Allahabad High Court का फैसला, वेश्यालय ग्राहक पर नहीं चलेगा ITP Act
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाने वाले व्यक्ति पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि निजी संतुष्टि के लिए किसी को पैसे देना इस कानून के तहत वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किसी व्यक्ति की खरीद-फरोख्त के समान नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ये धाराएं वेश्यालय चलाने या उसका प्रबंधन करने, किसी स्थान को वेश्यालय के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देने, किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति से होने वाली कमाई पर गुजारा करने तथा किसी व्यक्ति को यौन शोषण के लिए उपलब्ध कराने, उकसाने या ले जाने से संबंधित हैं। न्यायमूर्ति गौतम चौधरी ने 11 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा, ‘‘यदि कोई व्यक्ति ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाता है तो अधिकतम यह कहा जा सकता है कि वह अपनी कामेच्छा की संतुष्टि के लिए किसी वेश्या की सेवा ले रहा है, न कि इस अधिनियम में परिभाषित वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से, जिसमें व्यावसायिक शोषण आवश्यक तत्व है।’’ अदालत ने कहा, ‘‘इसलिए, जो ग्राहक अपनी संतुष्टि के लिए पैसे देता है, उस पर इस अधिनियम की धारा 3, 4, 5 या 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।’’ इस टिप्पणी के साथ अदालत ने नितिन नामक व्यक्ति की याचिका स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ दाखिल आरोपपत्र और आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।
नितिन उन 16 लोगों में शामिल था, जिन्हें 31 दिसंबर 2023 को गाजियाबाद के शालीमार गार्डेन इलाके में एक मकान पर पुलिस की छापेमारी के दौरान पकड़ा गया था। याचिकाकर्ता पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोप लगाए गए थे। अदालत ने कहा कि किसी ग्राहक के खिलाफ इन धाराओं के तहत आरोप कानूनी रूप से मान्य नहीं हैं, क्योंकि ये प्रावधान वेश्यालय संचालन, उसका प्रबंधन करने या वेश्यावृत्ति से जुड़े अन्य कृत्यों से संबंधित हैं।
अदालत ने कहा कि केवल अपनी कामेच्छा की संतुष्टि के लिए किसी महिला को धन देने मात्र से किसी ग्राहक को वेश्यालय संचालन, उसका प्रबंधन करने या उसके संचालन में सहयोग करने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा, ‘‘रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री से स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता महज एक ग्राहक था और वह पैसे देकर अपनी कामेच्छा की संतुष्टि के लिए वहां आया था, न कि वेश्यावृत्ति कराने के उद्देश्य से। इसलिए, उक्त धाराएं उस पर लागू नहीं होतीं।
याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग होगा।
Delhi High Court ने जताई आपत्ति: Lakshmi Yojana में MP MLA संस्तुति अनिवार्य
दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत दिल्ली सरकार के उस कदम पर आपत्ति जताई, जिसके तहत महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की वित्तीय सहायता देने वाली लक्ष्मी योजना का लाभ लेने के लिए स्थानीय सांसद या विधायक की संस्तुति अनिवार्य की गई है। मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि पात्रता का निर्धारण आय प्रमाण पत्र और निवास प्रमाण जैसे दस्तावेजों के आधार पर किया जा सकता है। अदालत ने दिल्ली सरकार के वकील को 24 अगस्त को निर्देशों के साथ पेश होने को कहा।
पीठ ने कहा, ‘‘निर्देश प्राप्त करें। हम इसे मंजूरी नहीं दे सकते।’’ अदालत ने सवाल किया कि सरकार संस्तुति पत्र क्यों मांग रही है, जबकि पात्रता का आकलन करने के सैकड़ों अन्य तरीके मौजूद हैं। पीठ ने सरकारी वकील से पूछा, ‘‘आप उनसे विधायक या सांसद के पास जाने के लिए क्यों कह रहे हैं?’’ अदालत ने आदेश दिया, ‘‘सोमवार को इस मामले को सूचीबद्ध करें, ताकि वकील यह निर्देश ले सकें कि दिल्ली लक्ष्मी योजना का लाभ लेने वाली महिलाओं के लिए सांसद या विधायक का संस्तुति पत्र प्रस्तुत करना क्यों आवश्यक किया गया है।’’ उच्च न्यायालय कांग्रेस के पूर्व पार्षद अभिषेक दत्त और मौजूदा पार्षद वेदपाल शीतल चौधरी द्वारा इस मुद्दे पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
पीठ ने पाया कि योजना में लाभ लेने के लिए निर्धारित विस्तृत पात्रता मानदंड में विधायक की संस्तुति की आवश्यकता का कोई उल्लेख नहीं है। अदालत ने कहा, ‘‘हमारा प्रथमदृष्टया विचार है कि कोई महिला इन मानदंडों को पूरा करती है या नहीं, इसका आकलन करने के लिए विभिन्न दस्तावेज मांगे जा सकते हैं। यह संभव है कि किसी महिला को अपने निर्वाचन क्षेत्र के सांसद या विधायक का समर्थन मिले या न मिले।
वैसे भी, इस योजना में किसी संस्तुति पत्र की आवश्यकता का उल्लेख नहीं है।’’ याचिका में कहा गया है कि स्थानीय सांसद या विधायक से अनिवार्य रूप से संस्तुति पत्र प्राप्त करने की शर्त राजनीतिक प्रतिनिधियों को ‘‘मनमाना निर्णय लेने का अधिकार देती है’’ और कल्याणकारी योजना के लाभ को ‘‘राजनीतिक संरक्षण का माध्यम बना देती है।’’ जनहित याचिका के अनुसार, सरकार ने एक अगस्त को ऑनलाइन पंजीकरण पोर्टल शुरू करने के साथ ही इस योजना को लागू किया। पोर्टल पर पंजीकरण के लिए संबंधित सांसद या विधायक का संस्तुति पत्र जमा करना अनिवार्य किया गया है। याचिका में कहा गया है कि ऐसी संस्तुति के लिए सांसदों या विधायकों के लिए न तो कोई निर्धारित समयसीमा है और न ही निर्णय लेने के स्पष्ट मानदंड।
इसके अलावा, संस्तुति पत्र जारी करने से इनकार किए जाने की स्थिति में कोई शिकायत निवारण व्यवस्था भी नहीं है।
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