Manusmriti विवाद: Mallikarjun Kharge के बयान के बाद फिर चर्चा में आया यह ग्रंथ
मनुस्मृति, जिसे आधिकारिक तौर पर मानव-धर्म-शास्त्र के नाम से जाना जाता है, एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ है। इसका रचनाकाल दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी के बीच माना जाता है। यह ग्रंथ भारतीय समाज में अक्सर राजनीतिक बहसों और विवादों का विषय बनता रहा है।
मनुस्मृति क्या है?
मनुस्मृति को हिंदू धर्म के स्मृतियों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह मनु द्वारा कथित तौर पर दिए गए उपदेशों का संग्रह है, जिसमें समाज के विभिन्न पहलुओं, जैसे कि कानून, नैतिकता, कर्तव्य, जीवन शैली और सामाजिक व्यवस्था का वर्णन है। इसमें वर्ण व्यवस्था, विवाह, विरासत, अपराध और दंड जैसे विषयों पर भी विस्तृत नियम दिए गए हैं।
विवाद का इतिहास
मनुस्मृति अपने सामाजिक विचारों, विशेषकर जाति व्यवस्था और महिलाओं की स्थिति पर दिए गए निर्देशों के कारण लंबे समय से आलोचना का शिकार होती रही है। कई समाज सुधारकों और विद्वानों ने इसे लैंगिक असमानता और सामाजिक भेदभाव का आधार माना है। भारत में, विशेष रूप से बी.आर. अम्बेडकर जैसे नेताओं ने मनुस्मृति की कड़ी आलोचना की और इसे जलाने का आह्वान भी किया था।
राजनीतिक बहस का केंद्र
हाल ही में, कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने मनुस्मृति को पाठ्यक्रम में शामिल करने का विरोध किया, जिसके बाद यह मुद्दा फिर से गरमा गया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने खरगे के बयान पर आपत्ति जताई है। यह विवाद दर्शाता है कि प्राचीन ग्रंथ आज भी भारतीय राजनीति और समाज में कितनी प्रासंगिकता रखते हैं और कैसे उन पर अलग-अलग राजनीतिक दल अपने विचार रखते हैं।
विभिन्न दृष्टिकोण
जहां कुछ लोग मनुस्मृति को भारतीय संस्कृति और समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं, वहीं अन्य इसे प्रतिगामी और अन्यायपूर्ण मानते हैं। यह ग्रंथ विभिन्न व्याख्याओं और दृष्टिकोणों के कारण लगातार चर्चा और बहस का विषय बना रहता है।
Cauvery dispute सुलझाना PM Modi का बुनियादी कर्तव्य: बी मणिकम टैगोर
कांग्रेस की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष बी. मणिकम टैगोर ने शुक्रवार को पीएमके प्रमुख अंबुमणि रामदास पर कावेरी जल विवाद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को घसीटने का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना की। टैगोर ने कहा कि राज्यों के बीच के इस मुद्दे को सुलझाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बुनियादी कर्तव्य और ज़िम्मेदारी है। लोकसभा सदस्य टैगोर ने एक बयान में अंबुमणि के हालिया बयान का जवाब दिया।
अंबुमणि ने राहुल गांधी को उनकी एक अगस्त की चेन्नई यात्रा से पहले कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना का विरोध करने की चुनौती दी थी। टैगोर ने दावा किया,‘‘ अंबुमणि ने घोषणा की थी कि अगर राहुल गांधी जलाशय के निर्माण का विरोध करते हैं, तो पीएमके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से बाहर निकलने के लिए तैयार रहेगी।’’ अंबुमणि के बयान को गैर-जरूरी और राजनीति से प्रेरित बताते हुए, टैगोर ने कहा कि पानी छोड़ने के आदेश को लागू करने की पूरी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की है। उन्होंने कहा, ‘‘इस साल कम बारिश की वजह से तमिलनाडु को कावेरी का तय हिस्सा नहीं मिल पाया है।’’ उन्होंने बताया कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण ने कर्नाटक को अगले 15 दिनों तक रोज़ाना 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का आदेश दिया है।
टैगोर ने कहा कि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बातचीत करना और प्राधिकरण के निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना प्रधानमंत्री मोदी का कर्तव्य है। कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि ‘तमिलनाडु के लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री इस कर्तव्य को निभाने में विफल हो रहे हैं।’’ टैगोर ने कहा कि चूंकि अंबुमणि रामदास सत्तारूढ़ राजग सदस्य एवं राज्यसभा सदस्य हैं तथा उनकी प्रधानमंत्री तक सीधी पहुंच है, इसलिए विपक्ष के नेता को निशाना बनाने के बजाय उन्हें प्रधानमंत्री मोदी एवं केंद्रीय जलशक्ति मंच से मिलना चाहिए तथा अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर तमिलनाडु के लिए इंसाफ एवं पानी सुनिश्चित करना चाहिए। उन्होंने अंबुमणि से अपील की कि वह ‘ओछी राजनीति’ करने के जाय केंद्र के समक्ष एकजुट मोर्चा पेश करने के लिए तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों के साथ हाथ मिलाएं।
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