्कि क्रिकेट बोर्ड द्वारा अपने खिलाड़ी को मिलने वाला आधिकारिक अनुमति पत्र होता है. इसके पाने के बाद ही खिलाड़ी का दूसरी प्रतियोगिता में खेलना उसके राष्ट्रीय या घरेलू दायित्वों से नहीं टकराता है. भारत में कई खिलाड़ी अपनी घरेलू टीम बदलते हैं, ऐसे में उन्हें अपने क्रिकेट बोर्ड से एनओसी लेनी पड़ती है. ऐसे क्रिकेटर्स में पृथ्वी शॉ, अर्जुन तेंदुलकर, शशांक शर्मा, करुण नायर जैसे नाम शामिल हैं. 

  • राष्ट्रीय टीम की उपलब्धता - अगर खिलाड़ी को देश के लिए खेलना है, तो बोर्ड पहले राष्ट्रीय कार्यक्रम को प्राथमिकता देता है.
  • घरेलू टूर्नामेंट की प्रतिबद्धता -  कई बोर्ड चाहते हैं कि खिलाड़ी अपने घरेलू सीजन में टीम के लिए उपलब्ध रहें.
  • अनुबंध और नियम -  केंद्रीय अनुबंध या घरेलू अनुबंध वाले खिलाड़ियों पर अलग शर्तें लागू हो सकती हैं.
  • आधिकारिक मान्यता - आईसीसी के नियमों के तहत कई विदेशी प्रतियोगिताओं में घरेलू बोर्ड की अनुमति आवश्यक होती है.

क्रिकेट बोर्ड खिलाड़ियों को एनओसी क्यों देता है?

क्रिकेट बोर्ड खिलाड़ियों को एनओसी बाहर विदेशी लीग और प्रतियोगिताओं में खेलने के लिए देता है. इस दौरान बोर्ड सबसे पहले ये देखता है कि क्या इससे हमारी क्रिकेट का कोई नुकसान तो नहीं हो रहा है. खिलाड़ी के एनओसी पाकर बाहर खेलना का कोई असर हम पर तो नहीं पड़ रहा है. अगर घरेलू सीजन नहीं चल रहा है या वो राष्ट्रीय टीम के लिए नहीं खेल रहा है तो क्रिकटो बोर्ड उन्हें एनओसी विदेशी लीग और अपनी टीम बदलने के लिए देता है. 

  • खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम की ड्यूटी पर नहीं है, तो उसे एनओसी दी जाएगी.
  • घरेलू क्रिकेट की जिम्मेदारियों से टकराव नहीं हो रहा, तो उसे एनओसी दी जाएगी.
  • विदेशी लीग या काउंटी क्रिकेट निर्धारित समय में हो रही है, तो उसे एनओसी दी जाएगी.
  • खिलाड़ी ने बोर्ड की सभी अनुबंध शर्तों का पालन किया है, तो उसे एनओसी दी जाएगी.

खिलाड़ी की एनओसी बोर्ड द्वारा रद्द क्यों की जाती है?

क्रिकेट बोर्ड के द्वारा एनओसी जारी होने के बाद भी कुछ परिस्थितियों में उसे निलंबित या रद्द किया जा सकता है. हालांकि हर बोर्ड के अपने नियम होते हैं. इसलिए कारण अलग-अलग हो सकते हैं. वहीं कुछ क्रिकेट बोर्ड खिलाड़ियों को एनओसी देते ही नहीं है. कुछ क्रिकेट बोर्ड बहुत गंभीर स्थिति में ही अपने खिलाड़ियों की एनओसी प्रदान करते हैं. 

  • राष्ट्रीय या घरेलू ड्यूटी आ जाना - क्रिकेट खिलाड़ी को अचानक राष्ट्रीय टीम या महत्वपूर्ण घरेलू टूर्नामेंट के लिए जाना है तो ऐसे में क्रिकेट बोर्ड उसकी एनओसी वापस ले सकता है और उससे पहले राष्ट्रीय ड्यूटी करने की कह सकती है. 
  • बोर्ड की नीति में बदलाव - कुछ खास स्थितियों में बोर्ड के निमय बिल्कुल अलग होते हैं. कभी-कभी बोर्ड विदेशी लीगों को लेकर अपनी नीति बदल देता है और पहले दी गई अनुमतियों को निलंबित कर सकता है.
  • अनुबंध या अनुशासन संबंधी कारण - खिलाड़ी अनुबंध की शर्तों या बोर्ड के नियमों का उल्लंघन करता है, तो कार्रवाई हो सकती है. ऐसे में उसकी एनओसी रद्द की जा सकती है.
  • खिलाड़ी की उपलब्धता बदल जाना - किसी खिलाड़ी के अचानक टूर्नामेंट के लिए उपलब्ध नहीं होनी की स्थिति में भी एनओसी रद्द की जा सकती है. चोट, चयन या कार्यक्रम में बदलाव जैसी परिस्थितियां भी एनओसी रद्द की जा सकती है.

 

एसीबी ने नूर अहमद की एनओसी की रद्द

कैरेबियन प्रीमियर लीग (सीपीएल) 2026 में सेंट लूसिया किंग्स की ओर से अफगानिस्तान के बाएं हाथ के स्पिनर नूर अहमद सीपीएल में खेलने वाले थे. लेकिन अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड (एसीबी) ने नूर अहमद एनओसी नहीं दी है. बोर्ड ने उनका नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट (एनओसी) रद्द कर दिया है. इसके बाद सेंट लूसिया किंग्स ने नूर अहमद के विकल्प के रूप में न्यूजीलैंड के सलामी बल्लेबाज और विकेटकीपर टिम सीफर्ट को साइन किया है. वहीं नूर अहमद अब सीपीएल 2026 से बाहर हो गए हैं. अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने उनकी एनओसी क्यों रद्द की है. इस बारे में कुछ भी जानकारी अब तक सामने नहीं आ पाई है.

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