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उत्तराखंड में स्टार्टअप को नई उड़ान, युवाओं के नवाचार को सरकार का सहारा, बना 200 करोड़ का वेंचर फंड

Uttarakhand Startups: उत्तराखंड में युवाओं के नए आइडिया और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि सरकार प्रदेश के युवाओं के नवाचार, प्रतिभा और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करते हुए उत्तराखंड के स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करने पर काम कर रही है. सरकार का जोर ऐसे युवाओं को आगे लाने पर है, जो अपने नए विचारों को कारोबार में बदलकर खुद रोजगार पाने के साथ दूसरे लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा कर सकें.

मुख्यमंत्री के मुताबिक, उत्तराखंड में स्टार्टअप के क्षेत्र में लगातार विस्तार हो रहा है. वर्तमान में प्रदेश में भारत सरकार से मान्यता प्राप्त 1,300 से अधिक स्टार्टअप संचालित हो रहे हैं. इसके अलावा राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त 200 से अधिक स्टार्टअप भी प्रदेश में काम कर रहे हैं. बड़ी संख्या में स्टार्टअप का संचालन इस बात का संकेत है कि उत्तराखंड के युवा अब पारंपरिक रोजगार के साथ-साथ नए कारोबार और इनोवेशन की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं.

युवाओं के आइडिया को आर्थिक मदद

स्टार्टअप शुरू करने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक शुरुआती दौर में पूंजी की कमी होती है. कई बार अच्छा आइडिया होने के बावजूद पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं मिलने से युवा अपने कारोबार को आगे नहीं बढ़ा पाते. इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार ने 200 करोड़ रुपये के वेंचर फंड की स्थापना की है.

इस फंड का उद्देश्य युवाओं के नवाचार और नए उद्यमों को जरूरी वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराना है. इससे ऐसे युवाओं को अपने आइडिया को विकसित करने, कारोबार शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जिनके पास बेहतर योजना तो है, लेकिन शुरुआती निवेश की कमी है.

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रोजगार के नए अवसर पैदा करने पर जोर

सरकार का मानना है कि स्टार्टअप सिर्फ कारोबार शुरू करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके जरिए प्रदेश में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए जा सकते हैं. एक सफल स्टार्टअप आगे चलकर कई लोगों को रोजगार दे सकता है. इससे युवाओं को अपने ही राज्य में काम करने और दूसरों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने का अवसर मिल सकता है.

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में स्टार्टअप को बढ़ावा देना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे युवाओं को स्थानीय स्तर पर नए व्यवसाय शुरू करने के विकल्प मिल सकते हैं. पर्यटन, कृषि, तकनीक, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और स्थानीय उत्पादों जैसे क्षेत्रों में नए विचारों को कारोबार का रूप देने की संभावनाएं हैं.

स्थानीय प्रतिभा को मिल रहा मंच

उत्तराखंड में प्रतिभा की कमी नहीं है. जरूरत इस बात की है कि युवाओं को अपने आइडिया पर काम करने के लिए सही मंच, मार्गदर्शन और आर्थिक सहयोग मिले. सरकार की ओर से स्टार्टअप इकोसिस्टम को मजबूत करने की कोशिश इसी दिशा में एक कदम के तौर पर देखी जा रही है.

भारत सरकार से मान्यता प्राप्त 1,300 से अधिक और राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त 200 से अधिक स्टार्टअप का आंकड़ा बताता है कि प्रदेश में उद्यमिता को लेकर युवाओं की रुचि बढ़ रही है. आने वाले समय में इन स्टार्टअप को बेहतर सुविधाएं और वित्तीय सहायता मिलने से नए क्षेत्रों में भी कारोबार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं.

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‘नौकरी मांगने’ से ‘नौकरी देने’ की ओर बढ़ते युवा

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अनुसार, सरकार की कोशिश है कि प्रदेश के युवा सिर्फ नौकरी की तलाश करने वाले न रहें, बल्कि नौकरी देने वाले उद्यमी भी बनें. युवाओं के नए विचारों और उनकी प्रतिभा को सही दिशा देकर उत्तराखंड को स्टार्टअप के क्षेत्र में मजबूत बनाया जा सकता है.

200 करोड़ रुपये के वेंचर फंड और बड़ी संख्या में मान्यता प्राप्त स्टार्टअप के साथ उत्तराखंड में स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में आधार तैयार हो रहा है. सरकार का फोकस युवाओं को अवसर देने, उनके नए विचारों को प्रोत्साहित करने और प्रदेश में उद्यमिता के लिए बेहतर माहौल बनाने पर है. इससे आने वाले वर्षों में उत्तराखंड के युवाओं के लिए नए कारोबार, रोजगार और आत्मनिर्भरता के अवसर और बढ़ने की उम्मीद है.

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मुंबई के दो डॉक्टरों को मिलेगा पाकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान, शहबाज शरीफ ने की जमकर तारीफ; जानें कारण

पाकिस्तान से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है. पाकिस्तान भारत के दो डॉक्टरों को अपने देश का सर्वोच्च सम्मान देने वाला है. ये सम्मान दोनों डॉक्टरों को 1947 के वक्त पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की जानलेवा बीमारी की जानकारी को गुप्त रखने के लिए मिल रहा है. दोनों डॉक्टर मुंबई के रहने वाले हैं. 

पाकिस्तान ने भारतीय डॉक्टर जल रतनजी पटेल और रेडियोलॉजिस्ट डॉक्टर जल धायभो-कू को निशान-ए-इम्तियाज सम्मान के लिए नॉमिनेट किया है. बता दें, निशान-ए-इम्तियाज ही पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है. पाकिस्तान के केंद्रीय प्लानिंग, डेवलपमेंट और स्पेशल इनिशियेटिव मंत्री और अवार्ड समिति के प्रमुख अहसान इकबाल ने कहा कि ये सम्मान डॉक्टरों को उनकी शांत लेकिन असाधारण सेवा के लिए दिया जा रहा है क्योंकि आजादी के वक्त उन्होंने सुनिश्चित किया की जिन्ना की गंभीर बीमारी की जानकारी सिर्फ उनके करीबी लोगों तक ही सीमित रहे. बता दें, दोनों ही डॉक्टर पारसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.

बीमारी के बारे में पता चल जाता तो क्या होता?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अहसन ने कहा कि डॉ. पटेल और डॉ. कू ने 1946 में जिन्ना के एक्स-रे की जांच की थी और पाया था कि उनकी टीबी की बीमारी काफी ज्यादा बढ़ गई थी. उनके पास जीने के लिए सिर्फ एक-दो साल का ही वक्त बचा था लेकिन उनकी बीमारी की गंभीरता के बारे में पेशेवर गोपनीयता बनाए रखी है. यह एक ऐसा राज है, जिसके बारे में कई इतिहासकारों का मानना था कि अगर ये पता चल जाता है तो बंटवारे और पाकिस्तान के बनने का समय बदल सकता है. 

पाकिस्तानी मंत्री ने की डॉक्टरों की तारीफ

इकबाल ने कहा कि अवार्ड्स कमेटी के चेयरमैन के रूप में मुझे दो बेहतरीन डॉक्टरों एक फिजिशियन और एक रेडियोलॉजिस्ट को निशान-ए-इम्तियाज के लिए नॉमिनेट करने का सौभाग्य मिला. दोनों डॉक्टर बॉम्बे के पारसी समुदाय से थे. दोनों ने कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना की लाइलाज बीमारी की बात को पूरी ईमानगदारी के साथ गुप्त रखा था. खास वक्त पर पेशेवर गोपनीयता बनाकर रखा, जो डॉक्टरों की आसाधारण सेवा थी. अपनी पेशेवर शपथ के प्रति उनकी निष्ठा अनजाने में ही उन हालात में एक अहम योगदान बन गई, जिस वजह से पाकिस्तान का बनना आसान हो सका. 

पाकिस्तान की ओर से डॉ. पटेल और डॉ. धायभो को ये सम्मान जिन्नाकी मौत के 78 साल बाद दिया जा रहा है. मार्च 2027 में एक समारोह में उनको मरणोपरांत औपचारिक रूप से सम्मान दिया जाएघा. 

जिन्ना की बीमारी के बारे में

पाकिस्तानी लेखक और इतिहासकार अकबर अहमद अपनी किताब जिन्ना, पाकिस्तान एंड इस्लामिक आइडेंटिटी: द सर्च फॉर सलादीन में कहते हैं कि जिन्ना 1930 के दशक से ही टीबी से पीड़ित थे. ये बातें सिर्फ उनके कुछ करीबी लोगों को ही पता थी, जिनमें उनकी बहन फातिमा जिन्ना भी शामिल थीं. उस वक्त टीबी को जानलेवा बीमारी कहा जाता था. इसका असरदार कोई भी एंटीबायोटिक इलाज नहीं था. कहा जाता है कि जिन्ना ने अपनी बीमारी की गंभीरता के बारे में लोगों से बातें छिपाई थी. क्योंकि उनको डर था कि इससे उनकी राजनीतिक छवि को नुकसान हो सकता है. 

बता दें, आजादी के वक्त साल 1947 में जिन्ना का स्वास्थ्य बहुत ज्यादा खराब हो गई थी. बंटवारे के एक साल से कुछ ही वक्त बाद 11 सितंबर 1948 को उनकी मौत हो गई थी. 

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  Sports

ऐसा मौका बार-बार नहीं आता पडिक्कल! सिर्फ 5 रन से इतिहास रचने से चूके, टूट जाता द्रविड़ का महारिकॉर्ड

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