पार्टी के 60वें स्थापना दिवस पर उद्धव ठाकरे ने कहा कि अगर सदस्यों को लगता है कि वह पार्टी प्रमुख के तौर पर नेतृत्व करने के लायक नहीं हैं, तो वह यह पद छोड़ने को तैयार हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जब तक शिव सैनिक उनका समर्थन करते रहेंगे, वह लड़ते रहेंगे, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि पार्टी को 'चोरों और लुटेरों' के हाथों में नहीं सौंपा जाना चाहिए। बालासाहेब ठाकरे के कांग्रेस में शामिल न होने के फ़ैसले का ज़िक्र करते हुए, उन्होंने पार्टी की स्वतंत्र पहचान और इसके स्थापना के सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
शिवसेना (UBT) के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने खुलकर पार्टी लीडरशिप की बात नहीं मानी है। उन्होंने व्हिप जारी होने के बावजूद मीटिंग्स में हिस्सा नहीं लिया और स्पीकर को चिट्ठी लिखकर अलग ग्रुप का दर्जा मांगा है। उन्होंने कांग्रेस में विलय और विचारधारा से भटकने के डर का हवाला दिया है, साथ ही शिंदे गुट के सांसदों के साथ बैठने की भी मांग की है। जयपुर जाने जैसा यह कदम 2022 में हुई फूट जैसा ही है और अगर दो-तिहाई समर्थन साबित हो जाता है, तो यह दलबदल विरोधी कानून के दायरे में आ सकता है।
चार साल में दूसरी बार अपनी पार्टी में आसन्न टूट पर, ठाकरे ने कहा कि वह एक दशक से अधिक समय से पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं और लगातार हो रहे हमलों को देखते हुए वह शिवसेना (उबाठा) के शीर्ष पद से हटने को तैयार हैं। महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री ठाकरे मुंबई में शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस के मौके पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। भावुक ठाकरे ने अपने समर्थकों से कहा, ‘‘अगर पार्टी का ही कोई व्यक्ति अगला शिवसेना प्रमुख बनता है तो मुझे खुशी होगी, लेकिन मैं इसे चोरों के हाथों में नहीं जाने दूंगा।’’ ठाकरे ने कहा कि वह डगमगाए नहीं हैं और सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए डटे हुए हैं।
उन्होंने कहा कि लेकिन मैं नहीं चाहता कि कोई भी शिवसैनिक मुझ पर उंगली उठाए कि मैंने मुख्यमंत्री पद से (2022 में) इस्तीफा दे दिया और (2026 में) विधान परिषद की सदस्यता जारी नहीं रखी।’’ पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि हाल की घटनाओं से शिवसेना (उबाठा) के कार्यकर्ता निराश नहीं हुए, बल्कि और अधिक जोश में आ गए हैं। उन्होंने बागी सांसदों के उन दावों की कड़ी आलोचना की, जिनमें कहा गया था कि उन्हें आशंका है कि शिवसेना (उबाठा) कांग्रेस में अपना विलय कर सकती है। उन्होंने कहा कि अगर 30 साल तक सहयोगी रहने के बावजूद हमने भाजपा में अपना विलय नहीं किया, तो हम कांग्रेस में विलय कैसे कर सकते हैं? मुझे आशंका है कि भाजपा की महाराष्ट्र इकाई (एकनाथ) शिंदे नीत शिवसेना का (खुद में) विलय कर सकती है।
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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर शिवसेना के भीतर उठी बगावत ने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जिसने ठाकरे बनाम शिंदे की जंग को और ज्यादा विस्फोटक बना दिया है। मुंबई में शिवसेना स्थापना दिवस के मंच से उद्धव ठाकरे ने भावुक अंदाज में पार्टी कार्यकर्ताओं के सामने अपनी पीड़ा रखी। उन्होंने साफ कहा कि अगर शिवसैनिकों का भरोसा उन पर नहीं रहा तो वह इसी वक्त पार्टी प्रमुख का पद छोड़ने को तैयार हैं, लेकिन शिवसेना को चोरों और लुटेरों के हाथों में नहीं जाने देंगे। उद्धव का यह बयान सिर्फ भावुक अपील नहीं था, बल्कि उस राजनीतिक भूचाल की गूंज थी जिसने एक बार फिर ठाकरे खेमे की नींद उड़ा दी है।
उद्धव ठाकरे ने मंच से साफ कहा कि उन्हें खुशी होगी अगर पार्टी का कोई साधारण कार्यकर्ता आगे बढ़कर शिवसेना की कमान संभाले, लेकिन वह कभी यह बर्दाश्त नहीं करेंगे कि पार्टी पर कब्जा उन लोगों का हो जाए जिन्होंने विश्वासघात किया है। उन्होंने अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने और विधान परिषद सदस्यता जारी नहीं रखने के फैसले का भी बचाव किया। उद्धव ने कहा कि वह नहीं चाहते कि कोई शिवसैनिक उन पर उंगली उठाए कि सत्ता बचाने के लिए उन्होंने सिद्धांत बेच दिए।
लेकिन इसी बीच दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे ने ऐसा हमला बोला जिसने ठाकरे खेमे को भीतर तक झकझोर दिया। शिंदे ने अपने कार्यकर्ताओं के बीच गरजते हुए कहा कि कुछ लोग पिछले कई दिनों से भौंक रहे हैं, लेकिन बाघ हमेशा अकेला चलता है। शिंदे का यह बयान सीधे उद्धव ठाकरे पर हमला माना जा रहा है। इतना ही नहीं, उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि अभी तो सिर्फ ट्रेलर दिखा है, पूरी फिल्म बाकी है। इस एक लाइन ने महाराष्ट्र की राजनीति में सनसनी फैला दी है, क्योंकि इसे ठाकरे खेमे में और बड़ी टूट की खुली चेतावनी माना जा रहा है।
दरअसल संकट की असली वजह वही छह सांसद हैं जिन्होंने हाल ही में दिल्ली में हुई शिवसेना संसदीय दल की बैठक से दूरी बना ली। इन सांसदों की गैरमौजूदगी ने यह अटकलें तेज कर दीं कि वे जल्द ही सत्तारुढ़ गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं। इसी को लेकर अब महाराष्ट्र की राजनीति में "ऑपरेशन टाइगर" की चर्चा जोर पकड़ रही है। माना जा रहा है कि ठाकरे गुट में एक और बड़ी सेंध लग सकती है।
उधर, अपने भाषण में उद्धव ठाकरे ने इन बागी सांसदों पर अप्रत्यक्ष हमला करते हुए जनता से माफी मांगी। उन्होंने कहा कि जिन मतदाताओं ने इन सांसदों को जिताया था, उनसे वह क्षमा चाहते हैं क्योंकि वे अब दल बदल की राह पर हैं। यह बयान साफ दिखाता है कि ठाकरे अब विश्वासघात की चोट को खुलकर जनता के सामने रख रहे हैं।
आदित्य ठाकरे ने भी बागी नेताओं पर जबरदस्त हमला बोला। उन्होंने उन्हें बेशर्म, एहसान फरामोश और भ्रष्ट करार देते हुए कहा कि जिन लोगों को जनता ने जिताया, वही अब जनता की पीठ में छुरा घोंप रहे हैं। ठाकरे परिवार का यह गुस्सा दिखा रहा है कि पार्टी के भीतर बगावत अब सिर्फ राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
उद्धव ठाकरे ने इस दौरान कांग्रेस में विलय की अटकलों को भी खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि जब शिवसेना ने तीस साल तक भाजपा के साथ रहकर भी खुद को उसमें विलीन नहीं किया तो कांग्रेस में जाने का सवाल ही नहीं उठता। उद्धव ने दावा किया कि उन्होंने पूरे महाराष्ट्र का दौरा किया और पार्टी कार्यकर्ताओं से लगातार संवाद बनाए रखा, तभी चुनावों में पार्टी को सफलता मिली।
वहीं एकनाथ शिंदे ने भी कोई मौका नहीं छोड़ा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बाघ की खाल ओढ़ लेने से कोई भेड़िया बाघ नहीं बन जाता। शिंदे ने साफ कहा कि उद्धव ठाकरे को आत्ममंथन करना चाहिए कि आखिर नेता उनकी पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? उन्होंने दावा किया कि बालासाहेब ठाकरे के सपने को उन्होंने पूरा किया और शिवसेना को गांव गांव तक पहुंचाया।
शिंदे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि बालासाहेब ठाकरे आज होते तो मोदी के काम की सराहना करते। उन्होंने महायुति गठबंधन को मजबूत बताते हुए कहा कि उनके और देवेंद्र फडणवीस के बीच किसी तरह का मतभेद नहीं है। शिंदे ने यह भी दावा कर दिया कि विधान परिषद चुनाव में विपक्ष एक भी सीट नहीं जीत पाएगा।
बहरहाल, इस पूरी सियासी जंग ने साफ कर दिया है कि महाराष्ट्र में शिवसेना अब दो हिस्सों में बंटी पार्टी भर नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ऐसी राजनीतिक रणभूमि बन चुकी है जहां हर दिन नया विस्फोट हो रहा है। एक तरफ उद्धव ठाकरे अपने कार्यकर्ताओं को पार्टी के साथ बनाये रखने की कोशिश में भावनात्मक दांव खेल रहे हैं, तो दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे ताकत, सत्ता और संगठन के दम पर ठाकरे खेमे को लगातार चुनौती दे रहे हैं। सवाल अब सिर्फ पार्टी पर कब्जे का नहीं, बल्कि उस विरासत का है जिसे बालासाहेब ठाकरे ने अपने खून पसीने से खड़ा किया था। ऐसा साफ दिख रहा है कि महाराष्ट्र की राजनीति में यह जंग अभी खत्म नहीं हुई, बल्कि असली तूफान शायद अब शुरू हुआ है।
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