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Explainer: क्या आपको मालूम है आखिर कैसे मिलता है B-Grade एक्ट्रेस का टैग? यहां जानें इसके पीछे की पूरी कहानी
B-Grade Actresses: भारतीय सिनेमा में कई ऐसे शब्द हैं जिनका इस्तेमाल सालों से किया जाता रहा है, लेकिन बहुत कम लोग उनके असली मतलब को जानते हैं. ऐसा ही एक शब्द है बी-ग्रेड एक्ट्रेस (B-Grade Actress). जी हां, अक्सर सोशल मीडिया, यूट्यूब, फिल्मी चर्चाओं और मनोरंजन खबरों में ये शब्द सुनने को मिल जाता है. किसी अभिनेत्री को B-Grade एक्ट्रेस कह दिया जाता है, तो कई लोग इसे उसके करियर या एक्टिंग एबिलिटी से जोड़कर देखने लगते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर B-Grade एक्ट्रेस का टैग मिलता कैसे है? क्या ये कोई आधिकारिक कैटेगरी है या फिर समय के साथ बना एक इनफॉर्मल लेबल? आइए जानते हैं इसके पीछे की पूरी कहानी.
सबसे पहले समझिए B-Grade फिल्म क्या होती है?
B-Grade एक्ट्रेस को समझने से पहले ये जानना जरूरी है कि बी-ग्रेड फिल्म क्या होती है. दरअसल, 'B-Movie' शब्द की शुरुआत हॉलीवुड से हुई थी. 1930 और 1940 के दशक में सिनेमाघरों में एक बड़ी फिल्म के साथ कम बजट वाली दूसरी फिल्म भी दिखाई जाती थी. इन्हें B-Movies कहा जाता था. इन फिल्मों का बजट कम होता था, बड़े सितारे नहीं होते थे और इनका मकसद सीमित संसाधनों में मनोरंजन देना होता था. धीरे-धीरे ये शब्द दुनिया के दूसरे फिल्म इंडस्ट्रीज तक पहुंचा और भारत में भी कम बजट वाली फिल्मों के लिए इस्तेमाल होने लगा.
भारत में कैसे शुरू हुआ B-Grade फिल्मों का दौर?
भारत में 1970 और 1980 के दशक के दौरान B-ग्रेड फिल्मों का चलन तेजी से बढ़ा. उस समय कम बजट में बनने वाली हॉरर, थ्रिलर, एक्शन और बोल्ड टॉपिक्स पर आधारित फिल्मों को B-ग्रेड कहा जाने लगा. इन फिल्मों में बड़े सितारों की बजाय नए कलाकारों को मौका मिलता था. कई बार फिल्म का बजट इतना कम होता था कि निर्माता महंगे कलाकारों को नहीं ले सकते थे. इसलिए नए चेहरे या संघर्ष कर रहे कलाकार ऐसी फिल्मों का हिस्सा बनते थे. रामसे ब्रदर्स की कई हॉरर फिल्मों को भी उस दौर में B-ग्रेड कैटेगरी में रखा जाता था, हालांकि उनमें से कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल भी रहीं.
कैसे मिलता है B-ग्रेड एक्ट्रेस का टैग?
सबसे जरूरी बात ये है कि फिल्म इंडस्ट्री में 'बी-ग्रेड एक्ट्रेस' नाम की कोई आधिकारिक कैटेगरी नहीं होती. किसी एक्ट्रेस को ये टैग किसी संस्था या संगठन द्वारा नहीं दिया जाता. आमतौर पर ये टैग उन अभिनेत्रियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिन्होंने अपने करियर के किसी दौर में कम बजट वाली फिल्मों में काम किया हो या ऐसी फिल्मों का हिस्सा रही हों जिन्हें दर्शकों और मीडिया ने B-ग्रेड फिल्मों की कैटेगरी में रखा हो. समय के साथ ये शब्द खासतौर पर उन फिल्मों से जोड़ दिया गया जिनमें बोल्ड या ग्लैमरस कंटेंट ज्यादा होता था. यही वजह है कि कई बार बिना पूरी जानकारी के एक्ट्रेसेस को B-Grade एक्ट्रेस कह दिया जाता है.
क्या B-Grade का मतलब सिर्फ बोल्ड फिल्में होता है?
इस सवाल का जवाब है- नहीं. ये सबसे बड़ी गलतफहमी है. B-ग्रेड फिल्मों का संबंध ओरिजिनल तरीके से बजट और निर्माण स्तर से था, न कि सिर्फ बोल्ड कंटेंट से. कई B-ग्रेड फिल्में हॉरर, थ्रिलर, साइंस फिक्शन और एक्शन आधारित भी होती थीं. हालांकि 1990 और 2000 के दशक में कुछ निर्माताओं ने कम बजट की फिल्मों में बोल्ड सीन्स का इस्तेमाल करके दर्शकों को आकर्षित करने की कोशिश की. इसके बाद लोगों ने B-ग्रेड फिल्मों को सीधे बोल्ड फिल्मों से जोड़ना शुरू कर दिया.
किन एक्ट्रेसेस को अक्सर B-ग्रेड एक्ट्रेस कहा जाता है?
फिल्मी चर्चाओं और मीडिया रिपोर्ट्स में कुछ एक्ट्रेसेस के नाम अक्सर B-ग्रेड सिनेमा के साथ जोड़े जाते रहे हैं. इनमें शकीला, सपना सप्पू, निशा नूर, रेशमा, पूजा श्री, मेघना नायडू, ममता कुलकर्णी (करियर के शुरुआती दौर की कुछ फिल्मों को लेकर चर्चा रही) सीमा, मोना होम्स शामिल हैं. हालांकि ये ध्यान रखना जरूरी है कि इनमें से कई कलाकारों ने केवल B-ग्रेड फिल्मों में ही काम नहीं किया. कुछ अभिनेत्रियों ने रीजनल सिनेमा, टीवी और मुख्यधारा की फिल्मों में भी काम किया है.
क्या बड़े सितारे भी रहे हैं B-ग्रेड फिल्मों का हिस्सा?
बहुत कम लोग जानते हैं कि कई ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने अपने शुरुआती करियर में कम बजट वाली फिल्मों में काम किया और बाद में बड़े स्टार बन गए. फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष के दौरान कलाकारों के पास सीमित ऑफर होते हैं. ऐसे में कई एक्टर और एक्ट्रेसेस छोटे बजट की फिल्मों से शुरुआत करते हैं. इसलिए किसी कलाकार का B-ग्रेड फिल्मों में काम करना उसकी प्रतिभा का पैमाना नहीं माना जा सकता.
क्यों लगाया जाता है ये टैग?
कई बार मीडिया और दर्शक किसी कलाकार की पूरी फिल्मोग्राफी देखे बिना ही उसे एक विशेष छवि में बांध देते हैं. अगर किसी एक्ट्रेस ने कुछ बोल्ड या कम बजट की फिल्मों में काम किया हो, तो उसे लंबे समय तक उसी पहचान से देखा जाता है. यही कारण है कि कई एक्ट्रेसेस ने समय-समय पर इस टैग का विरोध भी किया है. उनका कहना रहा है कि कलाकार को उसके एक्टिंग और काम के आधार पर आंका जाना चाहिए, न कि किसी एक दौर या कुछ फिल्मों के आधार पर.
OTT के दौर में बदल गई तस्वीर
एक समय था जब B-ग्रेड फिल्मों का बड़ा बाजार सिंगल स्क्रीन थिएटर और वीडियो कैसेट्स के जरिए चलता था. लेकिन इंटरनेट और OTT प्लेटफॉर्म्स के आने के बाद मनोरंजन इंडस्ट्री पूरी तरह बदल गया. आज दर्शकों के पास हर तरह का कंटेंट उपलब्ध है. वेब सीरीज और डिजिटल फिल्मों ने कंटेंट की परिभाषा को काफी बड़ा बना दिया है. ऐसे में B-ग्रेड और A-ग्रेड जैसी पारंपरिक कैटेगरीज पहले की तुलना में काफी कमजोर पड़ चुकी हैं. अब फिल्म की सफलता उसके बजट से ज्यादा उसकी कहानी, प्रेजेंटेशन और दर्शकों की पसंद पर निर्भर करती है.
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