भारतीय ऑटोमोबाइल बाजार तेजी से बदल रहा है। कुछ साल पहले तक इलेक्ट्रिक स्कूटर को केवल छोटे सफर और कम खर्च वाले विकल्प के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज के आधुनिक ई-स्कूटर्स शानदार रेंज, दमदार परफॉर्मेंस, एडवांस टेक्नोलॉजी और प्रीमियम डिजाइन के साथ नए दौर की मोबिलिटी को परिभाषित कर रहे हैं। यही वजह है कि लग्जरी सेगमेंट में भी इलेक्ट्रिक स्कूटर्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
इलेक्ट्रिक स्कूटर्स में बढ़ रही है प्रीमियम सेगमेंट की मांग
अब ग्राहक केवल कम खर्च में सफर करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहन नहीं खरीद रहे हैं, बल्कि वे ऐसी मशीन चाहते हैं जो स्टाइल, टेक्नोलॉजी और आराम का बेहतरीन मिश्रण पेश करे। कई कंपनियां ऐसे हाई-एंड इलेक्ट्रिक स्कूटर्स बाजार में उतार रही हैं, जिनकी कीमत लाखों रुपये में है और फीचर्स किसी प्रीमियम कार से कम नहीं हैं।
BMW CE 04: भविष्य की झलक दिखाने वाला लग्जरी स्कूटर
अगर भारत के सबसे प्रीमियम इलेक्ट्रिक स्कूटर की बात करें तो BMW CE 04 इस सूची में सबसे ऊपर नजर आता है। इसका डिजाइन पारंपरिक स्कूटरों से बिल्कुल अलग है और पहली नजर में ही यह फ्यूचरिस्टिक व्हीकल का एहसास कराता है।
इसमें बैटरी को नीचे की तरफ लगाया गया है, जिससे स्कूटर का संतुलन बेहतर रहता है और राइडिंग अधिक स्थिर महसूस होती है। इसमें लिक्विड-कूल्ड इलेक्ट्रिक मोटर दी गई है, जो बेहतर प्रदर्शन देने में सक्षम है। कंपनी के मुताबिक यह स्कूटर एक बार फुल चार्ज होने पर लगभग 130 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकता है। इसकी एक्स-शोरूम कीमत करीब 15.25 लाख रुपये है।
BMW CE 02: शहर की सड़कों के लिए स्टाइलिश EV
जो लोग BMW ब्रांड का अनुभव लेना चाहते हैं, लेकिन अपेक्षाकृत कम कीमत वाला विकल्प तलाश रहे हैं, उनके लिए BMW CE 02 एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है। इस इलेक्ट्रिक स्कूटर को विशेष रूप से शहरी यात्राओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
इसमें करीब 15 bhp की पावर मिलती है। साथ ही फ्लो, सर्फ और फ्लैश जैसे अलग-अलग राइडिंग मोड, कीलेस एक्सेस, स्मार्टफोन कनेक्टिविटी और रिवर्स असिस्ट जैसी सुविधाएं इसे आधुनिक बनाती हैं। इसकी एक्स-शोरूम कीमत लगभग 4.49 लाख रुपये है।
TVS X: स्मार्ट टेक्नोलॉजी से लैस फ्लैगशिप स्कूटर
प्रीमियम इलेक्ट्रिक स्कूटर सेगमेंट में TVS X ने भी अपनी खास पहचान बनाई है। यह कंपनी का फ्लैगशिप ई-स्कूटर है, जिसमें आधुनिक तकनीक और आकर्षक डिजाइन का शानदार मेल देखने को मिलता है।
इसमें 4.4 kWh की बैटरी और 11 kW की इलेक्ट्रिक मोटर दी गई है। कंपनी का दावा है कि यह स्कूटर एक बार चार्ज करने पर करीब 140 किलोमीटर तक की दूरी तय कर सकता है। नेविगेशन, कनेक्टेड टेक्नोलॉजी और स्मार्ट इंफोटेनमेंट सिस्टम जैसे फीचर्स इसे टेक-लवर्स के लिए आकर्षक बनाते हैं। इसकी एक्स-शोरूम कीमत लगभग 2.66 लाख रुपये है।
सुजुकी ई-एक्सेस: रोजमर्रा की जरूरतों के लिए शानदार विकल्प
जो ग्राहक आरामदायक और व्यावहारिक इलेक्ट्रिक स्कूटर चाहते हैं, उनके लिए सुजुकी ई-एक्सेस एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। इसका डिजाइन सादगी और आकर्षण का बेहतरीन संतुलन पेश करता है।
इस स्कूटर में फ्रंट डिस्क ब्रेक, टेलीस्कोपिक फ्रंट सस्पेंशन और स्टाइलिश अलॉय व्हील्स दिए गए हैं, जो बेहतर हैंडलिंग और आरामदायक सफर सुनिश्चित करते हैं। इसकी एक्स-शोरूम कीमत लगभग 1.88 लाख रुपये रखी गई है।
आपके लिए कौन-सा प्रीमियम EV रहेगा सही?
अगर आप सबसे अलग दिखने वाला लग्जरी और एक्सक्लूसिव इलेक्ट्रिक स्कूटर खरीदना चाहते हैं तो BMW CE 04 आपके लिए बेहतरीन विकल्प है। वहीं BMW ब्रांड का अपेक्षाकृत किफायती अनुभव लेने के लिए CE 02 उपयुक्त रहेगा।
अगर आपकी प्राथमिकता लंबी रेंज, स्मार्ट फीचर्स और कनेक्टेड टेक्नोलॉजी है, तो TVS X एक मजबूत दावेदार साबित हो सकता है। वहीं रोजमर्रा की जरूरतों, आरामदायक राइडिंग और भरोसेमंद प्रदर्शन के लिए सुजुकी ई-एक्सेस एक व्यावहारिक विकल्प बनकर सामने आता है।
कुल मिलाकर, भारतीय बाजार में इलेक्ट्रिक स्कूटर्स अब सिर्फ ईंधन बचाने का माध्यम नहीं रह गए हैं, बल्कि वे स्टाइल, तकनीक और लग्जरी का नया प्रतीक बन चुके हैं।
- डॉ. अनिमेष शर्मा
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शहरों में बढ़ते ट्रैफिक और लंबी सिग्नल टाइमिंग के बीच रोजाना ड्राइव करने वाले लोगों के लिए रेड लाइट पर रुकना आम बात है। इस दौरान अधिकांश ड्राइवर अपनी कार को न्यूट्रल (N) गियर में डाल देते हैं। कई लोगों का मानना है कि ऐसा करने से इंजन पर दबाव कम पड़ता है और ईंधन की भी बचत होती है। लेकिन आधुनिक कारों की तकनीक के दौर में यह सोच पूरी तरह सही नहीं मानी जाती।
बदल गई है कारों की तकनीक
आज की कारें पहले की तुलना में कहीं ज्यादा स्मार्ट और एडवांस हो चुकी हैं। इनमें इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल यूनिट (ECU), एडवांस्ड फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम और ऑटो स्टार्ट-स्टॉप जैसी आधुनिक तकनीकें मौजूद हैं। ये सिस्टम कार के खड़े रहने पर खुद ही ईंधन की खपत को नियंत्रित कर लेते हैं।
ऐसे में केवल कुछ सेकंड के लिए न्यूट्रल गियर लगाने से कोई खास फायदा नहीं मिलता। उल्टा, बार-बार गियर बदलने की आदत कई बार अनावश्यक मैकेनिकल दबाव पैदा कर सकती है।
ऑटोमैटिक कारों में ज्यादा सावधानी जरूरी
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय बाजार में ऑटोमैटिक कारों की मांग तेजी से बढ़ी है। ट्रैफिक में आसान ड्राइविंग और बेहतर सुविधा के कारण लोग ऑटोमैटिक ट्रांसमिशन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
हालांकि, ऑटोमैटिक कार चलाने वाले ड्राइवरों को रेड सिग्नल पर एक खास बात का ध्यान रखना चाहिए। यदि आप हर छोटे सिग्नल पर गाड़ी को ड्राइव (D) से न्यूट्रल (N) में शिफ्ट करते हैं, तो ट्रांसमिशन सिस्टम को बार-बार री-एंगेज होना पड़ता है। इससे गियरबॉक्स के अंदर मौजूद क्लच और अन्य मैकेनिकल पार्ट्स पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
लंबे समय तक ऐसा करते रहने से कुछ पार्ट्स की घिसावट बढ़ सकती है और भविष्य में रिपेयरिंग का खर्च भी बढ़ सकता है।
क्या सच में बचता है फ्यूल?
कई ड्राइवर्स सालों से इस धारणा के साथ गाड़ी चलाते आ रहे हैं कि न्यूट्रल में गाड़ी रखने से ईंधन की बचत होती है। लेकिन नई पीढ़ी की कारों में यह फायदा लगभग न के बराबर है।
दरअसल, जब कार ड्राइव मोड में खड़ी रहती है, तब भी इंजन मैनेजमेंट सिस्टम जरूरत के अनुसार ईंधन की आपूर्ति को कम कर देता है। यही कारण है कि 15 से 20 सेकंड के छोटे सिग्नल पर न्यूट्रल में शिफ्ट करने से कोई बड़ी फ्यूल सेविंग नहीं होती।
अगर सिग्नल बहुत लंबा है और कार में ऑटो स्टार्ट-स्टॉप फीचर मौजूद है, तो सिस्टम खुद ही इंजन को अस्थायी रूप से बंद कर देता है, जिससे अतिरिक्त ईंधन बचाया जा सकता है।
सड़क सुरक्षा से भी जुड़ा है मामला
रेड सिग्नल पर न्यूट्रल गियर का इस्तेमाल केवल गियरबॉक्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध सड़क सुरक्षा से भी है।
मान लीजिए कि आपकी कार सिग्नल पर खड़ी है और अचानक पीछे से कोई तेज रफ्तार वाहन आपकी ओर आता दिखाई देता है। ऐसी स्थिति में अगर कार पहले से ड्राइव मोड में है, तो आप तुरंत एक्सीलेटर दबाकर प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
लेकिन यदि कार न्यूट्रल में है, तो पहले आपको दोबारा ड्राइव मोड में जाना पड़ेगा। इस प्रक्रिया में कुछ सेकंड का अतिरिक्त समय लग सकता है, जो आपात स्थिति में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
ट्रैफिक सिग्नल पर क्या करें?
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सिग्नल का समय 15 से 30 सेकंड के बीच है, तो ऑटोमैटिक कार को ड्राइव मोड में रखते हुए ब्रेक दबाकर रोकना ज्यादा व्यावहारिक माना जाता है। वहीं, बहुत लंबे सिग्नल या रेलवे क्रॉसिंग जैसी परिस्थितियों में निर्माता के निर्देशों के अनुसार न्यूट्रल या पार्किंग मोड का इस्तेमाल किया जा सकता है।
छोटी-छोटी ड्राइविंग आदतें न केवल आपकी कार की उम्र बढ़ाती हैं, बल्कि सुरक्षा और रखरखाव की लागत पर भी सकारात्मक असर डालती हैं। इसलिए अगली बार रेड सिग्नल पर रुकें, तो केवल आदत के कारण न्यूट्रल गियर लगाने से पहले एक बार जरूर सोचें।
- डॉ. अनिमेष शर्मा
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