Shani Dosha Remedies: सावन में शनिदेव और राहु-केतु के दोष से राहत के लिए करें ये आसान उपाय, महादेव की मिलेगी कृपा
सावन के दौरान भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, इस महीने महादेव की आराधना करने से व्यक्ति को कई तरह की परेशानियों से मानसिक राहत मिलती है। खासतौर पर शनि, राहु और केतु से जुड़े दोषों के लिए सावन में कुछ विशेष पूजा और दान के उपाय बताए जाते हैं।
शनि दोष के लिए करें ये उपाय
मान्यता के अनुसार सावन के सोमवार या शनिवार को शिवलिंग पर काले तिल मिले जल से अभिषेक किया जा सकता है। इसके बाद भगवान शिव को शमी के पत्ते अर्पित करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करें।
शनिवार को सरसों के तेल का दान करना या शनि मंदिर में तेल का दीपक जलाना भी धार्मिक परंपराओं में शुभ माना जाता है। इन उपायों को श्रद्धा और अपनी सामर्थ्य के अनुसार करने की मान्यता है।
राहु-केतु के लिए शिव पूजा
राहु और केतु से जुड़े प्रतिकूल प्रभावों के लिए शिवलिंग पर कच्चे दूध में काले तिल मिलाकर अभिषेक करने की धार्मिक मान्यता है। भगवान शिव को धतूरा और दूर्वा अर्पित करने की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है। इसके अलावा महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने को भी शुभ माना जाता है। श्रद्धालु अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार मंत्र जाप कर सकते हैं।
रुद्राभिषेक भी माना जाता है शुभ
सावन में पंचामृत से रुद्राभिषेक करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में इसे भगवान शिव की विशेष आराधना माना गया है। इसी तरह शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने और वृक्ष की परिक्रमा करने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है।
इन उपायों का क्या महत्व है?
ध्यान रखें कि ये उपाय धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके प्रभाव का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। फिर भी श्रद्धालु सावन में पूजा-पाठ, मंत्र जाप, दान और सेवा को आस्था के साथ करते हैं। पूजा के दौरान अपनी परंपरा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।
'जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है': बागेश्वर धाम में धीरेंद्र शास्त्री के सानिध्य का अनुभव वृत्तांत
हरिभूमि के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी का विशेष अनुभव वृत्तांत
बागेश्वर धाम की यात्रा केवल एक धार्मिक स्थल तक पहुंचने का अनुभव नहीं, बल्कि गढ़ा गांव और आसपास के क्षेत्र में आए बदलाव को करीब से देखने का अवसर भी है। पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री से मुलाकात और उनके सहज व्यक्तित्व को करीब से देखने के बाद एक बात बार-बार मन में आती है-
'जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।'
तीन दिन पहले सोशल मीडिया पर अपने एक छायाचित्र के साथ अनायास ही एक पोस्ट लिखा था, “जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।” यह वाक्य जीवन के अनुभव पर ही आधारित था। बीते कल उसी अनुभव से एक बार फिर गुजरने का अवसर मिला। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के गढ़ा गांव जाने का अवसर मिला, जहां पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का जन्म हुआ। वही गढ़ा, जिसे आज बागेश्वर धाम के रूप में राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है।
एक दशक पहले तक यह इलाका देश के उन पिछड़े और बुनियादी सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में गिना जा सकता था, जहां सामान्य जरूरतों के लिए भी लोगों को संघर्ष करना पड़ता था। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र में विकास की गति बहुत धीमी थी। लेकिन एक दशक के भीतर इस गांव और पूरे इलाके की दशा और दिशा, दोनों बदल गई हैं।
इस बदलाव को समझने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत नहीं। गांव में प्रवेश करते ही तस्वीर सामने दिखाई देने लगती है।
जिस गांव में कभी चाय पीने के लिए एक छोटी सी टपरी ढूंढना भी मुश्किल रहा होगा, आज वहां होटल, मोटल, धर्मशालाएं और भोजनालय बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं। गांव की मूल आबादी से कई गुना अधिक लोग प्रतिदिन यहां आते जाते हैं। यह संख्या कभी कभी हजारों से लाखों में भी तब्दील हो जाती है। एक छोटे से गांव का इस तरह तीर्थस्थल और आस्था के बड़े केंद्र में बदल जाना अपने आप में असाधारण घटना है।
और इसके केंद्र में है एक व्यक्ति
एक ऐसा व्यक्ति, जिसने स्वयं अत्यंत साधारण, अभावग्रस्त और संघर्षशील परिवार में जन्म लिया। दारिद्र्य और अभावग्रस्त जीवन में जो भी दुखों की कल्पना की जा सकती है, वह उन्होंने बालपन में ही भोगे हैं। अपनी मां को महज एक साड़ी में महीनों गुजारते देखने को भी वह विवश रहे। पूर्व जन्म के सत्कर्म के चलते किशोरावस्था में ही ईश्वर की कृपा ने उन्हें वह शक्तियां प्रदान कीं और ऐसी ऊंचाई दी कि आज हजारों लाखों लोग उनके माध्यम से भगवान तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। अपने दुख दर्द के निवारण और उम्मीद आकांक्षा की पूर्ति के लिए उन्हें ही माध्यम माने हुए हैं। यह पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का प्रभाव है।
उनके प्रति लोगों की आस्था और श्रद्धा को देखकर कई बार यह महसूस होता है कि लोग उनमें ही ईश्वर की छवि तलाशने लगते हैं। कोई उनके चरणों की धूल अपने शीश पर लगाकर स्वयं को धन्य मानता है, तो कोई केवल एक बार उनका सानिध्य तो छोड़िए, दर्शन मात्र से अपने आपको सौभाग्यशाली समझता है। ऐसे में व्यक्ति से स्वयं को ईश्वर मान लेने की भूल सहज ही हो जाती है, लेकिन धीरेंद्र शास्त्री जी अपने आपको इस भ्रम से अभी तक बचाए हुए हैं। वह अच्छा मनुष्य होने की प्रक्रिया में ही हैं।
अपने शुरुआती जीवन की कठिनाइयों और विपदाओं को वह भूले नहीं हैं। पांच सितारा सुविधाएं, लंबी लंबी गाड़ियों के काफिले, चार्टर विमान की कतारें, शीर्ष राजनेताओं और सफल उद्योगपतियों की उनके समक्ष निरंतर दंडवत उपस्थिति के बीच वह समाज के वंचित दमित जनजीवन को भूलते नहीं हैं। आज भी हर रोज अठारह घंटे के श्रम और पांच से हजार नए लोगों के साथ मुलाकात को वह अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए हुए हैं।
इस पूरे आभामंडल के बीच जो दो बातें सबसे अधिक प्रभावित करती हैं, वह है उनकी जीवन को लेकर विद्वता और आचरण में सहजता। सहज बने रहना कोशिश के तहत नहीं, स्वाभाविक है। विद्वता का बोध तो उनके मुख से निकले बोलों से सहज ही हो जाता है। गत दिवस उनका लगभग डेढ़ घंटे का सानिध्य मिला। इस दौरान कहीं भी ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि सामने बैठा व्यक्ति अपनी प्रसिद्धि, उपलब्धियों या प्रभाव का बोध करा रहा हो। न अहंकार का प्रदर्शन, न उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को देने की कोशिश। बार बार एक ही भाव सामने आया, “जो कुछ है, बालाजी की कृपा से है। और समाज से जो मिला है, उसे समाज को और बेहतर तरीके से लौटाना है।”
शायद यही भाव उनके काम की दिशा भी तय करता है।
जो लोग अपनी परेशानियां, अपने दुख और अपनी उम्मीदें लेकर उनके पास आते हैं, उनके लिए कुछ करने की कोशिश लगातार दिखाई देती है। आदिवासी बहुल और बुनियादी सहूलियत से भी वंचित इलाके में उनके द्वारा कैंसर अस्पताल जैसे बड़े प्रकल्प की स्थापना का प्रयास इसी सोच का विस्तार है। शिक्षा और भारतीय संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए गुरुकुल की स्थापना भी इसी कोशिश का हिस्सा है। भारतीय परंपरा में गाय केवल एक पशु नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और वैदिक चेतना का अभिन्न हिस्सा रही है। इसी भाव से यहां गौशाला का संचालन भी जारी है, जहां पुंगनूर जैसी दुर्लभ प्रजाति की गायें भी मौजूद हैं।
इन सबको केवल निर्माण कार्यों की सूची के रूप में देखना शायद उचित नहीं होगा। इनके पीछे एक ऐसी सोच दिखाई देती है, जिसमें अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और समाज के प्रति दायित्व को निभाने की कोशिश है। यह सब उस व्यक्ति के द्वारा है, जिसने अभी जीवन के तीन दशक भी पूरे नहीं किए हैं और दुनिया को चमत्कृत कर देने वाला प्रभाव पैदा कर दिया है।
इस चमत्कार और हजारों लोगों की भीड़ के बीच उनसे एकांत में इत्मीनान से मुलाकात में करिश्माई आध्यात्मिक व्यक्तित्व से मिलने के साथ ही एक अल्हड़ युवा से मिलने जैसा अनुभव भी था।
बिंदास हंसी, बेफिक्र अंदाज और ताली बजाकर जोरदार ठहाके। इसके साथ ही चेहरे पर स्थायी रूप से विराजमान मंद मंद मुस्कान। गंभीर से गंभीर विषय को भी सहजता से कहना, गूढ़ बात को भी मुस्कराते हुए समझा देना और बात बात में ठहाका लगा देना, यही वह अंदाज है जो धीरेंद्र शास्त्री को सामान्य से अलग करता है। अन्य संतों के चेहरे पर दिखने वाली गंभीरता से बिल्कुल उलट उनका यह अंदाज उन्हें और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
गहरी बात सहजता से कह देने का उनका यह अंदाज तब भी दिखा, जब चर्चा के दौरान किसी प्रसंग पर उन्होंने कहा कि कार्य अच्छा या बुरा होने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह किस उद्देश्य से किया जा रहा है। यज्ञ तो गुरु विश्वामित्र जी और लंकापति रावण दोनों ने ही किया था। जगत कल्याण की भावना से वशीभूत होकर विश्वामित्र जी जब यज्ञ कर रहे थे तो राम जी धनुष बाण लेकर स्वयं उसकी रक्षा के लिए खड़े हो गए। वहीं अनाचार के लिए शक्ति पाने के उद्देश्य से रावण यज्ञ करा रहा था तो राम जी ने उसका विध्वंस करा दिया। इसलिए उद्देश्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
एक तरफ लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बना व्यक्तित्व। दूसरी तरफ उसी व्यक्तित्व में दिखाई देती सहजता, मस्ती और अल्हड़पन।
इतनी प्रसिद्धि, इतना सम्मान, इतना सामर्थ्य और इतना बड़ा आभामंडल मिलने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति अपने भीतर यह भाव बचाकर रख सके कि “मैं नहीं, सब कुछ बालाजी और संन्यासी बाबा की कृपा से है”, तो यह अपने आप में सराहनीय भी है और वंदनीय भी है।
गढ़ा गांव की यात्रा और पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी का सानिध्य एक बार फिर इस बात को प्रमाणित कर गया कि जीवन में उपलब्धियां कितनी बड़ी हैं, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन उपलब्धियों का श्रेय हम किसे देते हैं और उनसे प्राप्त शक्ति का उपयोग किसके लिए और किस तरह करते हैं। और शायद इसीलिए तीन दिन पहले लिखी वह पंक्ति अपने आपको प्रमाणित करते हुए महसूस हुई कि, “जो कुछ भी है, ईश्वर की कृपा से है।”
भगवान और भक्त बने आस्था के केंद्र
आज दुनिया जिस स्थान को बागेश्वर धाम के नाम से पुकारती है, दरअसल वह छतरपुर जिले के छोटे से गांव गढ़ा में स्थित दो देवालयों से अपनी मूल पहचान पाता है। यहां एक ओर महादेव हैं, शिवलिंग के स्वरूप में। महादेव के दर्शन करते हुए अद्भुत अनुभूति होती है। शिवलिंग को देखकर ऐसा लगता है मानो आप स्वयं काशी विश्वनाथ के स्वरूप के दर्शन कर रहे हों। इस शिवलिंग के सम्मुख सदैव दीपक के माध्यम से प्रकाश रहता है। स्थानीय मान्यता है कि यहां विद्युत बल्ब प्रभावी नहीं रहते और दीपक की परंपरा निरंतर बनी हुई है।
महादेव से कुछ ही दूरी पर हनुमान जी की प्रतिमा है। यही वह बालाजी हैं, जिनकी सेवा में आज पंडित धीरेंद्र शास्त्री स्वयं को समर्पित मानते हैं। वास्तव में बागेश्वर धाम की पहचान भी इसी बालाजी महाराज के नाम से जुड़ी हुई है।
लेकिन आज जब देश के कोने कोने से लोग यहां पहुंच रहे हैं, तो यह समझना कठिन हो जाता है कि कितने लोग बालाजी के दर्शन के लिए आ रहे हैं और कितने धीरेंद्र शास्त्री से मिलने की इच्छा लेकर। शायद यही ईश्वर की कृपा का सबसे बड़ा प्रमाण है कि एक संत और पीठाधीश्वर स्वयं उस आस्था के पर्याय बन गए हैं, जिसकी मूल शक्ति उनके आराध्य में है।
ईश्वर की कृपा क्या होती है, इसका सबसे सुंदर उदाहरण राम और हनुमान के संबंध में दिखाई देता है। राम की कृपा हुई तो हनुमान केवल सेवक नहीं रहे, वे स्वयं भगवान के स्वरूप में पूजे जाने लगे। यही तो ईश्वर की कृपा है, जब साधक और उसकी साधना स्वयं आस्था का केंद्र बन जाए।
कुछ कुछ ऐसी ही स्थिति आज बागेश्वर धाम में दिखाई देती है।
लेकिन जितनी तेजी से यहां श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है, उस अनुपात में व्यवस्थाएं अभी दिखाई नहीं देतीं। सरकार और प्रशासन के स्तर पर यहां विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। बेहतर सड़कें, यातायात व्यवस्था, स्वच्छता, ठहरने की सुविधाएं और श्रद्धालुओं के लिए समुचित आधारभूत ढांचा, इन सब पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।
गढ़ा की गलियों और रास्तों से गुजरते हुए कई जगह यह महसूस होता है कि जिस गति से आस्था यहां लोगों को खींच रही है, उस गति से व्यवस्थाएं अभी पीछे हैं।
भविष्य में यदि यह स्थान शिरडी या कैंची धाम जैसे बड़े धार्मिक केंद्र का स्वरूप ग्रहण कर ले, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। आस्था की शक्ति किसी साधारण से स्थान को असाधारण ऊंचाई तक पहुंचा सकती है।
बागेश्वर धाम आज केवल वर्तमान की कहानी नहीं है। यह भविष्य की एक बड़ी संभावना का संकेत भी दे रहा है। इस संभावना के केंद्र में हैं, बालाजी महाराज, उनकी कृपा और उस कृपा को जन जन तक पहुंचाने वाले धीरेंद्र शास्त्री।
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