National Livestock Mission: केंद्र सरकार ने देश की ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बेहद सराहनीय कदम उठाया है. राष्ट्रीय पशुधन मिशन के अंतर्गत ग्रामीण इलाकों में रहने वाली महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए एक विशेष पहल की शुरुआत की गई है. इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा करना और महिलाओं की आय में बढ़ोतरी करना है.
सरकार दे रही 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी
सरकार की इस योजना के तहत अगर कोई महिला या महिला स्वयं सहायता समूह बकरी, भेड़ या सुअर पालन का व्यवसाय शुरू करना चाहता है, तो उसे कुल लागत पर 90% तक की भारी सब्सिडी दी जा रही है. इसका मतलब यह हुआ कि व्यवसाय शुरू करने के लिए महिलाओं को अपनी जेब से केवल 10% राशि ही लगानी पड़ेगी और बाकी का पूरा खर्च सरकार उठाएगी.
जानिए सब्सिडी का पूरा गणित और लागत
इस योजना के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता का ढांचा बेहद आसान और फायदेमंद रखा गया है. सरकार ने तय किया है कि पूरे प्रोजेक्ट की कुल लागत का 90% हिस्सा अनुदान यानी सब्सिडी के रूप में दिया जाएगा, जबकि लाभार्थी को अपनी तरफ से सिर्फ 10% धनराशि का निवेश करना होगा. अगर बात बकरी और भेड़ पालन की करें, तो इसके तहत महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को 10 से 20 मादा और 1 नर बकरे या भेड़ की यूनिट स्थापित करने के लिए मदद दी जाती है. उदाहरण के लिए, यदि एक छोटी यूनिट यानी 10 मादा और 1 नर की कुल लागत लगभग 66,000 रुपये तय की गई है, तो सरकार की तरफ से लगभग 59,400 रुपये की सब्सिडी सीधे मिल जाएगी. ऐसे में महिला उद्यमी को अपनी तरफ से केवल 6,600 रुपये ही लगाने होंगे.
सुअर पालन के लिए भी मिल रहा सरकार का अनुदान
इसी तरह सुअर पालन व्यवसाय के लिए भी सरकार बड़ा अनुदान दे रही है. इसके तहत एक यूनिट यानी 1 नर और 3 मादा या इससे अधिक की स्थापना करने पर भारी छूट मिलती है. अलग-अलग राज्यों में इसकी लागत वहां के नियमों के अनुसार तय होती है. जैसे उत्तर प्रदेश में सुअर पालन के लिए प्रति यूनिट की लागत 21 हजार रुपये तय की गई है, जिस पर इसी तय अनुपात यानी 90% के हिसाब से सब्सिडी का लाभ दिया जाता है. इससे गरीब परिवारों के लिए अपना काम शुरू करना बहुत आसान हो गया है.
किन महिलाओं को मिलेगा इस योजना का लाभ
यह विशेष योजना मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं और अनुसूचित जाति की महिलाओं के जीवन स्तर को सुधारने के लिए बनाई गई है. इस योजना का लाभ कोई भी ग्रामीण महिला व्यक्तिगत रूप से आवेदन करके ले सकती है. इसके अलावा, गांव में काम करने वाले महिला स्वयं सहायता समूह भी आपस में मिलकर इस योजना के तहत आवेदन कर सकते हैं और सामूहिक रूप से इस व्यवसाय को बड़े स्तर पर शुरू कर सकते हैं. इससे गांवों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी और वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में बड़ा योगदान दे सकेंगी.
आवेदन की पूरी प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेज
इस योजना का लाभ उठाने के लिए आवेदन करने के दो तरीके हैं. सबसे पहले आप अपने विकास ब्लॉक स्तर के पशु चिकित्सा अधिकारी या जिला पशुपालन विभाग के दफ्तर में जाकर सीधे संपर्क कर सकते हैं. वहां के अधिकारी आपको योजना के बारे में पूरी जानकारी देंगे. आवेदन करते समय आपको कुछ जरूरी दस्तावेज अपने साथ रखने होंगे, जिनमें निवास प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र, बैंक पासबुक और पासपोर्ट साइज फोटो शामिल हैं. इसके साथ ही योजना का लाभ लेने के लिए एक छोटी प्रोजेक्ट रिपोर्ट भी जमा करनी पड़ सकती है, जिसे बनाने में पशुपालन विभाग के अधिकारी आपकी पूरी मदद करेंगे.
ऐसे करें ऑनलाइन आवेदन
यदि आप ऑनलाइन आवेदन करना चाहते हैं, तो राष्ट्रीय पशुधन मिशन के आधिकारिक वेब पोर्टल के माध्यम से घर बैठे भी आवेदन कर सकते हैं. वेबसाइट पर जाकर आपको अप्लाई लोन अंडर एनएलएम या अप्लाई सब्सिडी अंडर एनएलएम के विकल्प पर क्लिक करना होगा. इसके बाद आपके सामने एक फॉर्म खुलेगा, जिसमें अपनी सभी जानकारियां सही ढंग से भरकर और दस्तावेजों को अपलोड करके सबमिट करना होगा. आपके आवेदन की पूरी जांच राज्य कार्यान्वयन एजेंसी द्वारा की जाएगी. इसके बाद बैंक से लोन की मंजूरी मिलने और राज्य स्तरीय समिति की सिफारिश के बाद आपकी सब्सिडी की राशि जारी कर दी जाएगी.
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पर्यावरण प्रदूषण वर्तमान समय में सबसे बड़ी वैश्विक समस्या है। पिछले तीन दशकों से महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण से ही जुड़ी है। मानवीय क्रियाकलापों के कारण प्रकृति में लगातार बढ़ते दखल के कारण पृथ्वी पर बहुत से प्राकृतिक संसाधनों का विनाश हुआ है। आधुनिक जीवनशैली, पृथ्वी पर पेड़-पौधों की कमी, पर्यावरण प्रदूषण का विकराल रूप, मानव द्वारा प्रकृति का बेदर्दी से दोहन इत्यादि कारणों से मानव और प्रकृति के बीच असंतुलन की भयावह खाई उत्पन्न हो रही है। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित वातावरण के बढ़ते खतरे हम अब लगातार अनुभव कर रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण की सुरक्षा तथा संरक्षण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को पूरी दुनिया में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा 16 जून 1972 को स्टॉकहोम में पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए यह दिवस मनाने की घोषणा की गई थी और पहला विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 1974 को मनाया गया था। विश्व पर्यावरण दिवस का वर्ष 2026 का विषय ‘प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।’
पर्यावरण की रक्षा और प्रकृति के उचित दोहन को लेकर हालांकि यूरोप, अमेरिका तथा अफ्रीकी देशों में 1910 के दशक से ही समझौतों की शुरूआत हो गई थी किन्तु बीते कुछ दशकों में दुनिया के कई देशों ने इसे लेकर क्योटो प्रोटोकाल, मांट्रियल प्रोटोकाल, रियो सम्मलेन जैसे कई बहुराष्ट्रीय समझौते किए हैं। अधिकांश देशों की सरकारें पर्यावरण को लेकर चिंतित तो दिखती हैं लेकिन पर्यावरण की चिंता के बीच कुछ देश अपने हितों को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण की नीतियों में बदलाव करते रहे हैं। प्रदूषित वातावरण का खामियाजा केवल मनुष्यों को ही नहीं बल्कि धरती पर विद्यमान प्रत्येक प्राणी को भुगतना पड़ता है। बड़े पैमाने पर प्रकृति से खिलवाड़ के ही कारण दुनिया के विशालकाय जंगल हर साल सुलगने लगे हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों रुपये का नुकसान होने के अलावा दुर्लभ जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां भी भीषण आग में जलकर राख हो जाती हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर में पर्यावरण की स्थिति में सुधार देखा गया था, जिसने बता दिया था कि अगर हम चाहें तो पर्यावरण की स्थिति में काफी हद तक सुधार किया जा सकता है लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपेक्षित कदम नहीं उठाए जाते। न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में निरन्तर हो रही बढ़ोतरी और मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज गहन चिंता का विषय बना है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प भी दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते इस तरह की चर्चाएं और चिंताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह स्पष्ट किया है कि धरती में रह-रहकर जो उथल-पुथल की प्राकृतिक घटनाएं घट रही हैं, उनके पीछे छिपे संकेतों और प्रकृति की मूक भाषा को समझना कितना जरूरी है। आधुनिकरण और औद्योगिकीकरण की दौड़ में हमने हर पल प्रकृति की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन किया है और ये सब प्रकृति के साथ इंसान की ज्यादतियों का ही नतीजा हैं, जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने हैं।
मानवीय क्रियाकलापों के कारण ही वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है कि हमें सांस के जरिये असाध्य बीमारियों की सौगात मिल रही है। सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तब तक नहीं खुलती, जब तक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है।
प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें निरन्तर चेतावनियां देती रही है कि यदि हम इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है लेकिन हम हर बार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखने के बावजूद प्रकृति की इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर खुद अपने विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। यदि दुनियाभर में पर्यावरण प्रदूषण की विकराल होती वैश्विक समस्या को देखें तो स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे शायद हम कुछ करना ही नहीं चाहते। ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक’ में बताया गया है कि पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के कारण दुनियाभर में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है। प्रकृति हमारी मां के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से ढ़ेरों बहुमूल्य चीजें प्रदान करती है लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?
- योगेश कुमार गोयल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं तथा पर्यावरण पर चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिख चुके हैं)
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