IPL 2027 में 44 साल के इस वर्ल्ड चैंपियन की फिर से होगी एंट्री, भारत को दिला चुका है 2 बार विश्व कप
IPL 2027 : भारत समेत दुनिया भर के फैंस के बीच आईपीएल का क्रेज देखते ही बनता है. इंडियन प्रीमियर लीग के अब तक 19 सीजन खेले जा चुके हैं. इसमें दुनिया भर के तमाम क्रिकेटर खेल चुके हैं. भारत के क्रिकेटर्स ने भी आईपीएल में धमाल मचाया है. हर सीजन कोई एक नया खिलाड़ी हीरों बनकर उबरता है. भारत की इस टी20 क्रिकेट लीग में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और अनिल कुंबले तक तमाम बड़े-बड़े नाम खेल चुके हैं. ये खिलाड़ी समय के साथ अब अलग-अलग टीमों में कोच या फिर सपोर्ट स्टाफ की भूमिका निभा रहे हैं.
अब इंडियन प्रीमियर लीग के 20वें सीजन यानी कि IPL 2027 में एक और पूर्व भारतीय क्रिकेटर फिर से धमाल मचाने वाला है. भारत के इस वर्ल्ड चैंपियन खिलाड़ी ने टीम इंडिया को 2 बार विश्व कप की ट्रॉफी दिलाने में अहम भूमिका निभाई है. अब ये खिलाड़ी आईपीएल 2026 में नई भूमिका में नजर आ सकता है. ये खिलाड़ी कोई और नहीं बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व बांए हाथ के बल्लेबाज और स्पिन बॉलर युवराज सिंह हैं.
युवराज सिंह को मिलेगी नई जिम्मेदारी
युवराज सिंह अब आईपीएल 2027 में दिल्ली कैपिटल्स के सपोर्ट स्टाफ में नजर आने वाले हैं. टाइमस ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक युवराज सिंह दिल्ली कैपिटल्स के साथ जुड़ने वाले हैं. अब उनके पास मौका होगा कि वो दिल्ली की टीम को आईपीएल के इतिहास में पहली बार ट्रॉफी दिला पाएं. वो दिल्ली कैपिटल्स के लिए इंडियन प्रीमियर लीग में कोचिंग करते हुए नजर आएंगे.
???? YUVRAJ SINGH TO DELHI CAPITALS ????
— Johns. (@CricCrazyJohns) June 19, 2026
- Yuvraj Singh will be part of the Support staff of Delhi Capitals in IPL 2027. [Sahil Malhotra from TOI]
Ganguly is likely to lead the franchise's support staff setup. pic.twitter.com/OqBsZhicBn
आपको बता दें कि, आईपीएल 2026 में युवराज सिंह ने किसी आधिकारिक टीम के मुख्य कोच या मेंटोर की भूमिका में नहीं थे. उन्होंने व्यक्तिगत रूप से युवा और अनुभवी खिलाड़ियों के मार्गदर्शक (Personal Mentor) और कोच की भूमिका निभाई थी. अब वो आईपीएल 2026 में दिल्ली कैपिटल्स के सपोर्ट स्टाफ में नजर आने वाले हैं.
पहली बार युवराज कोच की भूमिका में आएंगे नजर
युवराज सिंह अब आईपीएल 2027 में सौरव गांगुली के साथ दिल्ली कैपिटल्स के सपोर्ट्स स्टाफ में नजर आने वाले हैं. आईपीएल में कोचिंग करने का ये युवराज सिंह का पहला अनुभव होगा. युवराज सिंह अभिषेक शर्मा, प्रभसिमरन सिंह, अब्दुल समद जैसे खिलाड़ियों को व्यक्तिगत रूप से कोचिंग दे चुके हैं. वहीं उन्होंने संजू सैमसन और प्रियांश आर्य जैसे खिलाड़ियों के साथ भी काम किया है.
युवराज सिंह युवा खिलाड़ियों को कोचिंग देने के साथ-साथ उनका मार्गदर्शन भी करते हैं. वो खिलाड़ियों के साथ मैदान पर टाइम बिताते हैं और नेट्स में खड़े होकर खिलाड़ियों को तपती धूप में प्रैक्टिस करवाते हैं. उनके साथी खिलाड़ी आशीष नेहरा, जहीर खान, वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीक कोचिंग के क्षेत्र में पहले ही उतर चुके थे. अब वो युवराज भी कोचिंग में हाथ आजमाते हुए नजर आएंगे. युवराज टीम इंडिया के 2007 में टी20 और 2011 में वनडे वर्ल्ड कप दिला चुके हैं.
युवराज सिंह का शानदार करियर
| प्रारूप | मैच | रन | सर्वोच्च स्कोर | औसत | गेंदें | स्ट्राइक रेट | शतक | अर्धशतक | चौके | छक्के | विकेट |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| टेस्ट | 40 | 1,900 | 169 | 33.9 | 3,277 | 58.0 | 3 | 11 | 260 | 22 | 9 |
| वनडे | 304 | 8,701 | 150 | 36.6 | 9,924 | 87.7 | 14 | 52 | 908 | 155 | 111 |
| टी20 अंतरराष्ट्रीय | 58 | 1,177 | 77* | 28.0 | 863 | 136.4 | 0 | 8 | 77 | 74 | 28 |
| आईपीएल | 132 | 2,750 | 83 | 24.8 | 2,120 | 129.7 | 0 | 13 | 217 | 149 | 36 |
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Explainer: अमेरिका ने दुनिया से कब-कब तोड़ा अपना वादा? अब ईरान को फिर देगा धोखा!
Treacherous America: इतिहास गवाह रहा है कि अमेरिका किसी देश का सगा नहीं हुआ। ये हम नहीं कह रहे, इसकी पुष्टि खुद इतिहास के आंकड़े कर रहे हैं। किसी भी देश के साथ कोई समझौता करके तोड़ना या उसे मानने से मुकर जाना, अमेरिका की फितरत में रहा है। सवाल है कि ये सवाल अब क्यों उठ रहा है?
दरअसल, कई दिनों की खींचतान के बाद अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हुआ। लेकिन समझौते के कुछ ही घंटे बाद अमेरिका ने डील की शर्तों में शामिल एक 300 अरब डॉलर देने की शर्त को मानने से इंकार कर दिया। जबकि खुद उपराष्ट्रपति जेडी वेंस इस शर्त को मानने की वकालत करते रहे। डील के अगले दिन ट्रंप ने ईरान पर हमले की धमकी तक दे दी। अब समझौते पर अंतिम मुहर के लिए जेडी वेंस को स्विट्जरलैंड जाना था, लेकिन अचानक व्हाइट हाउस से खबर आती है कि डील में कुछ तकनीकी खामियों के चलते वेंस का दौरा रद्द कर दिया गया है।
अब ऐसे में सवाल उठता है कि अमेरिका पर कितना भरोसा किया जा सकता है। समझौता पर साइन होने के बाद भी जेडी वेंस का न जाना अमेरिका की पुरानी फितरत की गवाही दे रहा है। हालांकि ईरान पहले ही अमेरिका का दगा भुगत चुका है। इसलिए इस बार वह भी फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। खुद ईरान को भी इस समझौते के पूरा होने पर भरोसा नहीं है।
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ईरान को अभी भी नहीं है भरोसा
मुंबई में ईरान के कॉन्सल जनरल, सईद रजा मोसायेब मोतलाघ ने साफ साफ कहा कि दुर्भाग्य से, हम अमेरिका की नेक नीयत पर भरोसा नहीं कर सकते, खासकर ऐतिहासिक अनुभवों और हाल के दो युद्धों को देखते हुए। फिर भी, हमने नेक नीयत से काम किया है। कहा कि हमने नेक नीयत से बातचीत शुरू की और उसी भावना के साथ शुरुआती नतीजे हासिल किए। हमें उम्मीद है कि इसी नेक नीयत के साथ बातचीत किसी नतीजे पर पहुंचेगी, तय समय-सीमा के भीतर बनी रहेगी और एक व्यापक समझौते का रूप लेगी।
मोजतबा ने दी सहमति लेकिन नहीं हो रहा भरोसा
शांति समझौता होने के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई ने आवाम के नाम पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने अमेरिका के खिलाफ साफ शंका जाहिर रकी थी। खामेनेई ने लिखा कि उनकी राय अलग थी। लेकिन राष्ट्रपति, जो सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख भी हैं, ने उन्हें भरोसा दिलाया कि ईरानी जनता और प्रतिरोध मोर्चे के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी। इसी भरोसे और जिम्मेदारी को स्वीकार करने के बाद उन्होंने अपनी मंजूरी दे दी। उन्होंने यह भी साफ कहा कि अगर अमेरिका कोई अनुचित या जरूरत से ज्यादा मांग रखता है, तो ईरान उसके सामने झुकेगा नहीं।
अमेरिका ने कई प्रमुख मौकों पर वैश्विक संधियों से पीछे हटकर और गुप्त रूप से अपने वादों का उल्लंघन करके दुनिया का भरोसा तोड़ा है। प्रमुख ऐतिहासिक और हालिया उदाहरणों में शामिल हैं...
पेरिस जलवायु समझौता (2017)
पेरिस जलवायु समझौता (Paris Agreement) जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय संधि है। अमेरिका ने वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए 2015 में हुए पेरिस जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन 2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इससे बाहर निकलने की घोषणा कर दी। यह निर्णय 2020 में प्रभावी हुआ। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह समझौता अमेरिकी अर्थव्यवस्था, उद्योगों और रोजगार के लिए नुकसानदायक है तथा अमेरिका के साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं करता। हालांकि, 2021 में राष्ट्रपति जो बाइडेन के सत्ता संभालने के बाद अमेरिका दोबारा इस समझौते में शामिल हो गया।
ईरान परमाणु समझौता (2018)
JCPOA (ईरान परमाणु समझौता) के तहत अमेरिका ने ईरान पर लगे कई आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देने का वादा किया था। हालांकि, 8 मई 2018 को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस ऐतिहासिक समझौते से अलग करने की घोषणा कर दी। इसके बाद अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक और वित्तीय प्रतिबंध दोबारा लागू कर दिए। जवाब में ईरान ने भी समझौते के तहत तय परमाणु गतिविधियों की सीमाओं का पालन धीरे-धीरे कम करना शुरू कर दिया, जिससे समझौता प्रभावी रूप से कमजोर पड़ गया और क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया।
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क्योटो प्रोटोकॉल (2001)
अमेरिका ने वैश्विक उत्सर्जन को कम करने के लिए बनी इस अंतरराष्ट्रीय संधि पर 1997 में हस्ताक्षर किए थे, लेकिन 2001 में इसे मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
शीत युद्ध के बाद के वादे
सोवियत संघ के विघटन के दौर में रूस का दावा रहा है कि पश्चिमी देशों ने नाटो (NATO) का पूर्व की ओर विस्तार न करने का मौखिक आश्वासन दिया था। हालांकि, बाद के वर्षों में अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो गठबंधन में पूर्वी यूरोप के कई देशों को शामिल किया गया, जिससे उसका दायरा रूस की सीमाओं के करीब तक पहुंच गया। इस मुद्दे को लेकर रूस और पश्चिमी देशों के बीच लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं।
कुर्दों का साथ छोड़ना (2019)
सीरिया में ISIS के खिलाफ लड़ाई के दौरान कुर्द लड़ाके अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगियों में शामिल थे। लेकिन अक्टूबर 2019 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा उत्तरी सीरिया से अमेरिकी सैनिकों को हटाने के फैसले के बाद कुर्द बल खुद को तुर्की के सैन्य हमलों के सामने अकेला महसूस करने लगे। अमेरिकी वापसी के तुरंत बाद तुर्की ने 'ऑपरेशन पीस स्प्रिंग' शुरू किया, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन और जनहानि हुई। कुर्द नेतृत्व ने अमेरिका के इस कदम को अपने साथ विश्वासघात और "पीठ में छुरा घोंपने" जैसा बताया।
इराक पर हमला (2003)
20 मार्च 2003 को अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन ने इराक पर सैन्य आक्रमण शुरू किया, जिसे 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम' के नाम से जाना जाता है। यह इराक युद्ध का पहला चरण था और गठबंधन सेनाओं को बगदाद पहुंचकर सद्दाम हुसैन के तीन दशक लंबे शासन को समाप्त करने में तीन सप्ताह से भी कम समय लगा। अमेरिका ने इराक पर सामूहिक विनाश के हथियार (WMD) विकसित करने का आरोप लगाते हुए यह कार्रवाई की, जबकि उसे संयुक्त राष्ट्र की स्पष्ट मंजूरी भी प्राप्त नहीं थी। हालांकि, युद्ध के बाद व्यापक जांच में ऐसे हथियारों के कोई ठोस सबूत नहीं मिले, जिससे अमेरिकी दावों पर गंभीर सवाल खड़े हुए।
भारत-पाकिस्तान युद्ध
1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अमेरिका ने तटस्थ रहने के बजाय पाकिस्तान का समर्थन किया। इतना ही नहीं, उसने हिंद महासागर में अपना सातवां बेड़ा (Seventh Fleet) भी भेजा, जिसे भारत पर दबाव बनाने की कोशिश माना गया। इस कदम से भारत में अमेरिका की भूमिका को लेकर काफी नाराजगी पैदा हुई।
अफगानिस्तान से वापसी (2021)
2021 में अमेरिका ने जल्दबाजी में अपनी सेना अफगानिस्तान से वापस बुला ली। इसके बाद अफगानिस्तान की सरकार तेजी से कमजोर पड़ गई और कुछ ही दिनों में तालिबान ने फिर से देश पर कब्जा कर लिया। अमेरिका की इस अव्यवस्थित वापसी पर दुनिया भर में सवाल उठे और उसके कई सहयोगी देश भी इस फैसले से असहज नजर आए।
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