भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और गोवा में अपनी इकाइयों को चुनाव की तैयारी तेज़ करने का निर्देश दिया है। सूत्रों ने इस बात की जानकारी दी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि संकेत मिल रहे हैं कि इन राज्यों में विधानसभा चुनाव समय से पहले हो सकते हैं, ताकि फरवरी 2027 में होने वाली जनगणना की प्रक्रिया के साथ इनका टकराव न हो। भाजपा मणिपुर पर भी कड़ी नज़र रख रही है। यह पाँचवाँ राज्य है जहाँ अगले साल की शुरुआत में बाकी राज्यों के साथ चुनाव होने थे।
हालाँकि, राज्य में हिंसा की छिटपुट घटनाओं—पहले 2023 में कुकी-मेइतेई संघर्ष और हाल के महीनों में कुकी-नागा संघर्ष का बढ़ना—को देखते हुए, यहाँ चुनाव बाद में कराए जा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, तय समय से कुछ हफ़्ते या महीने पहले चुनाव कराने की संभावना पर चर्चा हो रही है, क्योंकि जनगणना और वोटिंग की प्रक्रिया में शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों समेत कई एक जैसे कर्मचारियों की ज़रूरत होगी।
बीजेपी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि कर्मचारियों की कमी की चिंता के कारण चुनाव वाले राज्यों में चुनाव कार्यक्रम में बदलाव करने पर चर्चा शुरू हुई है। जनगणना का दूसरा चरण, जिसमें आबादी और जाति की गिनती शामिल है, फरवरी 2027 में शुरू होना है। सूत्रों के मुताबिक, चुनाव वाले सभी राज्यों में कोर ग्रुप्स से कहा गया है कि वे अपनी चुनावी तैयारियों में तेज़ी लाएँ। जहाँ यूपी, गोवा और पंजाब में बीजेपी सूत्रों ने संकेत दिया है कि जनगणना से जुड़ी लॉजिस्टिकल चुनौतियों (क्योंकि दोनों कामों में ज़्यादातर एक ही तरह के लोगों की ज़रूरत होती है) से बचने के लिए चुनाव कुछ हफ़्ते पहले कराए जा सकते हैं, वहीं उत्तराखंड बीजेपी चुनाव और भी जल्दी कराने के पक्ष में बताई जा रही है।
उत्तर प्रदेश में, जहाँ बीजेपी लगातार तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिश कर रही है, पार्टी नेताओं का मानना है कि अगर उम्मीद से पहले भी चुनाव होते हैं, तो संगठन इसके लिए तैयार है। गोवा और पंजाब में भी ऐसी ही तैयारियाँ चल रही हैं, जबकि उत्तराखंड यूनिट चुनाव कार्यक्रम को और ज़्यादा जल्दी करने के पक्ष में बताई जा रही है।
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भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई लंबी बैठक के बाद अब पार्टी संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर बड़े बदलावों की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर हुई करीब चार घंटे लंबी बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन तथा संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी अरुण कुमार और शिव प्रकाश शामिल रहे। यह बैठक देर रात तक चली और इसके बाद से यह माना जा रहा है कि भाजपा की नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा कभी भी की जा सकती है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जी-7 शिखर सम्मेलन से लौटने के बाद ही अंतिम घोषणा की जाएगी।
सूत्रों के अनुसार भाजपा संगठन में बड़े स्तर पर फेरबदल की तैयारी पूरी हो चुकी है। केवल संगठन ही नहीं, बल्कि राज्यपालों की नियुक्तियों और सरकार से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बदलावों की भी संभावना जताई जा रही है। पार्टी के भीतर यह चर्चा है कि अधिक मास की अवधि समाप्त होने के बाद अब धार्मिक दृष्टि से भी ऐसे निर्णयों में कोई बाधा नहीं रह गई है। इसलिए संगठनात्मक और प्रशासनिक बदलावों की प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ सकती है।
हम आपको बता दें कि भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम को लेकर पार्टी में काफी उत्सुकता है। बताया जा रहा है कि नई टीम में ग्यारह राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और छह राष्ट्रीय महासचिव बनाए जा सकते हैं। पार्टी नेतृत्व इस बार जातीय और सामाजिक संतुलन पर विशेष ध्यान देने की तैयारी में है। महिला प्रतिनिधित्व को भी पहले से अधिक महत्व दिए जाने की संभावना है। साथ ही युवा और अनुभवी नेताओं के बीच संतुलन बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार अगले वर्ष जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां के नेताओं को भी संगठन में प्रमुख जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं। गुजरात, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे चुनावी राज्यों के साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी नेताओं को नई टीम में जगह मिलने की संभावना है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार जनवरी 2020 में जेपी नड्डा के अध्यक्ष बनने के बाद से राष्ट्रीय संगठन में बहुत कम बदलाव हुए हैं। ऐसे में यह फेरबदल आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पार्टी ने हाल के दिनों में संकेत भी देने शुरू कर दिए हैं। इसी महीने भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े और तरुण चुघ को राज्यसभा भेजा गया है। दोनों नेताओं को संगठन और चुनावी रणनीति में मजबूत माना जाता है। इनके साथ राष्ट्रीय सचिव अलका गुर्जर और राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष सतीश पूनिया को भी उच्च सदन में भेजा गया है। इसे संगठन में व्यापक पुनर्संरचना की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
दूसरी ओर कुछ नेताओं के भविष्य को लेकर भी अटकलें तेज हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव डॉक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल का राज्यसभा कार्यकाल आगे नहीं बढ़ाया गया है। वहीं केंद्रीय राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और जार्ज कुरियन का कार्यकाल 21 जून को समाप्त हो रहा है और उनके स्थान पर नए चेहरों को अवसर दिए जाने की संभावना है। वरिष्ठ नेता अरुण सिंह भी नवंबर में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने नई टीम के गठन के दौरान अनुभव और नई ऊर्जा के बीच संतुलन साधने की चुनौती रहेगी।
भाजपा के भीतर यह भी चर्चा है कि विनोद तावड़े और तरुण चुघ जैसे नेताओं को संगठन में बनाए रखा जाए या फिर उन्हें सरकार में जिम्मेदारी दी जाए। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार इन दोनों नेताओं ने चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक कार्यों में लगातार प्रभावशाली भूमिका निभाई है। इसलिए उन्हें केंद्रीय मंत्रिपरिषद में राज्य मंत्री जैसे पदों पर भी जिम्मेदारी दी जा सकती है।
सूत्रों का कहना है कि पिछले छह वर्षों में संगठन के लिए काम करने वाले कई नेताओं को अब पुरस्कार स्वरूप नई जिम्मेदारियां मिल सकती हैं। इनमें राज्यपाल पद, आयोगों और अर्ध सरकारी संस्थाओं में नियुक्तियां शामिल हो सकती हैं। भाजपा नेतृत्व संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहे नेताओं को सम्मानजनक भूमिका देकर नए चेहरों के लिए भी जगह बनाना चाहता है।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की करीब एक दर्जन सीटों का कार्यकाल नवंबर में समाप्त होने जा रहा है। माना जा रहा है कि जो वरिष्ठ नेता नई संगठनात्मक टीम में जगह नहीं बना पाएंगे, उन्हें राज्यसभा के माध्यम से समायोजित किया जा सकता है। इससे पार्टी चुनावी राज्यों के नेताओं को भी साधने की कोशिश करेगी और संगठन में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।
बहरहाल, भाजपा और संघ के बीच हुई यह महत्वपूर्ण बैठक आने वाले समय में बड़े राजनीतिक बदलावों का संकेत मानी जा रही है। संगठन, सरकार और संवैधानिक पदों पर संभावित फेरबदल के जरिए भाजपा आगामी चुनावों से पहले अपनी रणनीति को और मजबूत करने की तैयारी में दिखाई दे रही है।
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