कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने गुरुवार को कहा कि अगर संसद के आगामी मॉनसून सत्र में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक को फिर से पेश किया जाता है, तो पार्टी इसका पुरजोर विरोध करेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार एक ऐसे उपाय के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है, जिसे पहले लोकसभा में ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था। कांग्रेस संसदीय रणनीति समूह की बैठक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, रमेश ने कहा कि पार्टी ने उन बिलों पर विस्तार से चर्चा की है जिन्हें सत्र के दौरान पेश किए जाने की संभावना है। उन्होंने कहा कि पार्टी को अभी तक सरकार का आधिकारिक विधायी एजेंडा नहीं मिला है और 19 जुलाई को होने वाली सर्वदलीय बैठक में उन्हें इसकी जानकारी मिलेगी।
कांग्रेस नेता ने कहा कि हमने सुना है कि गृह मंत्री परिसीमन बिल को फिर से लाने की कोशिश कर रहे हैं। 17 अप्रैल को सरकार को इस बिल के लिए दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया था, जो एक बड़ी हार थी। वे उस बिल को वापस लाना चाहते हैं। पार्टी का रुख दोहराते हुए रमेश ने कहा कि कांग्रेस पार्टी का रुख हमेशा से साफ रहा है: हम परिसीमन बिल का पुरजोर विरोध करेंगे और आगे भी ऐसा करते रहेंगे। हम सभी विपक्षी दलों के बीच एकता बनाए रखने की हर संभव कोशिश करेंगे।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विपक्षी दलों में फूट डालकर कानून पास कराने के लिए ज़रूरी संख्या जुटाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि यह सच है कि 17 अप्रैल से गृह मंत्री ने एक या दो विपक्षी पार्टियों में फूट डलवाई है। यह संविधान का अपमान है। वे चालाकी से दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसी चालाक चालों और दूसरी पार्टियों को तोड़कर दो-तिहाई बहुमत हासिल करना संविधान का अपमान है; यह एक दागदार बहुमत होगा। हालांकि, लोकसभा में उनके दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोई संभावना नहीं है।
उन्होंने कहा कि हम विपक्षी पार्टियों के संपर्क में हैं; राहुल गांधी संपर्क में हैं, और हमारे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी उन सभी पार्टियों के संपर्क में हैं जिन्होंने 16 और 17 अप्रैल को परिसीमन बिल का पुरज़ोर विरोध किया था। महिला आरक्षण कानून का ज़िक्र करते हुए रमेश ने कहा कि कांग्रेस महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन करती है, लेकिन इसे प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने का विरोध करती है।
उन्होंने कहा कि हमने पहले भी, 16 और 17 अप्रैल को, मौजूदा लोकसभा में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने के बारे में अपना रुख़ साफ़ किया है। 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023' में महिलाओं के लिए इस एक-तिहाई आरक्षण का प्रावधान शामिल है... अगर आप 543 सदस्यों वाली लोकसभा का एक-तिहाई हिस्सा निकालें, तो यह 181 होता है। इसलिए, महिलाओं के आरक्षण का प्रावधान लाइए और हम पूरा समर्थन देंगे। हालाँकि, जो परिसीमन बिल पेश किया गया था, उसे भले ही महिला आरक्षण अधिनियम का नाम दिया गया था, लेकिन असल में वह महिला आरक्षण की आड़ में लाया गया एक खतरनाक परिसीमन बिल था।
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देशभर में अनिवार्य रूप से ई20 (20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित) पेट्रोल की बिक्री शुरू होने के बाद उसके प्रभाव को लेकर चल रही बहस अब एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ पर पहुंच गई है। छत्तीसगढ़ के रायपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने मारुति सुजुकी और उसके डीलर को एक ग्राहक की ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड एसयूवी वापस लेकर उसी मॉडल की नई कार देने का आदेश दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है, जब केंद्र सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि ई20 पेट्रोल से इंजन को किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता और इसके खिलाफ चल रहा अभियान भ्रामक तथा राजनीतिक रूप से प्रेरित है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, रायपुर निवासी 41 वर्षीय डॉ. प्रेमराज देवता ने आयोग में शिकायत दर्ज कराई थी कि उन्होंने मारुति सुजुकी ग्रैंड विटारा स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड जेटा प्लस खरीदी थी, लेकिन ई20 पेट्रोल के व्यापक इस्तेमाल के बाद वाहन में बार-बार तकनीकी समस्याएं आने लगीं। उनका आरोप था कि वाहन खरीदते समय उन्हें यह नहीं बताया गया कि उनकी कार पूरी तरह ई20 ईंधन के अनुकूल नहीं है। शिकायत में डीलर नेक्सा मैग्नेटो (स्काई ऑटो मोबाइल) और मारुति सुजुकी इंडिया लिमिटेड दोनों को पक्षकार बनाया गया।
आयोग के अध्यक्ष प्रशांत कुंडू और सदस्य डॉ. आनंद वर्गीज की पीठ ने मामले की सुनवाई के बाद निर्माता और डीलर को सेवा में कमी का दोषी माना। आयोग ने आदेश दिया कि दोनों पक्ष 45 दिनों के भीतर शिकायतकर्ता की कार वापस लेकर उसी मॉडल की ई20 संगत नई कार उपलब्ध कराएं। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो वाहन की पूरी कीमत, आरटीओ शुल्क और बीमा प्रीमियम सहित कुल 20.50 लाख रुपये लौटाने होंगे। इसके अलावा मानसिक प्रताड़ना के लिए एक लाख रुपये तथा मुकदमे के खर्च के रूप में 10 हजार रुपये देने का भी आदेश दिया गया है। निर्धारित समय में भुगतान नहीं होने पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह ई20 ईंधन की अनुकूलता और वाहन कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं को दी जाने वाली जानकारी के मुद्दे को सीधे केंद्र में ले आता है। यदि ऐसे और मामले सामने आते हैं तो वाहन निर्माताओं और डीलरों की जिम्मेदारियों को लेकर व्यापक बहस तेज हो सकती है।
दूसरी ओर, बढ़ते विवाद के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर ई20 कार्यक्रम का जोरदार बचाव किया है। उन्होंने कहा कि देश 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य हासिल कर चुका है और अब ई20 पेट्रोल लगभग हर पेट्रोल पंप पर उपलब्ध है। यदि कोई उपभोक्ता शुद्ध 100 प्रतिशत पेट्रोल लेना चाहता है तो उसके लिए यह विकल्प उपलब्ध हो सकता है, लेकिन उसे अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विभिन्न प्रकार के ईंधन उपलब्ध कराने का अंतिम निर्णय पेट्रोलियम मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में आता है।
गडकरी ने ई20 से इंजन खराब होने के दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर इस विषय में गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि ई10 मानक वाले सभी वाहन ई20 ईंधन पर सुरक्षित रूप से चल सकते हैं और अब तक सरकार को इंजन क्षति की कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। उन्होंने दावा किया कि वाहन निर्माता कंपनियां भी ई20 का समर्थन कर रही हैं और वाहन वारंटी के साथ अपने उत्पाद बाजार में उतारती हैं। उन्होंने लोगों से समस्याएं होने पर सीधे मंत्रालय को लिखने की अपील की थी, लेकिन अब तक कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई।
माइलेज को लेकर उठ रहे सवालों पर गडकरी ने स्वीकार किया कि एथेनॉल की ऊष्मीय क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए ई20 इस्तेमाल करने पर माइलेज में मामूली कमी आ सकती है। हालांकि उनका कहना है कि शहरों के सामान्य ट्रैफिक में इसका असर लगभग महसूस नहीं होगा और केवल हाई-स्पीड ड्राइविंग के दौरान ही थोड़ा अंतर दिखाई दे सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी वाहन का वास्तविक माइलेज सामान्य उपभोक्ता स्वयं सटीक रूप से नहीं माप सकता, इसके लिए अधिकृत परीक्षण की आवश्यकता होती है।
एथेनॉल नीति को लेकर अपने परिवार के चीनी उद्योग से जुड़े होने के कारण उठे हितों के टकराव के आरोपों को भी गडकरी ने खारिज किया। उन्होंने कहा कि उनके पुत्रों का कारोबार स्वतंत्र रूप से संचालित होता है और एथेनॉल उसका केवल छोटा हिस्सा है। एथेनॉल की कीमत केंद्र सरकार का मंत्रिमंडल तय करता है, इसलिए इसमें उनका कोई प्रभाव नहीं है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि एथेनॉल उत्पादन अब केवल गन्ने तक सीमित नहीं है, बल्कि मक्का, चावल, फसल अवशेष और बांस जैसे स्रोतों से भी किया जा रहा है, जिससे किसानों को लाभ और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिल रहा है।
हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने एक अप्रैल से देशभर के पेट्रोल पंपों पर ई20 पेट्रोल की बिक्री अनिवार्य कर दी है। सरकार का कहना है कि इससे कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, किसानों की आय बढ़ेगी और प्रदूषण कम होगा। वहीं, कुछ वाहन मालिकों और विशेषज्ञों ने पुराने वाहनों की अनुकूलता, इंजन प्रदर्शन और माइलेज पर इसके असर को लेकर चिंता जताई है। इन आशंकाओं के बीच पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय हाल ही में 10 बिंदुओं का विस्तृत स्पष्टीकरण जारी कर चुका है, जिसमें वैज्ञानिक परीक्षणों, नियामकीय सुरक्षा उपायों और अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का हवाला देते हुए कहा गया है कि ई20 कार्यक्रम सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल है।
बहरहाल, रायपुर उपभोक्ता आयोग का ताजा फैसला और केंद्र सरकार का अडिग रुख इस बहस को और तेज कर सकता है। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि वाहन कंपनियां इस आदेश पर क्या रुख अपनाती हैं और क्या भविष्य में ई20 अनुकूलता को लेकर उपभोक्ताओं को अधिक स्पष्ट जानकारी देना उद्योग के लिए अनिवार्य मानक बनता है। फिलहाल तो यह मामला संसद के मॉनसून सत्र में उठाने की विपक्ष पूरी तैयारी कर चुका है। ऐसे में देखना होगा कि क्या विपक्ष के हमलों के बाद सरकार कोई राहत देती है या नहीं।
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