मारुति सुजुकी की जुलाई में कुल बिक्री 34 प्रतिशत बढ़कर 2,41,421 इकाई पर
मारुति सुजुकी की जुलाई में कुल बिक्री 34 प्रतिशत बढ़कर 2,41,421 इकाई परमाता पार्वती और भगवान शिव का विवाह: कैसे पूरी हुई हिमालय पुत्री की कठोर तपस्या
Lord Shiva and Parvati marriage story: पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती द्वारा अपने पिता दक्ष के यज्ञ कुंड में योगाग्नि द्वारा शरीर त्यागने के बाद भगवान शिव अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने पूरी तरह वैराग्य अपनाकर गहरी समाधि ले ली। इधर, सती ने राजा हिमालय और रानी मैनावती के यहां पुत्री पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। बचपन से ही माता पार्वती के मन में भोलेनाथ के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति थी। वह जानती थीं कि उनके पूर्व जन्म के स्वामी शिव ही हैं और उन्हें इस जन्म में भी उन्हीं को अपना पति बनाना है।
पार्वती की कठोर तपस्या और परीक्षा
जब पार्वती बड़ी हुईं, तो नारद मुनि ने उन्हें सलाह दी कि केवल सच्ची भक्ति से ही शिव को रिझाया जा सकता है। इसके बाद माता पार्वती ने राजमहल के सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया और घने जंगलों में जाकर अत्यंत कठोर तपस्या शुरू की।
उन्होंने कई वर्षों तक कड़ाके की ठंड, चिलचिलाती धूप और मूसलाधार बारिश को सहन किया। शुरुआती समय में वे कंद-मूल और फल खाकर रहीं, लेकिन बाद में उन्होंने सूखे बेलपत्र खाना भी छोड़ दिया, जिसके कारण उनका नाम 'अपर्णा' पड़ा। उनकी इस कठिन तपस्या को देखकर तीनों लोक हिल गए और अंततः भगवान शिव को अपनी समाधि तोड़कर उनकी परीक्षा लेनी पड़ी।
शिवजी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और पार्वती के पास पहुंचकर शिव की बुराइयां करने लगे—कहने लगे कि "वे श्मशान में रहते हैं, उनके पास धन-दौलत नहीं है और वे भूत-प्रेतों के साथ घूमते हैं। ऐसे वैरागी से विवाह करके तुम्हें क्या मिलेगा?"
लेकिन माता पार्वती अपने संकल्प पर अटल रहीं। उन्होंने ब्राह्मण रूपी शिव को स्पष्ट कर दिया कि उनका प्रेम और निष्ठा केवल भोलेनाथ के प्रति है, रूप या धन के लिए नहीं। पार्वती की अटूट निष्ठा और प्रेम को देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर उन्हें विवाह का वरदान दिया।
शिव-पार्वती का दिव्य विवाह
इसके बाद सप्तर्षियों की मध्यस्थता से हिमालय राज ने शिव और पार्वती के विवाह का प्रस्ताव स्वीकार किया। बारात में भगवान शिव के साथ उनके अजीबोगरीब गण- भूत, प्रेत, पिशाच, अघोरी और साधु-संत शामिल हुए, जिसे देखकर माता मैनावती और घराती थोड़े भयभीत भी हुए। लेकिन जब माता पार्वती और महादेव का विवाह संपन्न हुआ, तो पूरा ब्रह्मांड इस अलौकिक मिलन के आनंद में झूम उठा। यह विवाह त्याग, प्रेम और अटूट विश्वास का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई कथा पौराणिक ग्रंथों और शिव पुराण की मान्यताओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य पाठकों तक सनातन धर्म की पावन कथाओं और उनके संदेशों को पहुंचाना है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
IBC24
Haribhoomi



















